मुहम्मद क़ुली क़ुत्बशाह (1580-1612 ई.) : दक्खिनी हिंदू-उर्दू के महान कवि)

मुहम्मद क़ुली क़ुत्बशाह (1580-1612 ई.) : दक्खिनी हिंदी-उर्दू के महान कवि

महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने दक्खिनी गद्य-पद्य के इतिहास को तीन काल-खंडों में विभाजित किया है—आदिकाल (1400 1500 ई.), मध्यकाल (15001657 ई.) और उत्तरकाल (16571840 ई.), जबकि उर्दू के विद्वान नसीरुद्दीन हाशिमी ने दक्खिनी साहित्य को आठ काल-खंडों में विभाजित किया है।

दक्खिनी गद्य-पद्य-रचना को हिंदी वाले ‘हिंदी-रचना’ और उर्दू वाले ‘उर्दू-रचना’ कहते हैं। दोनों के अपने-अपने तर्क हैं और दोनों ही बड़े ज़ोरदार और जानदार हैं। हिंदी वालों ने दक्खिनी गद्य-पद्य के जितने भी संग्रह प्रकाशित किए हैं, उन्हें ‘दक्खिनी हिंदी’ का नाम दिया है, जबकि उर्दू वालों ने ‘दक्खिनी उर्दू’ के नाम से सुशोभित किया है। दक्खिनी साहित्य की एक ही रचना को हिंदी वालों ने ‘हिंदी’ और उर्दू वालों ने ‘उर्दू’ नाम से पुकारा है। उदाहरण के लिए, ‘दक्खिनी हिंदी-काव्यधारा’ (बिहार राष्ट्रभाषा-परिषद, पटना, शकाब्द 1980 ई.), ‘दक्खिनी हिंदी काव्य चयनिका’ (डॉ. रहमत उल्लाह, हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, सन् 1998 ई.) आदि तथा ‘दकन में उर्दू” (नसीरुद्दीन हाशिमी, तरक़्क़ी उर्दू ब्यूरो, नई दिल्ली, मार्च 1985 ई.)। अभी भी दक्खिनी की अधिकतर रचनाएं फ़ारसी लिपि में ही हैं और देवनागरी लिपि में लिप्यंतरण की बाट जोह रही हैं।

मुहम्मद क़ुली क़ुत्बशाह मध्यकाल (15001657 ई.) के कवि हैं। कहा जाता है कि उन्होंने एक लाख से अधिक शेअर (द्विपदी) की रचना करके हिंदी-उर्दू काव्य को समृद्ध किया है। सरलता और माधुर्य उनकी कवताओं की विशेषताएँ हैं। उनकी रचनाओं में प्रेम की संवेदना के साथ-साथ नारी सौंदर्य एवं प्रकृति सौंदर्य का प्रभावशाली चित्रण हुआ है। उसके शासनकाल में समय में हिंदी-उर्दू गद्य-पद्य दोनों का पर्याप्त विकास हुआ। उनकी रचनाओं में भारतीय संस्कृति के विविध रंग अंकित होते हैं, विविध रंगों के मनमोहक चित्रांकन भारतीय संस्क़ति की विविधता में एकता खूबी को बख़ूबी प्रकट करते हैं। उन्हें उर्दू का पहला दीवान (काव्य-संग्रह) वाला कवि होने का गौरव प्राप्त है, जिसे क़ुली उनके भतीजे और दामाद क़ुत्बशाह ने 1604 ई. में संकलित करके अत्यंत सुंदर रूप-सज्जा के साथ प्रकाशित करवाया।

सुल्तान मुहम्मद क़ुली क़ुत्बशाह अपने समय का बहुत बड़ा शायर था। उसकी शायरी में विषय की विविधता है, प्रेम-रस से सराबोर रंगीनियां हैं, जो पाठकों को अनायास ही सम्मोहित कर लेती हैं। वह ज़मीन से जुड़ा शायर था और प्रायः हर विषय की कविता-सरिता बहाई है। उसकी प्रेम-रस में डूबी श्रृंगारिक कविताएं बड़ी मनमोहक हैं। धार्मिक त्योहारों और रीति-रिवाजों पर बहुत-सी कविताएं लिखी हैं। वह मुक्त होकर प्रकृति के क्षेत्र में भी विचरण करता है, वसंत, वर्षा, शरद इत्यादि ऋतुओं के सम्मोहक और जीवंत चित्रण तो करता ही है, विभिन्न सुंदर पशु-पक्षियों, फलों, फूलों, पेड़-पौधों, तरकारियों इत्यादि के जीता-जागता और मनमोहक चित्रण करके पाठकों को सम्मोहित कर लेता है। अपनी प्रेमिका भागमती के, जिसका नाम हैदर महलकी संज्ञा से दकन कि इतिहास में दर्ज है, नाम से सुल्तान मुहम्मद क़ुली क़ुत्बशाह ने भागनगरऔर फिर उसी भागनगरको हैदराबादनाम दिया, जो आज भी ज़िंदा है। हैदर महल की प्रशंसा में कवि ने बहुत-सी कविताएं लिखी हैं, जिनमें उन्होंने अपने पागल प्रेमी हृदय को मानो निकाल कर रख दिया है।

नववर्ष, जलवा (सोहाग), सुख-विलास, कंठमाला राग (संगीत) बसंत, वर्षा, शरद, अपनी प्रेमिका न्हन्नी, सांवली, कंवली, पियारी, गोरी, छबीली, लाला, मोहन, हैदर महल (भागमती), हातम, हिंदी छोरी, पद्मिनी, सुंदर, रंगीली, नाज़नी, चंचल नयन, फ़ितनए-दकन, तिलंगिन, दकन की पुतली, विभिन्न विषयों पर तीन सौ बासठ ग़ज़लें (जिसे अनेक विद्वानों ने प्रेम-गीत भी कहा है), नख-शिख, प्रियतमा आनंदमयी, जगमोहिनी प्रियतमा, मस्त प्रियतमा, प्रेम वियोगिनी, प्रियतमा-दर्शन, अधीर प्रेमी, पागल प्रेमी, प्रेमी-समझावना, प्रेमी-विरह, प्रेम-बाधा, प्रेम-विष, प्रेम-प्रतीक्षा, प्रेम-उल्लास, प्रेम-प्यास, प्रेम-मदिरा, प्रेम-मस्त, प्रेम-सुख, प्रेम-रीति, प्रेम और बुद्धि, प्रेम-स्मृति, प्रेम छंद-छंद, मोहिनी तावीज़, प्रेमालाप, निशा-आगमन, चित्र-काव्य, चांदनी, अन्योक्ति, बुड्ढी की कहानी इत्यादि कविता की वर्षा में पाठक रस से सराबोर हो जाते हैं, अपने रससिक्त हृदय को सदृदय पाठक सहलाते रह जाते हैं।

प्रोफ़ेसर मुहम्मद साबरीन उन्हें लोकप्रिय कवि‘, ‘हर दिल अज़ीज़ शायरघोषित करते हैं और कहते हैं, ”हैदराबाद का संस्थापक और उर्दू का पहला काव्य-संग्रह वाला कवि (साहबे-दीवान शायर) है। अपने दीवान (काव्य-संग्रह) में उसने अपनी शायरी के विषय अधिकतर साधारण जन-जीवन से लिए हैं। त्योहारों, खेल-तमाशों, मौसमों, फलों, फूलों, महलों की शान-शौकत पर उसकी बहुत-सी कविताएँ मिलती हैं। उस दौर के रस्म-रिवाज, गहनों और लिबासों का उल्लेख भी उसने ख़ूबी से किया है। मुहम्मद क़ुली क़ुत्बशाह सच्चे अर्थों में लोकप्रिय शायर था।(उर्दू अदब की तारीख़, नेशनल काउंसिल ऑफ एजुकेशनल रिसर्च एंड ट्रेनिंग, 2004 ई., पृ. 18)

मुहम्मद क़ुली का जन्म 1564 ई. में हुआ था। बाप के मरने के बाद 15 साल की उम्र में 1580 ई. गद्दी पर बैठा और लगातार 32 वर्ष शासन किया। सुल्तान मुहम्म़द क़ुली क़ुत्ब शाह का शासन गोलकुंडा की बहुत ही शांति और समृद्धि का समय था। उनकी कविता पर सूफ़ी विचारधारा की भी छाप है, इसलिए यह कहना मुश्किल है कि वह कहां लौकिक प्रेम-लोक में विचरण करता है और कहां अलौकिक प्रेम-पाश में आबद्ध हो जाता है। यों तो प्रेम और बुद्धि का झगड़ा सभी कवियों के हृदय में रहता है, पर मुहम्मद क़ुली बुद्धि-पंथी नहीं, प्रेम-पंथी हैं। उनकी काव्यगत विशेषताओं पर डॉ. सैयद एजाज़ हुसैन उन शब्दों में प्रकाश डालते हैं—

”मुहम्मद क़ुली क़ुत्बशाह की शैली अत्यंत सरल, मृदुल और माधुर्यपूर्ण है। उसकी शायरी स्थानीय परिवेशगत विशेषताओं से परिपूर्ण है। हिंदुस्तान के रस्मो-रिवाज और त्योहारों पर उसने बहुत-सी कविताएँ कहीं। यहां के फलों, फूलों, तरकारियों, परिंदों को भी नजरअंदाज नहीं किया। उसकी चिंतन-विधि पर हिंदी कविता का भी असर है। उसकी ग़ज़लों में मृदुलता, नवीनता और प्रेमपरक तत्व बहुत हैं। फ़ारसी के शायरों में से वह हाफ़िज़ शीरानी से बहुत प्रभावित है। ‘कुल्लियाते-क़ुली क़ुत्बशाह’ (क़ुली क़ुत्बशाह-काव्य-समग्र) में हमको मसनवी, क़सीदा, तरहबंद (समस्या-पूर्ति), मरसिया, ग़ज़ल सभी काव्य-रूप मिलते हैं, जिनके पढ़ने से उसकी रचनात्मकता और काव्यगत विशेषताओं का क़ायल होना पड़ता है।” (मुख़्तसर तारीख़े-अदबे-उर्दू, उर्दू किताब घर, दिल्ली, दिसंबर 1964 ई., पृ. 25)

क़ुत्बशाही सल्तनत में दक्खिनी साहित्य को शिखर पर पहुंचाने का काम हुआ। प्रोफ़ेसर सूर्यप्रसाद दीक्षित शब्दों में, ”क़ुत्बशाही सल्तनत में भी उर्दू साहित्य को शिखर पर पहुंचाने का काम हुआ। इसका मुख्य कारण यह था कि आठ क़ुत्बशाही बादशाहों में से अंतिम चार बादशाह ख़ुद उर्दू के बड़े शायर थे और शायरों के संरक्षक भी। गोलकुंडा के पांचवें बादशाह मुहम्मद क़ुली क़ुत्बशाह दक्खिनी उर्दू, फ़ारसी और तेलुगु तीनों भाषाओं में काव्य-सृजन करते थे। … क़ुली क़ुत्बशाह की उर्दू शायरी का ऐतिहासिक ऐतिहासिक महत्व है। उनके पहले के उर्दू शायरों ने सूफ़ी मत को ही अपने काव्य में स्थान दिया था। कुली क़ुत्बशाह ने ईश्वरीय प्रेम से संबंधित काव्य-सृजन करने के साथ ही भौतिक प्रेम को भी अपनी शायरी में स्थान दिया।…कुली क़ुत्बशाह ने अपनी शायरी में भारतीयों की अनुभूतियों का प्रमुखता से वर्णन किया। दक्खिनी को फ़ारसी के प्रभाव से काफ़ी सीमा तक मुक्त किया, हिंदी उपमाओं उपमा और रूपकों का भरपूर प्रयोग किया और हिंदी कविता की परंपरा के अनुसार स्त्री-पुरुष के प्रेम-विरह का वर्णन किया। उन्होंने भारतीय परिवेश पर आधारित प्रकृति चित्रण किया और हिंदुओं तथा मुसलमानों के तीज-त्योहारों के बारे में लिखा है। उनके द्वारा चुने गए विषयों में देश की मिट्टी की सौंधी गंध है। उनकी नज्मों में उस समय का वर्णन है, जिससे स्पष्ट होता है कि दक्षिण में हिंदू-मुस्लिम सभ्यता का संगम शाही घरानों से लेकर आम लोगों तक हो रहा था।” (हिंदी साहित्य इतिहास की भूमिका, भाग-2, मध्यकाल, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ, प्रथम संस्करण 2008, पृ. 353-354)

हिन्दी विद्वान डॉ. रहमत उल्लाह उनकी साहित्यिक सेवा के संबंध में कहते हैं—

”दक्खिनी हिंदी के सामान्तवादी युग में सुल्तान मुहम्मद क़ुली क़ुत्बशाह ने सक्रिय रूप में भाषा की सेवा की। उसने स्वयं काव्य की रचना की और अपने आश्रय में अनेक कवियों को संरक्षण प्रदान किया।… तत्कालीन शांतिपूर्ण वातावरण के कारण उसको कविता करने और जीवन के आनंदोत्सवों में भाग लेने का पर्याप्त अवसर मिला। वह रंगीला सुल्तान था। इसी लिए अन्य ललित कलाओं के विकास में भी योग दिया। उस समय की प्रसिद्ध नर्तकी ‘भागमती’ से प्रेम करता था। उसी के नाम पर ‘भागनगर’ बसाया था।… वह ‘हैदर महल’ के नाम से प्रसिद्ध हुई थी और उसी के नाम से ‘हैदराबाद’ नगर प्रसिद्ध हुआ। अकबर और गोस्वामी तुलसीदास का समकालीन कवि था।…उसने विविध विषयों पर अनेक रचनाएं की हैं। प्रकृति से भारतीय कवि था। देश के रंगीन वातावरण से बहुत प्रभावित था। भारत के सामान्य जीवन से प्रेरणा लेता रहा। भारत की ऋतुओं, भौगोलिक संरचना, जलवायु, सांस्कृतिक समारोहों से बहुत प्रभावित था। राज के समारोहों में खुलकर भाग लेता था। वसंत ऋतु से संबंधित अनेक सुंदर कविताएं बड़ी मनमोहक हैं। उसे राग-रागिनियों का भी बहुत ज्ञान था। संगीत से संबंधित कविताओं की भी रचना की है। नायिका भेद पर भी सुंदर कविताएं लिखी हैं। कवि की पैनी दृष्टि ने कविताओं में अनोखी छटा भरने की चेष्टा की है।….32 वर्ष के शासनकाल में अनवरत साहित्य की रचना करता रहा। उसकी सभी कविताएं फ़ारसी लिपि में लिखी गई थीं, जो फ़ारसी लिपि में प्रकाशित हैं।….. कवि की भाषा लोकभाषा दक्खिनी हिंदी का बहुत ही साफ़-सुथरा रूप प्रस्तुत करती है। ….. इसमें अरबी, फ़ारसी के शब्दों के साथ संस्कृत, तेलुगु, गुजराती, तमिल, मराठी शब्दों का भी प्रयोग मिलता है। अरबी और फ़ारसी छंदों के साथ-ही-साथ हिंदी-संस्कृत के छंदों का भी प्रयोग मिलता है। भावात्मक एकता के लिए रचनाएं बड़ी उपयोगी हैं और कवि की सांप्रदायिक, भाषायी, सामाजिक उदारता का परिचय कराती हैं। दक्खिनी हिंदी काव्य-चयनिका, हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, सन् 1998 ई., पृ. 25-26)Quli Qutbshah

दक्खिनी के महान कवि मुहम्मद क़ुली क़ुत्बशाह की सम्मोहक रसधार बहाती कविता-सरिता से कुछ कविताएं पाठकों की सेवा में प्रस्तुत हैं, जिनका अवगाहन कर वे स्वयं करें और कवि के साथ वे भी अथाह रस-सिक्त कविता-सरिता में तैरते रहें, जी भरकर तैरें और आनंद-विभोर होते रहें—

  1. अधीर प्रेमी

पिया बाज प्याला पिया जाय ना।

पिया बाज यक तिल जिया जाय ना।।

 कहेते पिया बिन सबूरी करूं।

कह्या जाए अम्मा किया जाय ना।

नहीं इश्क़ जिस वह बड़ा कूड़ है।

कधी उससे मिल बैसिया जाय ना।।

क़ुत्ब शाह न दे मुज दिवाने कुं पंद।।

दिवाने कूं कुछ पंद दिया जाय ना।।

(शब्दार्थ : बाज—बिना; तिल—पल, क्षण; सबूरी—सब्र, धैर्य, संतोष; अम्मा—लेकिन; कूड़—अंधा, बैसिया—मिल बैठा; दिवाने—पागल, उन्मत्त; पंद—उपदेश)

  1. रक़ीब के गले में फंदा

रक़ीबों के दुखों सेती क़ुत्बशाह तूं न कर ग़म।

      ख़ुदा सारे रक़ीबों के गले दाम देवैगा।

(शब्दार्थ :  रक़ीब—ईर्ष्यालु; दाम—फंदा, फांसी)

  1. बसंत

बसंत आया सकी जों लाल गाला। कुसुम चोला…..।

पपीहा गावता है मीठे वैनां। मधुर रस दे उधर रस का पियाला।।

पियारी होर पिया हत में सो हत ले। सरो वन में न्हिजी गल फूलमाला।।

कंठी कोयल सरस नादां सुनावै। तनन् तन् तन् तनन् तन् तन् तला ला।।

गरज बादल ते दादुर गीत गावै। कोयल कूके सो फूलवन के खियालां।।

सदा सेवा करै ऐसा गुसाईं। दलिद्दर दूर कर करता निहाला।।

नबी सदक़े हुआ क़ुत्ब तेरा जीत। दूंधां सीने में सलता दुक्ख भाला।।

(शब्दार्थ : सकीसखी; हत—हाथ; न्हिजी—डाला; नादां—आवाज़; सदक़े—पैग़म्बर की बलिहारी; सीने—दुश्मन की छाती)

  1. वर्षा

रुत आया कलियां का हुआ राज। हरी डाल सिर फूलां के ताज।।

मेहां बुंद का लेओ हत प्याला। रूप नारयां साजे एकसते एक साज।।

तन थंडत लरजत जोबन गरजत। पिया मुख देखत कंचुकी कसब कसे आज।।

नारी मुख झमकै जैसे बिजली। अंचल वाचक में सोहै उस ….लाज।।

केसफूल दीखै सितारे आसमां। उस ज़माने की परी पद्मिनी आये आज।

चौधर गरजत होर मेहां बरसत। इश्क़ के चमने चमन भौंरा का है राज।।

हज़रत मुस्तफ़ा के सदकय़े आया बरसकाल। क़ुत्ब शह इश्क़ करो दिन-दिन राज।।

(शब्दार्थ : मेहां—बादल; चौधर—चारों ओर; चमन—फुलवारी; मान्य पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद सल्ल.)

  1. शरद

हवा आइ है लेकर भी थंड काला। पिया बिन सताता मदन वाले वाला।।

रहन न सके मन पिया बाज देखे। होवे तन कूं सुख जब मिले पीउ बाला।।

ऐस सीतल हवा मुंज गमे ना पिया बिन। भुलाया है मुंज जीव कूं ओ उजाला।।

जो रात आवे चांदनी कि मुंजकूं सतावे। कि चंदन मुंजै नई नयन सोज लाला।।

मेरे मन कूं आता है लालन सों मिलना। मुंजे आते हैं पीव हत कंठमाला।

नबी सदक़े क़ुत्बा अनंदा सों मिलकर। अपस साईं सो पीवे जम मद प्याला।।

  1. नख-शिख

प्यारी के नैनां है जैसे कटारे। न सम उसके अंगे कोई है दो धारे।।

असर तुज मुहब्बत का जिसककूं चड़ैगा। तेरे लाल बिन उसको कोई ना उतारै।।

दो लोचन हैं तेरे निसंग चोर रावत। उनोसों दिलेरी न कर सब हि हारे।

  1. प्रेम-विष

तेरी नेह का मुजकूं बिच्छू लड्या। मेरे सबही तन में बिस उसका चड्या।।

मैं आई हूं तुज पास उतारा करन। तुमीं करनेहारा उतारा पियारा।।

जो देखी मैं उस रूपवंता सजन। नयन उस सलोने ते फिर बिस चडया।।

  1. मस्त प्रियतमा

मदन मस्त बदिल मस्त कजन मस्त परी मस्त।

हुई मस्त पवन मस्त लगन मस्त परी मस्त।।

चढ़ी मस्त वही मस्त डुली मस्त रही मस्त।

मुखा मस्त सदा मस्त सोहन मस्त।।

खड़ी मस्त अंचल मस्त ढली मस्त ओ रही मस्त।

गज़क मस्त नुक़ल मस्त वचन …।।

परी मस्त विपन मस्त सुरा मस्त हुई मस्त।

मिली मस्त खिजी मस्त रसन मस्त।।

खोपा मस्त फुलां मस्त कजल मस्त खुली मस्त।

लटां मस्त नयन मस्त देखन मस्त।।

तिला मस्त तुरा मस्त धरा मस्त धड़ी मस्त।

शकर मस्त चुमन मस्त हंसन…मस्त।।

चोली मस्त कमल मस्त भंवर मस्त।

क़ुत्ब मस्त करी मस्त यों मस्त परी मस्त।।