क़ादिर (Qadir : the Hindi poet) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

क़ादिर (Qadir : the Hindi poet) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

क़ादिरबख़्श पिहानी जिला हरदोई के रहनेवाले और सैयद इब्राहीम के शिष्य थे। इनका जन्म संवत् 1635 में माना जाता है। अत: इनका कविताकाल संवत् 1660 के आसपास समझा जा सकता है। इनकी कोई पुस्तक तो नहीं मिलती पर फुटकल कवित्त पाए जाते हैं। कविता ये चलती भाषा में अच्छी करते थे। इनका यह कवित्त लोगों के मुँह से बहुत सुनने में आता है :

गुन को न पूछै कोऊ, औगुन की बात पूछै,

कहा भयो दई! कलिकाल यों खरानो है।

पोथी औ पुरान ज्ञान ठट्ठन में डारि देत,

चुगुल चबाइन को मान ठहरानो है।

क़ादिर कहत यासों कछु कहिबे को नाहिं,

जगत की रीत देखि चुप मन मानो है।

खोलि देखौ हियो सब ओरन सों भाँति भाँति,

गुन ना हिरानो, गुनगाहक हिरानो है।

प्रश्नोत्तरी-46 (हिंदी भाषा एवं साहित्य, क़ादिर)

#क़ादिर के संबंध में निम्नलिखित में कौन-कौन से कथन सत्य हैं :

(A) क़ादिरबख़्श पिहानी जिला हरदोई के रहनेवाले और सैयद इब्राहीम के शिष्य थे।

(B) कविता ये चलती भाषा में अच्छी करते थे।

(C) ‘माधवानल कामकंदला’ श्रृंगार रस की दृष्टि से ही लिखी जान पड़ती है, आध्यात्मिक दृष्टि से नहीं।

(D) ‘‘खोलि देखौ हियो सब ओरन सों भाँति भाँति,

गुन ना हिरानो, गुनगाहक हिरानो है।’’ इन काव्य-पंक्तियों के रचनाकार क़ादिर हैं।

(A)(a)(b)(c)

(B)(b)(c)(d)

(C)(a)(c)(d)

(D)(a)(b)(d)

Ans. : (D)(a)(b)(d)

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण 6 : भक्तिकाल की फुटकल रचनाएं)