प्राणचंद चौहान (Pranchand Chauhan : the Hindi poet) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

प्राणचंद चौहान (Pranchand Chauhan : the Hindi poet) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

संस्कृत में रामचरित संबंधी कई नाटक हैं जिनमें कुछ तो नाटक के साहित्यिक नियमानुसार हैं और कुछ केवल संवाद रूप में होने के कारण नाटक कहे गए हैं। इसी पिछली पद्धति पर संवत् 1667 में प्राणचंद चौहान ने ‘रामायण महानाटक’ लिखा। रचना का ढंग नीचे उद्धृत अंश से ज्ञात हो सकता है :

कातिक मास पच्छ उजियारा । तीरथ पुन्य सोम कर वारा।

ता दिन कथा कीन्ह अनुमाना । शाह सलेम दिलीपति थाना।

संवत् सोरह सै सत साठा । पुन्य प्रगास पाय भय नाठा।

जो सारद माता कर दाया । बरनौं आदि पुरुष की माया।

जेहि माया कह मुनि जग भूला । ब्रह्मा रहे कमल के फूला।

निकसि न सक माया कर बाँधा । देषहु कमलनाल के राँधा।

आदिपुरुष बरनौं केहिभाँती । चाँद सुरज तहँ दिवस न राती।

निरगुन रूप करै सिव धयाना । चार बेद गुन जेरि बखाना।

तीनों गुन जानै संसारा । सिरजै पालै भंजनहारा।

श्रवन बिना सो अस बहुगुना । मन में होइ सु पहले सुना।

देषै सब पै आहि न आंषी । अंधकार चोरी के साषी।

तेहि कर दहुँ को करै बषाना । जिहि कर मर्म बेद नहिं जाना।

माया सींव भो कोउ न पारा । शंकर पँवरि बीच होइ हारा।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण 4 : सगुणधारा, रामभक्तिशाखा)

प्रश्नोत्तरी-44 (हिंदी भाषा एवं साहित्य, प्राणचंद चौहान)

# प्राणचंद चौहान के संबंध में निम्नलिखित में कौन-कौन से कथन सत्य हैं :

(A) संवत् 1667 में प्राणचंद चौहान ने ‘रामायण महानाटक’ लिखा।

(B) सबसे अधिक प्रसिद्ध प्राणचंद चौहान का ‘हनुमन्नाटक’ हुआ।

(C) ‘‘जेहि माया कह मुनि जग भूला । ब्रह्मा रहे कमल के फूला।

निकसि न सक माया कर बाँधा । देषहु कमलनाल के राँधा।’’ ये काव्य-पंक्तियां प्राणचंद चौहान के नाटक ‘रामायण महानाटक’ से उद्धृत हैं।

(D) ‘‘तेहि कर दहुँ को करै बषाना । जिहि कर मर्म बेद नहिं जाना।

माया सींव भो कोउ न पारा । शंकर पँवरि बीच होइ हारा।’’ इन काव्य-पंक्तियों के रचनाकार प्राणचंद चौहान हैं।

(A)(a)(b)(c)

(B)(b)(c)(d)

(C)(a)(c)(d)

(D)(a)(b)(d)

Ans. : (C)(a)(c)(d)

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण 4 : सगुणधारा, रामभक्तिशाखा)