शैली-सम्राट #राजा राधिकारमणप्रसाद और उपन्यास-सम्राट #प्रेमचंद की #भाषा में अंतर

शैली-सम्राट #राजा राधिकारमणप्रसाद और उपन्यास-सम्राट #प्रेमचंद की #भाषा में अंतर (Shailesh Samrat Raja Radhika Raman Prasad Singh aur upnyas Samrat Premchand ki bhasha mein antar)

“राजा राधिकारमण की भाषा के संदर्भ में मैं यह कहना चाहूंगा कि उनकी भाषा में सादगी नहीं, एक अपूर्व बुनावट है। तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो प्रेमचंद की भाषा से वह कुछ भिन्न धरातल पर है। प्रेमचंद भी उर्दू का संपूर्ण सौष्ठव आत्मसात कर हिंदी की भूमिका में अवतरित हुए हैं। अतः उनकी भाषा में उर्दू का लचीलापन, तेवर और खरापन प्रचुर मात्रा में मिलता है। किंतु काफ़ी हद तक चुस्त और मंजी हुई भाषा होने पर भी वह सादगी में ही सजी-संवरी रहना चाहती है। उसमें वह चुलबुलापन, नाज-नखरे और मस्ती नहीं है, जो राजा साहब की क़लम को अनायास मिली है। प्रेमचंदजी की भाषा यदि किसी किसान की कुलवधू की तरह सादी शुद्ध खादी की साड़ी में लिपटी दिखाई देती है, तो राजा साहब की भाषा जड़ीदार बनारसी साड़ी में लकदक किसी नवपरिणिता बधू या राजरानी जैसी अनोखी अदा और आन-बान से
अठखेलियां करती दिखाई देती है। राजा साहब की भाषा के क्षेत्र भी शिल्पी हैं। वह न केवल भाषा को गढ़ते हैं, बल्कि जड़ते भी हैं। प्रेमचंद जहां वाक्यों के छोटे-छोटे टुकड़ों से ही कथोपकथन एवं वर्णन का सौदा पटा लेते हैं, वहां राजा साहब के साहब के वाक्य प्रसंगानुसार अपना आकार-प्रकार निश्चित करते चलते हैं। प्रेमचंद के वाक्य यदि खंजन या गौरैया पक्षी की तरह फुदकते हैं, तो राजा साहब के वाक्य मानो चील और बाज की तरह हवा में सनसनाते बढ़ते हैं। और भाषा एवं शैली का यह अंतर दोनों साहित्य-महारथियों के जीवन एवं परिवेश की भिन्नता से भी समझा जा सकता है।”

—आरसी प्रसाद सिंह, राजा राधिकारमणप्रसाद सिंह विशेषांक, परिषद पत्रिका (शोध त्रैमासिक, अंक .  115-116) बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना