नंददास : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

नंददास : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

‘अष्टछाप’ के आठ कवि हैं : सूरदास, कुंभनदास, परमानंददास, कृष्णदास, छीतस्वामी, गोविंदस्वामी, चतुर्भुजदास और नंददास। (हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण-5 : सगुणधारा : कृष्णभक्ति शाखा)

ये (नंददास) सूरदास जी के प्राय: समकालीन थे और उनकी गणना ‘अष्टछाप’ में है। इनका कविताकाल सूरदास जी की मृत्यु के पीछे संवत् 1625 में या उसके और आगे तक माना जा सकता है। इनका जीवनवृत्त पूरा पूरा और ठीक ठीक नहीं मिलता। नाभा जी के ‘भक्तमाल’ में इन पर जो छप्पय है उसमें जीवन के संबंध में इतना ही है :

चंद्रहास अग्रज सुहृद परम प्रेम पथ में पगे।

इससे इतना ही सूचित होता है कि इनके भाई का नाम चंद्रहास था। इनके गोलोकवास के बहुत दिनों पीछे गोस्वामी विट्ठलनाथ जी के पुत्र गोकुलनाथ जी के नाम से जो ‘दो सौ बावन वैष्णवों की वार्ता’ लिखी गई उसमें इनका थोड़ा-सा वृत्त दिया गया है। उक्त वार्ता में नंददास जी तुलसीदास जी के भाई कहे गए हैं। गोकुलनाथ जी का अभिप्राय प्रसिद्ध गोस्वामी तुलसीदास जी से ही है, यह पूरी वार्ता पढ़ने से स्पष्ट हो जाता है। उसमें स्पष्ट लिखा है कि नंददास जी का कृष्णोपासक होना राम के अनन्य भक्त उनके भाई तुलसीदास जी को अच्छा नहीं लगा और उन्होंने उलाहना लिखकर भेजा। यह वाक्य भी उसमें आया है ‘सो एक दिन नंददास जी के मन में ऐसी आई। जैसे तुलसीदास जी ने रामायण भाषा करी है सो हम हूँ श्रीमद्भागवत भाषा करें।’ गोस्वामी जी का नंददास के साथ वृंदावन जाना और वहाँ ‘तुलसी मस्तक तब नवै धानुष बान लेव हाथ’ वाली घटना भी उक्त वार्ता में ही लिखी है। पर गोस्वामी जी का नंददास जी से कोई संबंध न था, यह बात पूर्णतया सिद्ध हो चुकी है। अत: उक्त वार्ता की बातों को, जो वास्तव में भक्तों का गौरव प्रचलित करने और बल्लभाचार्य जी की गद्दी की महिमा करने के लिए पीछे से लिखी गई है, प्रमाण कोटि में नहीं ले सकते।

उसी वार्ता में यह भी लिखा है कि द्वारका जाते हुए नंददास जी सिंधुनद ग्राम में एक रूपवती खत्रानी पर आसक्त हो गए। ये उस स्त्री के घर के चारों ओर चक्कर लगाया करते थे। घर वाले हैरान होकर कुछ दिनों के लिए गोकुल चले गए। वहाँ भी वे जा पहुँचे। अंत में वहीं पर गोसाईं विट्ठलनाथ जी के सदुपदेश से इनका मोह छूटा और ये अनन्य भक्त हो गए। इस कथा में ऐतिहासिक तथ्य केवल इतना ही है कि इन्होंने गोसाईं विट्ठलनाथ जी से दीक्षा ली। धारुवदासजी ने भी अपनी ‘भक्तनामावली’ में इनकी भक्ति की प्रशंसा के अतिरिक्त और कुछ नहीं लिखा है।

‘अष्टछाप’ में सूरदास जी के पीछे इन्हीं का नाम लेना पड़ता है। इनकी रचना भी बड़ी सरस और मधुर है। इनके संबंध में यह कहावत प्रसिद्ध है कि ‘और कवि गढ़िया, नंददास जड़िया।’ इनकी सबसे प्रसिद्ध पुस्तक ‘रासपंचाध्यायी’ है जो रोला छंदों में लिखी गई है। इसमें जैसा कि नाम से ही प्रकट है, कृष्ण की रासलीला का अनुप्रासादियुक्त साहित्यिक भाषा में विस्तार के साथ वर्णन है। …..  सूर ने स्वाभाविक चलती भाषा का ही अधिक आश्रय लिया है, अनुप्रास और चुने हुए संस्कृत पदविन्यास आदि की ओर प्रवृत्ति नहीं दिखाई है, पर नंददास जी में ये बातें पूर्ण रूप से पाई जाती हैं। ‘रासपंचाध्यायी’ के अतिरिक्त इन्होंने ये पुस्तकें लिखी हैं :

भागवत दशम स्कंध, रुक्मिणीमंगल, सिद्धांत पंचाध्यायी, रूपमंजरी, रसमंजरी, मानमंजरी, विरहमंजरी, नामचिंतामणिमाला, अनेकार्थनाममाला (कोश), दानलीला, मानलीला, अनेकार्थमंजरी, ज्ञानमंजरी, श्यामसगाई, भ्रमरगीत और सुदामाचरित्र। दो ग्रंथ इनके लिखे और कहे जाते हैं ‘हितोपदेश’ और ‘नासिकेतपुराण’ (गद्य में)। दो सौ से ऊपर इनके फुटकल पद भी मिले हैं। जहाँ तक ज्ञात है, इनकी चार पुस्तकें ही अब तक प्रकाशित हुई हैं : रासपंचध्यायी, भ्रमरगीत, अनेकार्थमंजरी और अनेकार्थनाममाला। इनमें रासपंचाध्यायी और भ्रमरगीत ही प्रसिद्ध हैं, अत: उनसे कुछ अवतरण नीचे दिए जाते हैं :

(रासपंचाध्यायी से)

ताही छिन उडुराज उदित रस रास सहायक।

कुंकुम मंडित बदन प्रिया जनु नागरि नायक

कोमल किरन अरुन मानो बन ब्यापि रही यों।

मनसिज खेल्यौ फाग घुमड़ि घुरि रह्यो गुलाल ज्यों।

फटिक छटा सी किरन कुजरंधा्रन जब आई।

मानहुँ बितत बितान सुदेस तनाव तनाई

तब लीनो कर कमल योगमाला सी मुरली।

अघटित घटना चतुर बहुरि अधारन सुर जुरली

(भ्रमरगीत से)

कहन स्याम संदेस एक मैं तुम पै आयो।

कहन समय संकेत कहूँ अवसर नहिं पायो

सोचत ही मन में रह्यो, कब पाऊँ इक ठाउँ।

कहि सँदेस नँदलाल को, बहुरि मधुपुरी जाउँ

सुनौ ब्रजनागरी।

जौ उनके गुन होय, वेद क्यों नेति बखानै।

निरगुन सगुन आतमा रुचि ऊपर सुख सानै

वेद पुराननि खोजि कै पायो कतहुँ न एक।

गुन ही के गुन होहि तुम, कहो अकासहि टेक

सुनौ ब्रजनागरी।

जौं उनके गुन नाहिं और गुन भए कहाँ ते।

बीज बिना तरु जमै मोहिं तुम कहौ कहाँ ते

वा गुन की परछाँह री माया दरपन बीच।

गुन तें गुन न्यारे भए, अमल वारि जल कीच

सखा सुनु श्याम के।

(हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण-5 : सगुणधारा : कृष्णभक्ति शाखा)

सूरदास और नंददास के सामने इन (कृष्णदास) की कविता साधारण कोटि की है।

(हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण-5 : सगुणधारा : कृष्णभक्ति शाखा)

उसकी रचना नंददास के ‘भ्रमरगीत’ के ढंग पर की गई है, पर अंत में देश की वर्तमान दशा और अपनी दशा का भी हलका सा आभास कवि (पं. सत्यनारायण ‘कविरत्न’) ने दिया है।

(हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण-3 : नई धारा : द्वितीय उत्थान)

कभी नंददास कृत तुलसी की वंदना का पद प्रकट होता है जिसमें नंददास कहते हैं

श्रीमत्तुलसीदास स्वगुरु भ्राता पद बंदे।

× × ×

नंददास के हृदय नयन को खोलेउ सोई

(हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण-4 : सगुणधारा : रामभक्ति शाखा)

इन (कृष्णदास पयहारी) की कविता उसी ढंग की है जिस ढंग की कृष्णोपासक नंददास जी की।

(हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण-4 : सगुणधारा : रामभक्तिशाखा)