सूरदास (Soordas) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

सूरदास (Soordas) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

सूरदास जी का वृत्त चौरासी वैष्णवों की वार्तामें केवल इतना ज्ञात होता है कि ये पहले गऊघाट (आगरे तथा मथुरा के बीच) पर एक साधु या स्वामी के रूप में रहा करते थे और भजन किया करते थे। गोवर्द्धन पर श्रीनाथजी का मंदिर बन जाने के पीछे एक बार बल्लभाचार्य जी गऊघाट पर उतरे। तब सूरदास उनके दर्शन को आए और उन्हें अपना बनाया एक पद गाकर सुनाया। आचार्य जी ने उन्हें अपना शिष्य बना लिया और भागवत की कथाओं को गाने योग्य पदों में करने का आदेश दिया। उनकी सच्ची भक्ति और पद रचना की निपुणता देख बल्लभाचार्य जी ने उन्हें श्रीनाथजी के मंदिर की कीर्तन सेवा सौंपी। इस मंदिर को पूरनमल खत्री ने गोवर्द्धन पर्वत पर संवत् 1576 में पूरा बनवाकर खड़ा किया था। मंदिर पूरा होने के 11 वर्ष पीछे अर्थात् संवत् 1587 में बल्लभाचार्य जी की मृत्यु हुई।

श्रीनाथजी के मंदिर निर्माण के थोड़ा ही पीछे सूरदास जी बल्लभ संप्रदाय में आए, यह चौरासी वैष्णवों की वार्ताके इन शब्दों से स्पष्ट हो जाता है :

औरहु पद गाए तब श्री महाप्रभुजी अपने मन में विचारे जो श्रीनाथजी के यहाँ और तो सब सेवा को मंडन भयो है, पर कीर्तन को मंडन नाहीं कियो है; तातें अब सूरदास को दीजिए।

अत: संवत् 1580 के आसपास सूरदास जी बल्लभाचार्य जी के शिष्य हुए होंगे और शिष्य होने के कुछ ही पीछे उन्हें कीर्तन सेवा मिली होगी। तब से वे बराबर गोवर्द्धन पर्वत पर ही मंदिर की सेवा करते थे, इसका स्पष्ट आभास सूरसारावलीके भीतर मौजूद है। तुलसीदास के प्रसंग में हम कह आए हैं कि भक्त लोग कभी कभी किसी ढंग से अपने को इष्टदेव की कथा के भीतर डालकर उनके चरणों तक पहुँचने की भावना करते हैं। तुलसी ने तो अपने कुछ प्रच्छन्न रूप में पहुँचाया है, पर सूर ने प्रकट रूप में। कृष्ण जन्म के उपरांत नंद के घर बराबर आनंदोत्सव हो रहे हैं। उसी बीच एक ढाढ़ी आकर कहता है :

नंद जू मेरे मन आनंद भयो, हौं गोवर्द्धन तें आयो।

तुम्हरे पुत्र भयो, मैं सुनि कै अति आतुर उठि धयो।।

×××

जब तुम मदन मोहन करि टेरौं, यह सुनि कै घर जाऊँ।

हौं तौ तेरे घर को ढाढ़ी, सूरदास मेरो नाऊँ।।

बल्लभाचार्य जी के पुत्र गोसाईं विट्ठलनाथ के सामने गोवर्द्धन की तलहटी के पारसोली ग्राम में सूरदास की मृत्यु हुई, इसका पता भी उक्त वार्तासे लगता है। गोसाईं विट्ठलनाथ की मृत्यु सं. 1642 में हुई। इसके कितने पहले सूरदास का परलोकवास हुआ, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता।

सूरसागरसमाप्त करने पर सूर ने जो सूरसारावलीलिखी है। उसमें अपनी अवस्था 67 वर्ष की कही है

गुरु परसाद होत यह दरसन सरसठ बरस प्रवीन।

तात्पर्य यह कि 67 वर्ष के पहले वे सूरसागरसमाप्त कर चुके थे। सूरसागर समाप्त होने के थोड़ा ही पीछे उन्होंने सारावलीलिखी होगी। एक और ग्रंथ सूरदास का साहित्यलहरीहै, जिसमें अलंकारों और नायिका भेदों के उदाहरण प्रस्तुत करने वाले कूट पद हैं। इसका रचनाकाल सूर ने इस प्रकार व्यक्त किया है :

मुनि सुनि रसन के रस लेख।

दसन गौरीनंद को लिखि सुबल संवत पेख।

इसके अनुसार संवत् 1607 में साहित्यलहरीसमाप्त हुई। यह तो मानना ही पड़ेगा कि साहित्य क्रीड़ा का यह ग्रंथ सूरसागरसे छुट्टी पाकर ही सूर ने संकलित किया होगा। उसके 2 वर्ष पहले यदि सूरसारावलीकी रचना हुई, तो कह सकते हैं कि संवत् 1605 में सूरदास जी 67 वर्ष के थे। अब यदि उनकी आयु 80 या 82 वर्ष की मानें तो उनका जन्मकाल संवत् 1540 के आसपास तथा मृत्युकाल संवत् 1620 के आसपास ही अनुमित होता है।

साहित्यलहरीके अंत में एक पद है जिसमें सूर अपनी वंश परंपरा देते हैं। उस पद के अनुसार सूर पृथ्वीराज के कवि चंदबरदाई के वंशज ब्रह्मभट्ट थे। चंद कवि के कुल में हरिचंद हुए जिनके 7 पुत्रों में सबसे छोटे सूरजदास या सूरदास थे। 1 शेष 6 भाई मुसलमानों से युद्ध करते हुए मारे गए तब अंधे सूरदास बहुत दिनों इधर उधर भटकते रहे। एक दिन वे कुएँ में गिर पड़े और 6 दिन उसी में पड़े रहे। सातवें दिन कृष्ण भगवान उनके सामने प्रकट हुए और उन्हें दृष्टि देकर अपना दर्शन दिया। भगवान ने कहा कि दक्षिण के प्रबल ब्राह्मण कुल द्वारा शत्रुओं का नाश होगा और तू सब विद्याओं में निपुण होगा। इस पर सूरदास ने वर माँगा कि जिन आँखों से मैंने आपका दर्शन किया उनसे अब और कुछ न देख्रू और सदा आपका भजन करूँ। कुएँ से जब भगवान ने उन्हें बाहर निकाला तब वे ज्यों के त्यों अंधे हो गए और ब्रज में आकर भजन करने लगे। वहाँ गोसाईंजी ने उन्हें अष्टछापमें लिया।

हमारा अनुमान है कि साहित्यलहरीमें यह पद पीछे किसी भाट के द्वारा जोड़ा गया है। यह पंक्ति है :

प्रबल दच्छिन बिप्रकुल तें सत्रु ह्वैहै नास।

इसे सूर के बहुत पीछे की रचना बता रही है। प्रबल दच्छिन विप्रकुलसे साफ पेशवाओं की ओर संकेत है। इसे खींचकर अध्यात्म पक्ष की ओर मोड़ने का प्रयत्न व्यर्थ है।

सारांश यह है कि हमें सूरदास का जो थोड़ा सा वृत्त चौरासी वैष्णवों की वार्तामें मिलता है उसी पर संतोष करना पड़ता है। यह वार्ताभी यद्यपि बल्लभाचार्य जी के पौत्र गोकुलनाथजी की कही जाती है, पर उनकी लिखी नहीं जान पड़ती। इसमें कई जगह गोकुलनाथ जी के श्रीमुख से कही हुई बातों का बड़े आदर और सम्मान के शब्दों में उल्लेख है और बल्लभाचार्य जी की शिष्या न होने कारण मीराबाई को बहुत बुरा भला कहा गया है, और गालियाँ तक दी गई हैं। रंग ढंग से यह वार्ता गोकुलनाथ जी के पीछे उनके किसी गुजराती शिष्य की रचना जान पड़ती है।

भक्तमालमें सूरदास के संबंध में केवल एक यही छप्पय मिलता है :

उक्ति चोज अनुप्रास बरन अस्थिति अति भारी।

बचन प्रीति निर्वाह अर्थ अद्भुत तुक धरी

प्रतिबिंबित दिवि दिष्टि, हृदय हरिलीला भासी।

जनम करम गुन रूप सबै रसना परकासी

बिमल बुद्धि गुन और की जो यह गुन श्रवननि धरै।

सूर कवित सुनि कौन कवि जो नहिं सिर चालन करै

इस छप्पय में सूर के अंधे होने भर का संकेत है जो परंपरा से प्रसिद्ध चला आता है। जीवन का कोई विशेष प्रामाणिक वृत्त न पाकर इधर कुछ लोगों ने सूर के समय के आसपास के किसी ऐतिहासिक लेख में जहाँ कहीं सूरदास नाम मिला है वहीं का वृत्त प्रसिद्ध सूरदास पर घटाने का प्रयत्न किया है। ऐसे दो उल्लेख लोगों को मिले हैं :

  1. आईने अकबरीमें अकबर के दरबार में नौकर, गवैयों बीनकरों आदि कलावंतों की जो फेहरिस्त है उसमें बाबा रामदास और उनके बेटे सूरदास दोनों के नाम दर्ज हैं। उसी ग्रंथ में यह भी लिखा है कि सब कलावंतों की सात मंडलियाँ बना दी गई थीं। प्रत्येक मंडली सप्ताह में एक बार दरबार में हाजिर होकर बादशाह का मनोरंजन करती थी। अकबर संवत् 1613 में गद्दी पर बैठा। हमारे सूरदास संवत् 1580 के आसपास ही बल्लभाचार्य जी के शिष्य हो गए और उनके पहले भी विरक्त साधु के रूप में गऊघाट पर रहा करते थे। इस दशा में संवत् 1613 के बहुत बाद दरबारी नौकरी करने कैसे पहुँचे? अत: आईने अकबरीके सूरदास और सूरसागर के सूरदास एक ही व्यक्ति नहीं ठहरते।
  2. मुंशियात् अबुल फजलनामक अबुल फजल के पत्रों का एक संग्रह है जिसमें बनारस के किसी संत सूरदास के नाम अबुल फजल का एक पत्र है। बनारस का कराड़ी इन सूरदास के साथ अच्छा बरताव नहीं करता था इससे उसकी शिकायत लिखकर इन्होंने शाही दरबार में भेजी थी। उसी के उत्तर में अबुल फजल का पत्र है। बनारस के सूरदास बादशाह से इलाहाबाद में मिलने के लिए इस तरह बुलाए गए हैं :

हजरत बादशाह इलाहाबाद में तशरीफ लाएँगे। उम्मीद है कि आप भी शर्फ मुलाजमात से मुशर्रफ होकर मुरीद हकीकी होंगे और खुदा का शुक्र है कि हजरत भी आपको हकशिनास जानकर दोस्त रखते हैं।‘ (फ़ारसी का अनुवाद)

इन शब्दों से ऐसी ध्वनि निकलती है कि ये कोई ऐसे संत थे जिनके अकबर के दीन इलाहीमें दीक्षित होने की संभावना अबुल फजल समझता था। संभव है कि ये कबीर के अनुयायी कोई संत हों। अकबर का दो बार इलाहाबाद जाना पाया जाता है। एक तो संवत् 1640 में फिर 1661 में। पहली यात्रा के समय का लिखा हुआ भी यदि इस पत्र को मानें तो भी उस समय हमारे सूर का गोलोकवास हो चुका था। यदि उन्हें तब तक जीवित मानें तो वे 100 वर्ष के ऊपर रहे होंगे। मृत्यु के इतने समीप आकर वे इन सब झमेलों में क्यों पड़ने जायंगे, या उनके दीनइलाहीमें दीक्षित होने की आशा कैसे की जाएगी?

श्री बल्लभाचार्य जी के पीछे उनके पुत्र गोसाईं विट्ठलनाथ जी गद्दी पर बैठे। उस समय तक पुष्टिमार्गी कई कवि सुंदर से सुंदर पदों की रचना कर चुके थे। इससे गोसाईं विट्ठलनाथ जी ने उनमें से आठ सर्वोत्तम कवियों को चुनकर अष्टछापकी प्रतिष्ठा की। अष्टछापके आठ कवि हैं : सूरदास, कुंभनदास, परमानंददास, कृष्णदास, छीतस्वामी, गोविंदस्वामी, चतुर्भुजदास और नंददास

कृष्णभक्ति परंपरा में श्रीकृष्ण की प्रेममयी मूर्ति को ही लेकर प्रेमतत्व की बड़े विस्तार के साथ व्यंजना हुई है, उनके लोकपक्ष का समावेश उसमें नहीं है। इन कृष्णभक्तों के कृष्ण प्रेमोन्मत्त गोपिकाओं से घिरे हुए गोकुल के श्रीकृष्ण हैं, बड़े बड़े भूपालों के बीच लोकव्यवस्था की रक्षा करते हुए द्वारका के श्रीकृष्ण नहीं हैं। कृष्ण के जिस मधुर रूप को लेकर ये भक्त कवि चले हैं वह हास विलास की तरंगों से परिपूर्ण अनंत सौंदर्य का समुद्र है। उस सार्वभौम प्रेमालंबन के सम्मुख मनुष्य का हृदय निराले प्रेमलोक में फूला फूला फिरता है। अत: इन कृष्ण भक्त कवियों के संबंध में यह कह देना आवश्यक है कि वे अपने रंग में मस्त रहने वाले जीव थे, तुलसीदास जी के समान लोकसंग्रह का भाव इनमें न था। समाज किधर जा रहा है, इस बात की परवा ये नहीं रखते थे, यहाँ तक कि अपने भगवत्प्रेम की पुष्टि के लिए जिस श्रृंगारमयी लोकोत्तर छटा और आत्मोत्सर्ग की अभिव्यंजना से इन्होंने जनता को रसोन्मत्त किया, उसका लौकिक स्थूल दृष्टि रखनेवाले विषय वासनापूर्ण जीवों पर कैसा प्रभाव पड़ेगा, इसकी ओर इन्होंने ध्यान न दिया। जिस राधा और कृष्ण के प्रेम को इन भक्तों ने अपनी गूढ़ातिगूढ़ चरम भक्ति का व्यंजक बनाया उसको लेकर आगे के कवियों ने श्रृंगार की उन्मादकारिणी उक्तियों से हिन्दी काव्य को भर दिया।

कृष्णचरित के गान में गीतकाव्य की जो धरा पूरब में जयदेव और विद्यापति ने बहाई, उसी का अवलंबन ब्रज के भक्त कवियों ने भी किया। आगे चलकर अलंकारकाल के कवियों ने अपनी श्रृंगारमयी मुक्तक कविता के लिए राधा और कृष्ण का ही प्रेम लिया। इस प्रकार कृष्ण संबंधी कविता का स्फुरण मुक्तक के क्षेत्र में ही हुआ, प्रबंध क्षेत्र में नहीं। बहुत पीछे संवत् 1809 में ब्रजवासीदास ने रामचरितमानस के ढंग पर दोहों, चौपाइयों में प्रबंधकाव्य के रूप में कृष्णचरित का वर्णन किया, पर ग्रंथ बहुत साधरण कोटि का हुआ और उसका वैसा प्रसार न हो सका। कारण स्पष्ट है। कृष्णभक्त कवियों ने श्रीकृष्ण भगवान के चरित का जितना अंश लिया वह एक अच्छे प्रबंधकाव्य के लिए पर्याप्त न था। उनमें मानव जीवन की वह अनेकरूपता न थी जो एक अच्छे प्रबंधकाव्य के लिए आवश्यक है। कृष्णभक्त कवियों की परंपरा अपने इष्टदेव की केवल बाललीला और यौवन लीला लेकर ही अग्रसर हुई जो गीत और मुक्तक के लिए ही उपयुक्त थी। मुक्तक के क्षेत्र में कृष्णभक्त कवियों तथा आलंकारिक कवियों ने श्रृंगार और वात्सल्य रसों को पराकाष्ठा पर पहुँचा दिया, इसमें कोई संदेह नहीं।

पहले कहा गया है कि श्री बल्लभाचार्य जी की आज्ञा से सूरदास जी ने श्रीमद्भागवत् की कथा को पदों में गाया। इनके सूरसागर में वास्तव में भागवत के दशम स्कंध की कथा संक्षेपत: इतिवृत्त के रूप में थोड़े से पदों में कह दी गई है। सूरसागर में कृष्ण जन्म से लेकर श्रीकृष्ण के मथुरा जाने तक की कथा अत्यंत विस्तार से फुटकल पदों में गाई गई है। भिन्न भिन्न लीलाओं के प्रसंग को लेकर इस सच्चे रसमग्न कवि ने अत्यंत मधुर और मनोहर पदों की झड़ी सी बाँध दी है। इन पदों के संबंध में सबसे पहली बात ध्यान देने की यह है कि चलती हुई ब्रजभाषा में सबसे पहली साहित्य रचना होने पर भी ये इतने सुडौल और परिमार्जित हैं। यह रचना इतनी प्रगल्भ और काव्यपूर्ण है कि आगे होनेवाले कवियों की श्रृंगार और वात्सल्य की उक्तियाँ सूर की जूठी सी जान पड़ती हैं। अत: सूरसागर किसी चली आती हुई गीतकाव्य परंपरा का चाहे वह मौखिक ही रही हो पूर्ण विकास सा प्रतीत होता है।

गीतों की परंपरा तो सभ्य असभ्य सब जातियों में अत्यंत प्राचीनकाल से चली आ रही है। सभ्य जातियों ने लिखित साहित्य के भीतर भी उनका समावेश किया है। लिखित रूप में आकर उनका रूप पंडितों की काव्यपरंपरा की रूढ़ियों के अनुसार बहुत कुछ बदल जाता है। इससे जीवन के कैसे कैसे योग सामान्य जनता का मर्म स्पर्श करते आए हैं और भाषा की किन किन पद्ध तियों पर वे अपने गहरे भावों की व्यंजना करते आए हैं, इसका ठीक पता हमें बहुत काल से चले आते हुए मौखिक गीतों से ही लग सकता है। किसी देश की काव्यधरा के मूल प्राकृतिक स्वरूप का परिचय हमें चिरकाल से चले आते हुए इन्हीं गीतों से मिल सकता है। घर घर प्रचलित स्त्रियों के घरेलू गीतों में श्रृंगार और करुण दोनों का बहुत स्वाभाविक विकास हम पाएँगे। इसी प्रकार आल्हा, कड़खा, आदिपुरुषों के गीतों में वीरता की व्यंजना की सरल स्वाभाविक पद्ध ति मिलेगी। देश की अंतर्वर्तिनी मूल भावधारा के स्वरूप के ठीक ठीक परिचय के लिए ऐसे गीतों का पूर्ण संग्रह बहुत आवश्यक है। पर इस संग्रह कार्य में उन्हीं का हाथ लगाना ठीक है जिन्हें भारतीय संस्कृति के मार्मिक स्वरूप की परख हो जिनमें पूरी ऐतिहासिक दृष्टि हो।

स्त्रियों के बीच चले आते हुए बहुत पुराने गीतों को ध्यान से देखने पर पता लगेगा कि उनमें स्वकीया के ही प्रेम की सरल गंभीर व्यंजना है। परकीया प्रेम के जो गीत हैं वे कृष्ण और गोपिकाओं की प्रेमलीला को ही लेकर चले हैं, इससे उन पर भक्ति या धर्म का भी कुछ रंग चढ़ा रहता है। इस प्रकार के मौखिक गीत देश के प्राय: सब भागों में गाए जाते थे। मैथिल कवि विद्यापति (संवत् 1460) की पदावली में हमें उनका साहित्यिक रूप मिलता है। जैसा कि हम पहले कह आए हैं, सूर के श्रृंगारी पदों की रचना बहुत कुछ विद्यापति की पद्धति पर हुई है। कुछ पदों के तो भाव भी बिल्कुल मिलते हैं, जैसे :

अनुखन माधव माधव सुमिरइत सुंदरी भेलि मधई।

ओ निज भाव सुभावहि बिसरल अपने गुन लुबधई

×××

भोरहि सहचरि कातर दिठि हेरि छल छल लोचन पानि।

अनुखन राधा राधा रटइत आध आध बानि

राध सयँ जब पनितहि माधव माधव सयँ जब राधा

दारुन प्रेम तबहि नहिं टूटत बाढ़त बिरह क बाधा

दुहुँ दिसि दारु दहन जइसे दगधइ आकुल कीट परान।

ऐसन बल्लभ हेरि सुधमुखि कवि विद्यापति भान

इस पद का भावार्थ यह है कि प्रतिक्षण कृष्ण का स्मरण करते करते राधा कृष्ण रूप हो जाती हैं और अपने को कृष्ण समझकर राधा के वियोग में राधा राधारटने लगती हैं। फिर जब होश में आती हैं तब कृष्ण के विरह में संतप्त होकर फिर कृष्ण कृष्णकरने लगती हैं। इस प्रकार अपनी सुध में रहती हैं तब भी, नहीं रहती हैं तब भी दोनों अवस्थाओं में उन्हें विरह का ताप सहना पड़ता है। उनकी दशा उस लकड़ी के भीतर के कीड़े सी रहती है जिसके दोनों छोरों पर आग लगी हो। अब इसी भाव का सूर का यह पद देखिए :

सुनौ स्याम! यह बात और कोउ क्यों समुझायकहै।

दुहुँ दिसि की रति बिरह बिरहिनी कैसे कै जो सहै

जब राधो, तब ही मुख माधौ माधौरटति रहै।

जब माधौ ह्वै जाति सकल तनु राध बिरह दहै

उभय अग्र दव दारुकीट ज्यों सीतलताहि चहै।

सूरदास अति विकल बिरहिनी कैसेहु सुख न लहै।

(सूरदास, पृ. 564 वेंकटेश्वर)

सूरसागरमें जगह जगह दृष्टिकूट वाले पद मिलते हैं। यह भी विद्यापति का अनुकरण है। सारंगशब्द को लेकर सूर ने कई जगह कूट पद कहे हैं। विद्यापति की पदावली में इसी प्रकार का एक कूट देखिए :

सारंग नयन, बयन पुनि सारंग, सारंग तसु समधने।

सारंग उपर उगल दस सारंग केलि करथि मधु पाने।

पच्छिमी हिन्दी बोलने वाले सारे प्रदेशों में गीतों की भाषा ब्रज ही थी। दिल्ली के आसपास भी गीत ब्रजभाषा में ही गाए जाते थे, यह हम खुसरो (संवत् 1340) के गीतों में दिखा आए हैं। कबीर (संवत् 1560) के प्रसंग में कहा जा चुका है कि उनकी साखी की भाषा तो सधुक्कड़ीहै, पर पदों की भाषा काव्य में प्रचलित ब्रजभाषा है। यह एक पद तो कबीर और सूर दोनों की रचनाओं के भीतर ज्यों का त्यों मिलता है

है हरिभजन को परवान।

नीच पावै ऊँच पदवी, बाजते नीसान।

भजन को परताप ऐसो तिरे जल पाषान।

अधम भील, अजाति गनिका चढ़े जात बिवाँन।

नवलख तारा चलै मंडल, चलै ससहर भान।

दास धू कौ अटल पदवी राम को दीवान।

निगम जाकी साखि बोलैं कथैं संत सुजान।

जन कबीर तेरो सरनि आयो, राखि लेहु भगवान

(कबीर ग्रंथावली, पृ. 190)

है हरि भजन को परमान।

नीच पावै ऊँच पदवी, बाजते नीसान।

भजन को परताप ऐसों जल तरै पाषान।

अजामिल अरु भील गनिका चढ़े जात विमान।

चलत तारे सकल मंडल, चलत ससि अरु भान।

भक्त धरुव को अटल पदवी राम को दीवान।

निगम जाको सुजस गावत, सुनत संत सुजान।

सूर हरि की सरन आयौ, राखि ले भगवान

(सूरसागर, पृ. 564, वेंकटेश्वर)

कबीर की सबसे प्राचीन प्रति में भी यह पद मिलता है इससे नहीं कहा जा सकता कि सूर की रचनाओं के भीतर यह कैसे पहुँच गया।

राधाकृष्ण की प्रेमलीला के गीत सूर के पहले से चले आते थे, यह तो कहा ही जा चुका है। बैजू बावरा एक प्रसिद्ध गवैया हो गया है जिसकी ख्याति तानसेन के पहले देश में फैली हुई थी। उसका एक पद देखिए :

मुरली बजाय रिझाय लई मुख मोहन तें।

गोपी रीझि रही रसतानन सों सुधबुध सब बिसराई।

धुनि सुनि मन मोहे, मगन भई देखत हरि आनन।

जीव जंतु पसु पंछी सुर नर मुनि मोहे, हरे सब के प्रानन।

बैजू बनवारी बंसी अधर धरि वृंदावनचंद बस किए सुनत ही कानन

जिस प्रकार रामचरित का गान करने वाले कवियों में गोस्वामी तुलसीदास जी का स्थान सर्वश्रेष्ठ है उसी प्रकार कृष्णचरित गानेवाले भक्त कवियों में महात्मा सूरदास जी का। वास्तव में ये हिन्दी काव्य गगन के सूर्य और चंद्र हैं। जो तन्मयता इन दोनों भक्त शिरोमणि कवियों की वाणी में पाई जाती है वह अन्य कवियों में कहाँ? हिन्दी काव्य इन्हीं के प्रभाव से अमर हुआ, इन्हीं की सरसता से उसका स्रोत सूखने न पाया। सूर की स्तुति में, एक संस्कृत श्लोक के भाव को लेकर यह दोहा कहा गया है :

उत्तम पद कवि गंग के, कविता को बल वीर।

केशव अर्थ गँभीर को, सूर तीन गुन धीर

इसी प्रकार यह दोहा भी बहुत प्रसिद्ध है

किधौं सूर को सर लग्यो, किधौं सूर को पीर।

किधौं सूर को पद लग्यो, बेधयो सकल सरीर

यद्यपि तुलसी के समान सूर का काव्यक्षेत्र इतना व्यापक नहीं कि उसमें जीवन की भिन्न भिन्न दशाओं का समावेश हो पर जिस परिमित पुण्यभूमि में उनकी वाणी ने संचरण किया उसका कोई कोना अछूता न छूटा। श्रृंगार और वात्सल्य के क्षेत्र में जहाँ तक इनकी दृष्टि पहुँची वहाँ तक और कोई किसी कवि की नहीं। इन दोनों क्षेत्रों में तो इस महाकवि ने मानो औरों के लिए कुछ छोड़ा ही नहीं। गोस्वामी तुलसीदास जी ने गीतावली में बाललीला को इनकी देखादेखी बहुत अधिक विस्तार दिया सही, पर उसमें बालसुलभ भावों और चेष्टाओं की वह प्रचुरता नहीं आई, उसमें रूप वर्णन की ही प्रचुरता रही। बाल चेष्टा के स्वाभाविक मनोहर चित्रों का इतना बड़ा भंडार और कहीं नहीं। दो-चार चित्र देखिए :

  1. काहे को आरि करत मेरे मोहन! यों तुम ऑंगन लोटी?

जो माँगहु सो देहुँ मनोहर, यहै बात तेरी खोटी।

सूरदास को ठाकुर ठाढ़ो हाथ लकुट लिए छोटी

  1. सोभित कर नवनीत लिए।

घुटुरुन चलन रेनु तन मंडित, मुख दधि लेप किए

  1. सिखवति चलन जसोदा मैया।

अरबराय कर पानि गहावति, डगमगाय धरै पैयाँ

  1. पाहुनि करि दै तनक मह्यौ।

आरि करै मनमोहन मेरो, अंचल आनि गह्यो

व्याकुल मथत मथनियाँ रीती, दधि भ्वैं ढरकि रह्यौ

बालकों के स्वाभाविक भावों की व्यंजना के न जाने कितने सुंदर पद भरे पड़े हैं। स्पर्धाका कैसा सुंदर भाव इस प्रसिद्ध पद में आया है

मैया कबहिं बढ़ैगी चोटी!

कितिक बार मोहिं दूध पियत भइ, यह अजहूँ है छोटी।

तू जो कहति बलकी बेनी ज्यों ह्वैहै लाँबी मोटी

इसी प्रकार बालकों के क्षोभ के ये वचन देखिए

खेलत में को काको गुसैयाँ?

जाति पाँति हम तें कछु नाहीं, नाहिंन बसत तुम्हारी छैयाँ।

अति अधिकार जनावत यातें, अधिक तुम्हारे हैं कछु गैयाँ

वात्सल्य के समान ही श्रृंगार के संयोग और वियोग दोनों पक्षों का इतना प्रचुर विस्तार और किसी कवि में नहीं। गोकुल में जब तक श्रीकृष्ण रहे तब तक का उनका सारा जीवन ही संयोगपक्ष है। दानलीला, माखनलीला, चीरहरणलीला, रासलीला आदि न जाने कितनी लीलाओं पर सहस्रों पद भरे पड़े हैं। राधाकृष्ण के प्रेम के प्रादुर्भाव में कैसी स्वाभाविक परिस्थियों का चित्रण हुआ है, यही देखिए

(क) करि ल्यौ न्यारी, हरि आपनि गैयाँ।

नहिं न बसात लाल कछु तुमसों सबै ग्वाल इक ठैयाँ

(ख) धोनु दुहत अति ही रति बाढ़ी।

एक धर दोहनि पहुँचावत, एक धर जहँ प्यारी ठाढ़ी।

मोहन कर तें धर चलति पय मोहनि मुख अति ही छबि बाढ़ी

श्रृंगार के अंतर्गत भावपक्ष और विभावपक्ष दोनों के अत्यंत विस्तृत और अनूठे वर्णन इस सागर के भीतर लहरें मार रहे हैं। राधाकृष्ण के रूपवर्णन में ही सैकड़ों पद कहे गए हैं जिनमें उपमा, रूपक और उत्प्रेक्षा आदि की प्रचुरता है। आँख पर ही न जाने कितनी उक्तियाँ हैं, जैसे :

देखि री! हरि के चंचल नैन।

खंजन मीन, मृगज चपलाई, नहिं पटतर एक सैन।

राजिवदल इंदीवर, शतदल, कमल, कुशेशय जाति।

निसि मुद्रित प्रातहि वै बिगसत, ये बिगसे दिन राति

अरुन असित सित झलक पलक प्रति, को बरनै उपमाय।

मानो सरस्वति गंग जमुन मिलि आगम कीन्हों आय

नेत्रों के प्रति उपालंभ भी कहीं कहीं बड़े मनोहर हैं

मेरे नैना बिरह की बेल बई।

सींचत नैन नीर के, सजनी! मूल पताल गई।

बिगसति लता सुभाय आपने छाया सघन भई

अब कैसे निरुवारौं, सजनी! सब तन पसरि गई

आँख तो आँख, कृष्ण की मुरली तक में प्रेम के प्रभाव से गोपियों की ऐसी सजीवता दिखाई पड़ती है कि वे अपनी सारी प्रगल्भता उसे कोसने में खर्च कर देती हैं :

मुरली तऊ गोपालहि भावति।

सुन री सखी! जदपि नँदनंदहि नाना भाँति नचावति

राखति एक पाँय ठाढ़े करि, अति अधिकार जनावति।

आपुनि पौढ़ि अधर सज्जा पर करपल्लव सों पद पलुटावति

भृकुटी कुटिल कोप नासापुट हम पर कोपि कोपावति।

कालिंदी के कूल पर शरत् की चाँदनी में होने वाले रास की शोभा का क्या कहना है, जिसे देखने के लिए सारे देवता आकर इकट्ठे हो जाते थे। सूर ने एक न्यारे प्रेमलोक की आनंद छटा अपने बंद नेत्रों से देखी है। कृष्ण के मथुरा चले जाने पर गोपियों का जो विरहसागर उमड़ा है उसमें मग्न होने पर तो पाठकों को वार पार नहीं मिलता। वियोग की जितने प्रकार की दशाएँ हो सकती हैं सबका समावेश उसके भीतर है। कभी तो गोपियों को संध्या होने पर यह स्मरण आता है :

एहि बेरियाँ बन तें चलि आवते।

दूरहिं ते वह बेनु, अधर धरि बारम्बार बजावते

कभी वे अपने उजड़े हुए नीरस जीवन के मेल में न होने के कारण वृंदावन के हरे भरे पेड़ों को कोसती हैं :

मधुबन तुम कत रहत हरे?

बिरह बियोग स्यामसुंदर के ठाढ़े क्यों न जरे?

तुम हौ निलज, लाज नहिं तुमको, फिर सिर पुहुप धरे

ससा स्यार औ बन के पखेरू धिक धिक सबन करे।

कौन काज ठाढ़े रहे वन में, काहे न उकठि परे

परंपरा से चले आते हुए चंद्रोपालंभ आदि सब विषयों का विधन सूर के वियोगवर्णन के भीतर है, कोई बात छूटी नहीं है।

सूर की बड़ी भारी विशेषता है नवीन प्रसंगों की उद्भावना। प्रसंगोद्भावना करने वाली ऐसी प्रतिभा हम तुलसी में नहीं पाते। बाललीला और प्रेमलीला दोनों के अंतर्गत कुछ दूर तक चलने वाले न जाने कितने छोटे छोटे मनोरंजक वृत्तों की कल्पना सूर ने की है। जीवन के एक क्षेत्र के भीतर कथावस्तु की यह रमणीय कल्पना ध्यान देने योग्य है।

राधाकृष्ण के प्रेम को लेकर कृष्णभक्ति की जो काव्यधरा चली उसमें लीलापक्ष अर्थात् बाह्यार्थविधान की प्रधानता रही है। उसमें केलि, विलास, रास, छेड़छाड़, मिलन की युक्तियों आदि बाहरी बातों का ही विशेष वर्णन है। प्रेमलीन हृदय की नाना अनुभूतियों की व्यंजना कम है। वियोग वर्णन में कुछ संचारियों का समावेश मिलता है पर वे रूढ़ और परंपरागत है उनमें उद्भावना बहुत थोड़ी पाई जाती है। भ्रमरगीत के अंतर्गत अलबत्ता सूर ने आभ्यंतर पक्ष का भी विस्तृत उद्धाटन किया है। प्रेमदशा के भीतर की न जाने कितनी मनोवृत्तियों की व्यंजना गोपियों के वचनों द्वारा होती है।

सूरसागर का सबसे मर्मस्पर्शी और वाग्वैदग्धपूर्ण अंश भ्रमरगीतहै जिसमें गोपियों की वचनवक्रता अत्यंत मनोहारिणी है। ऐसा सुंदर उपालंभ काव्य और कहीं नहीं मिलता। उद्धव तो अपने निर्गुण ब्रह्मज्ञान और योगकथा द्वारा गोपियों को प्रेम से विरत करना चाहते हैं और गोपियाँ उन्हें कभी पेट भर बनाती हैं, कभी उनसे अपनी विवशता और दीनता का निवेदन करती हैं। उद्धव के बहुत बकने पर वे कहतीहैं

ऊधौ! तुम अपनो जतन करौ।

हित की कहत कुहित की लागै, किन बेकाज ररौ

जाय करौ उपचार आपनो, हम जो कहति हैं जी की।

कछू कहत कछुवै कहि डारत, धुन देखियत नहिं नीकी

इस भ्रमरगीत का महत्व एक बात से और बढ़ गया है। भक्तशिरोमणि सूर ने इसमें सगुणोपासना का निरूपण बड़े ही मार्मिक ढंग से हृदय की अनुभूति के आधार पर, तर्क पद्धति पर नहीं किया है। सगुण निर्गुण का यह प्रसंग सूर अपनी ओर से लाए हैं जिससे संवाद में बहुत रोचकता आ गई है। भागवत में यह प्रसंग नहीं है। सूर के समय में निर्गुण संत संप्रदाय की बातें जोर शोर से चल रही थीं। इसी से उपयुक्त स्थल देखकर सूर ने इस प्रसंग का समावेश कर दिया। जब उद्धव बहुत सा वाग्विस्तार करके निर्गुण ब्रह्म की उपासना का उपदेश बराबर देते चले जाते हैं तब गोपियाँ बीच में रोककर इस प्रकार पूछती हैं :

निर्गुन कौन देस को वासी?

मधुकर हँसि समुझाय, सौंह दै बूझति साँच, न झाँसी।

और कहती हैं कि चारों ओर भासित इस सगुणसत्ता का निषेध करके तू क्यों व्यर्थ उसके अव्यक्त और अनिर्दिष्ट पक्ष को लेकर यों ही बक बक करता है :

सुनिहै कथा कौन निर्गुन की, रचि पचि बात बनावत।

सगुन सुमेरु प्रगट देखियत, तुम तृन की ओट दुरावत।

उस निर्गुण और अव्यक्त का मानव हृदय के साथ भी कोई संबंध हो सकता है, यह तो बताओ :

रेख न रूप, बरन जाके नहि ताको हमैं बतावत।

अपनी कहौं, दरस ऐसो को तुम कबहूँ हौ पावत?

मुरली अधर धरत है सो, पुनि गोधन बन बन चारत?

नैन बिसाल, भौंह बंकट करि देख्यौ कबहूँ निहारत?

तन त्रिभंग करि, नटवर वपु धरि, पीतांबर तेहि सोहत?

सूर स्याम ज्यौं देत हमैं सुख त्यौं तुमको सोउ मोहत?

अंत में वे यह कहकर बात समाप्त करती हैं कि तुम्हारे निर्गुण से तो हमें कृष्ण के अवगुणों में ही अधिक रस जान पड़ता है :

ऊनो कर्म कियो मातुल बधि, मदिरा मत्ता प्रमाद।

सूर स्याम एते अवगुन में निर्गुन तें अति स्वाद।।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल, प्रकरण 5—सगुणधारा : कृष्णभक्ति शाखा)

 

सूरदासकी साहित्यलहरी की टीका में एक पद ऐसा आया है जिसमें सूर की वंशावली दी है। वह पद यह है :

प्रथम ही प्रथु यज्ञ तें भे प्रगट अद्भुत रूप।

ब्रह्मराव विचारि ब्रह्मा राखु नाम अनूप

पान पय देवी दियो सिव आदि सुर सुख पाय।

कह्यो दुर्गा पुत्र तेरो भयो अति अधिकाय

पारि पाँयन सुरन के सुर सहित अस्तुति कीन।

तासु वंस प्रसंस में भौ चंद चारु नवीन

भूप पृथ्वीराज दीन्हों तिन्हें ज्वाला देस।

तनय ताके चार कीनो प्रथम आप नरेस

दूसरे गुनचंद ता सुत सीलचंद सरूप।

वीरचंद प्रताप पूरन भयो अद्भुत रूप

रणथंभौर हमीर भूपति संगत खेलत जाय।

तासु बंस अनूप भो हरिचंद अति विख्याय

आगरे रहि गोपचल में रह्यो ता सुत वीर।

पुत्र जनमे सात ताके महा भट गंभीर

कृष्णचंद उदारचंद जु रूपचंद सुभाइ।

बुद्धि चंद प्रकास चौथे चंद भे सुखदाइ

देवचंद प्रबोध संसृतचंद ताको नाम।

भयो सप्तो नाम सूरजचंद मंद निकाम।

इन दोनों वंशावलियों के मिलाने पर मुख्य भेद यह प्रकट होता है कि नानूराम ने जिनको जल्लचंद की वंश परंपरा में बताया है, उक्त पद में उन्हें गुणचंद की परंपरा में कहा गया है। बाकी नाम प्राय: मिलते हैं।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, वीरगाथा काल, प्रकरण 3—देशभाषा काव्य)

कभी सूरदास जी द्वारा तुलसीदास की स्तुति का यह पद प्रकाशित होता है :

धन्य भाग्य मम संत सिरोमनि चरन कमल तकि आयउँ।

दया दृष्टि ते मम दिसि हेरेउ, तत्व स्वरूप लखायो।

कर्म उपासन ज्ञान जनित भ्रम संसय सूल नसायो।।

इस पद के अनुसार सूरदास का कर्मउपासन ज्ञानजनित भ्रमबल्लभाचार्य जी ने नहीं तुलसीदास जी ने दूर किया था। सूरदास जी तुलसीदास जी से अवस्था में बहुत बड़े थे और उनसे पहले प्रसिद्ध भक्त हो गए थे, यह सब लोग जानते हैं।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, वीरगाथा काल, प्रकरण 4सगुणधारा : रामभक्ति शाखा)

सूरदास ने भी भक्तों की इस पद्ध ति का अवलंबन किया है। यह तो निर्विवाद है कि बल्लभाचार्य जी से दीक्षा लेने के उपरांत सूरदास जी गोवर्द्धन पर श्रीनाथ जी के मंदिर में कीर्तन किया करते थे। अपने सूरसागर के दशम् स्कंध के आरंभ में सूरदास ने श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए अपने को ढाढ़ी के रूप में नंद के द्वार पर पहुँचाया है :

नंद जू! मेरे मन आनंद भयो, हौं गोवर्ध्दन तें आयो।

तुम्हरे पुत्र भयो मैं सुनि कै अति आतुर उठि धयो।

×××

जब तुम मदनमोहन करि टेरौ, यह सुनि कै घर जाऊँ।

हौं तौ तेरे घर को ढाढ़ी, सूरदास मेरो नाऊँ।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, वीरगाथा काल, प्रकरण 4—सगुणधारा : रामभक्ति शाखा)

साहित्य की भाषा में, जो वीरगाथा काल के कवियों के हाथ में बहुत कुछ अपने पुराने रूप में ही रही, प्रचलित भाषा के संयोग से नया जीवन सगुणोपासक कवियों द्वारा प्राप्त हुआ। भक्तवर सूरदास जी ब्रज की चलती भाषा को परंपरा से चली आती हुई काव्यभाषा के बीच पूर्ण रूप से प्रतिष्ठित करके साहित्यिक भाषा को लोकव्यवहार के मेल में लाए। उन्होंने परंपरा से चली आती हुई काव्यभाषा का तिरस्कार न करके उसे एक नया चलता रूप दिया। सूरसागर को ध्यानपूर्वक देखने से उसमें क्रियाओं के कुछ पुराने रूप, कुछ सर्वनाम (जैसे जासु तासु, जेहि तेहि) तथा कुछ प्राकृत के शब्द पाए जाएँगे।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, वीरगाथा काल, प्रकरण 4—सगुणधारा : रामभक्ति शाखा)

सूरदास में ऐसे वाक्य मिलते हैं जो विचारधरा आगे बढ़ाने में कुछ भी योग देते नहीं पाए जाते, केवल पादप्रत्यर्थ ही लाए हुए जान पड़ते हैं। इसी प्रकार तुकांत के लिए शब्द भी तोड़े मरोड़े गए हैं।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, वीरगाथा काल, प्रकरण 4—सगुणधारा : रामभक्ति शाखा)

सूरदास की भाषा में यत्र तत्र पूरबी प्रयोग, जैसे मोर, हमार, कीन, अस, जस इत्यादि,बराबर मिलते हैं।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, रीतिकाल, प्रकरण 1—सामान्य परिचय)

भक्तिकाल की प्रारंभिक अवस्था में ही किस प्रकार मुसलमानों के संसर्ग से कुछ फारसी के शब्द और चलते भाव मिलने लगे थे, इसका उल्लेख हो चुका है। नामदेव और कबीर आदि की तो बात ही क्या, तुलसीदास ने भी गनी, गरीब, साहब, इताति, उमरदराज आदि बहुत से शब्दों का प्रयोग किया। सूर में ऐसे शब्द अवश्य कम मिलते हैं।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, रीतिकाल, प्रकरण 1—सामान्य परिचय)

विद्यापति और सूरदास की गीत पद्धति पर इन्होंने बहुत विस्तृत और बड़ी सुंदर रचना की है। सूरदास जी की रचना में संस्कृत की कोमलकांत पदावलीऔर अनुप्रासों की वह विचित्र योजना नहीं है जो गोस्वामी जी की रचना में है। दोनों भक्त शिरोमणियों की रचना में यह भेद ध्यान देने योग्य है और इस पर ध्यान अवश्य जाता है।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, वीरगाथा काल, प्रकरण 4—सगुणधारा : रामभक्ति शाखा)

‘गीतावली’ की रचना गोस्वामी जी ने सूरदास जी के अनुकरण पर की है। बाललीला के कई एक पद ज्यों के त्यों सूरसागर में भी मिलते हैं, केवल ‘राम’ ‘श्याम’ का अंतर है। लंकाकांड तक तो कथा की अनेकरूपता के अनुसार मार्मिक स्थलों का जो चुनाव हुआ है वह तुलसी के सर्वथा अनुरूप है। पर उत्तरकांड में जाकर सूर पद्धति के अतिशय अनुकरण के कारण उनका गंभीर व्यक्तित्व तिरोहित सा हो गया है। जिस रूप में राम को उन्होंने सर्वत्र लिया है, उनका भी ध्यान उन्हें नहीं रह गया। ‘सूरदास’ में जिस प्रकार गोपियों के साथ श्रीकृष्ण हिंडोला झूलते हैं, होली खेलते हैं, वही करते राम भी दिखाए गए हैं। इतना अवश्य है कि सीता की सखियों और पुरनारियों का राम की ओर पूज्यभाव ही प्रकट होता है। राम की नखशिख शोभा का अलंकृत वर्णन भी सूर की शैली पर बहुत से पदों में लगातार चला गया है। सरयूतट के इस आनंदोत्सव को आगे चलकर रसिक लोग क्या रूप देंगे इसका ख्याल गोस्वामी जी को न रहा।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, वीरगाथा काल, प्रकरण 4—सगुणधारा : रामभक्ति शाखा)

बाबा बेनीमाधवदास के गोसाईंचरितके अनुसार रामगीतावली और कृष्णगीतावली दोनों ग्रंथ चित्रकूट में उस समय के कुछ पीछे लिखे गए जब सूरदास जी उनसे मिलने वहाँ गए थे।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, वीरगाथा काल, प्रकरण 4—सगुणधारा : रामभक्ति शाखा)

कृष्णभक्त सूरदास जी की श्रृंगारी रचना का कुछ अनुकरण गोस्वामी जी की गीतावलीके उत्तरकांड में दिखाई पड़ता है पर वह केवल आनंदोत्सव तक रह गया है। इधर आकर कृष्णभक्ति शाखा का प्रभाव बहुत बढ़ा। विषयवासना की ओर मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति के कारण कुछ दिनों से रामभक्ति मार्ग के भीतर भी श्रृंगारी भावना का अनर्गल प्रवेश हो रहा है।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, वीरगाथा काल, प्रकरण 4—सगुणधारा : रामभक्ति शाखा)

‘चौरासी वैष्णवों की वार्ता’ में सूरदास की एक वार्ता के अंतर्गत प्रेम को ही मुख्य और श्रद्धा या पूज्यबुद्धि को ही आनुषंगिक या सहायक कहा गया है।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल, प्रकरण 5—सगुणधारा : कृष्णभक्ति शाखा)

सूरदास के सवा लाख पद बनाने की जनश्रुति है।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, रीतिकाल, प्रकरण 3—अन्य कवि)

‘सूरदास प्रभु वै अति खोटे’, ‘कारो कृतहि न मानै’ ऐसे ऐसे वाक्यों पर साहित्यिक दृष्टि से जो थोड़ा भी ध्यान देगा, वह जान लेगा कि कृष्ण न तो वास्तव में खोटे कहे गए हैं, न कालेकलूटे कृतघ्न। पहला वाक्य सखी की विनोद या परिहास की उक्ति है, सरासर गाली नहीं है। सखी का यह विनोद हर्ष का ही एक स्वरूप है जो उस सखी का राधाकृष्ण के प्रति रतिभाव व्यंजित करता है। इसी प्रकार दूसरा वाक्य विरहाकुल गोपी का वचन है जिससे कुछ विनोदमिश्रित अमर्ष व्यंजित होता है। यह अमर्ष, यहाँ विप्रलंभ श्रृंगार में रतिभाव का ही व्यंजक है।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 4—गद्य का प्रसार : समालोचना)