पं. चंद्रधर शर्मा गुलेरी : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

पं. चंद्रधर शर्मा गुलेरी : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

इनका जन्म जयपुर में एक विख्यात पंडित घराने में 25 आषाढ़ संवत् 1940 में हुआ था। इनके पूर्वज काँगड़े के गुलेर नामक स्थान से जयपुर आए थे। पं. चंद्रधरजी संस्कृत के प्रकांड विद्वान और अंग्रेजी उच्च शिक्षा से सम्पन्न व्यक्ति थे। जीवन के अंतिम वर्षों के पहले ये बराबर अजमेर के मेयो कॉलेज में अध्यापक रहे। पीछे काशी हिंदू विश्वविद्यालय के ओरियंटल कॉलेज के प्रिंसिपल होकर आए। पर हिन्दी के दुर्भाग्य से थोड़े ही दिनों में संवत् 1977 में इनका परलोकवास हो गया। ये जैसे धुरंधर पंडित थे वैसे ही सरल और विनोदशील प्रकृति के थे।

गुलेरीजी ने ‘सरस्वती’ के कुछ ही महीने पीछे अपनी थोड़ी अवस्था में जयपुर से ‘समालोचक’ नामक एक मासिक पत्र अपने संपादकत्व में निकलवाया था। उक्त पत्र द्वारा गुलेरीजी एक बहुत ही अनूठी लेखनशैली लेकर साहित्यक्षेत्र में उतरे थे। #ऐसा गंभीर और पांडित्यपूर्ण हास, जैसा इनके लेखों में रहता था, और कहीं देखने में न आया। अनेक गूढ़ शास्त्रीय विषयों तथा कथाप्रसंगों की ओर विनोदपूर्ण संकेत करती हुई उनकी वाणी चलती थी। इसी प्रसंगगर्भत्व (एल्यूसिवनेस) के कारण इनकी चुटकियों का आनंद अनेक विषयों की जानकारी रखनेवाले पाठकों को ही विशेष मिलता था। इनके व्याकरण ऐसे रूखे विषय के लेख भी मजाक से खाली नहीं होते थे।

यह बेधड़क कहा जा सकता है कि शैली की जो विशिष्टता और अर्थगर्भित वक्रता गुलेरीजी में मिलती है, और किसी लेखक में नहीं। इनके स्मित हास की सामग्री ज्ञान के विविध क्षेत्रों से ली गई है। अत: इनके लेखों का पूरा आनंद उन्हीं को मिल सकता है जो बहुज्ञ या कम से कम बहुश्रुत हैं। इनके ‘कछुआ धरम’ और ‘मारेसि मोहिं कुठाउँ’ नामक लेखों से उद्धरण दिए जाते हैं।

  1. मनुस्मृति में कहा गया है कि जहाँ गुरु की निंदा या असत् कथा हो रही हो वहाँ पर भले आदमी को चाहिए कि कान बंद कर ले या कहीं उठकर चला जाए! × × × मनु महाराज ने न सुनने जोग गुरु के कलंक कथा सुनने के पाप से बचने के दो ही उपाय बताए हैं। या तो कान ढककर बैठ जाओ या दुम दबाकर चल दो। तीसरा उपाय जो और देशों के सौ में नब्बे आदमियों को ऐसे अवसर पर पहले सूझेगा, वह मनु ने नहीं बताया कि जूता लेकर या मुक्का तानकर सामने खड़े हो जाओ और निंदा करने वाले का जबड़ा तोड़ दो या मुँह पिचका दो कि ऐसी हरकत न करे। × × × पुराने से पुराने आर्यों की अपने भाई असुरों से अनबन हुई। असुर असुरिया में रहना चाहते थे, आर्य सप्तसिंधुओं को आर्यावर्त बनाना चाहते थे। आगे चल दिए। पीछे वे दबाते आए। विष्णु ने अग्नि, यज्ञपात्र और अरणि रखने के लिए तीन गाड़ियाँ बनाईं। उसकी पत्नी ने उनके पहियों की चूल को घी से ऑंज दिया। ऊखल, मूसल और सोम कूटने के पत्थरों तक को साथ लिए हुए ‘कारवाँ’ मुंजवत् हिंदुकुश के एकमात्र दर्रे खैबर में होकर सिंधु की एक घाटी में उतरा। पीछे से श्वान, भ्राज, अंभारि, बंभारि, हस्त, सुहस्त, कृशन, शंड, मर्क मारते चले आते थे, वज्र की मार से पिछली गाड़ी भी आधी टूट गई, पर तीन लंबे डग मारनेवाले विष्णु ने पीछे फिरकर नहीं देखा और न जमकर मैदान लिया। पितृभूमि अपने भ्रातृव्यों के पास छोड़ आए और यहाँ ‘भ्रातृव्यस्त बधाय’ (सजातानां मध्यमेष्ठयाय) देवताओं की आहुति देने लगे। जहाँ जहाँ रास्ते में टिके थे वहाँ वहाँ यूप खड़े होगए। यहाँ की सुजला सुफला शस्य श्यामला भूमि में ये बुलबुलें चहकने लगीं।

पर ईरान के अंगूरों और गुलों का, यानी मुंजवत् पहाड़ की सोमलता का चसका पड़ा हुआ था। लेने जाते तो वे पुराने गंधर्व मारने दौड़ते। हाँ, उनमें से कोई कोई उस समय का चिलकौआ नकद नारायण लेकर बदले में सोमलता बेचने को राजी हो जाते थे। उस समय का सिक्का गौएँ थीं। जैसे आजकल लखपती, करोड़पती कहलाते हैं वैसे तब ‘शतगु’, ‘सहस्रगु’ कहलाते थे। ये दमड़ीमल के पोते करोड़ीचंद अपने ‘नवग्वा:’, ‘दशग्वा:’ पितरों से शरमाते न थे, आदर से उन्हें याद करते थे। आजकल के मेवा बेचनेवाले पेशावरियों की तरह कोई कोई ‘सरहदी’ यहाँ पर भी सोम बेचने चले आते थे। कोई आर्य सीमाप्रांत पर जाकर भी ले आया करते थे। मोल ठहराने में बड़ी हुज्जत होती थी, जैसी कि तरकारियों का भाव करने में कुंजड़िनों से हुआ करती है। ये कहते कि गौ की एक कला में सोम बेच दो। वह कहता, वाह! सोम राजा का दाम इससे कहीं बढ़कर है। इधर ये गौ के गुण बखानते। जैसे बुङ्ढे चौबेजी ने अपने कंधो पर चढ़ी बालवधू के लिए कहा था कि ‘याही में बेटा और याही में बेटी’ वैसे ये भी कहते कि इस गौ से दूध होता है, मक्खन होता है, दही होता है, यह होता है, वह होता है, पर काबुली काहे को मानता? उसके पास सोम की ‘मनोपली’ थी और इनका बिना लिए सरता नहीं। अंत में गौ का एक पाद, अर्धा होते होते दाम तय हो जाता। भूरी ऑंखोंवाली एक बरस की बछिया में सोम राजा खरीद लिए जाते। गाड़ी में रखकर शान से लाए जाते।

अच्छा अब उसी पंचनद में ‘वाहीक’ आकर बसे। अश्वघोष की फड़कती उपमा के अनुसार धर्म भागा और दंड कमंडल लेकर ऋषि भी भागे। अब ब्रह्मावर्त, ब्रह्मर्षि देश और आर्यावर्त की महिमा हो गई; और वह पुराना देश , न तत्रा दिवसं वसेत। बहुत वर्ष पीछे की बात है। समुद्र पार के देशों में और धर्म पक्के हो चले। वे लूटते मारते थे ही बेधरम भी कर देते थे। बस, समुद्रयात्रा बंद! कहाँ तो राम के बनाए सेतु का दर्शन करके ब्रह्महत्या मिटती थी और कहाँ नाव में जानेवाले द्विज का प्रायश्चित कराकर भी संग्रह बंद! वही कछुआ धर्म? ढाल के अंदर बैठे रहो।

किसी बात का टोटा होने पर उसे पूरा करने की इच्छा होती है, दुख होने पर उसे मिटाना चाहते हैं। यह स्वभाव है। संसार में त्रिविध दुख दिखाई पड़ने लगे। उन्हें मिटाने के लिए उपाय भी किए जाने लगे। ‘दृष्ट’ उपाय हुए। उनसे संतोष न हुआ तो सुने सुनाए (आनुश्रविक) उपाय किए। उनसे भी मन न भरा। सांख्यों ने काठ कड़ी गिन गिन कर उपाय निकाला, बुद्ध  ने योग में पककर उपाय खोजा। किसी न किसी तरह कोई न कोई उपाय मिलता गया। कछुओं ने सोचा, चोर को क्या मारें; चोर की माँ को ही न मारें; न रहे बाँस न बजे बाँसुरी। लगीं प्रार्थनाएँ होने, ‘मा देहि राम! जननीजठरे निवासम्।’ और यह उस देश में जहाँ सूर्य का उदय होना इतना मनोहर था कि ऋषियों का यह कहते कहते तालू सूखता था कि सौ बरस इसे हम उगता देखें, सौ बरस सुनें, सौ बरस बढ़ बढ़कर बोलें, सौ बरस अदीन होकर रहें।

हयग्रीव या हिरण्याक्ष दोनों में से किसी एक दैत्य से देव बहुत तंग थे। सुरपुर में अफवाह पहुँची। बस, इंद्र ने झटपट किवाड़ बंद कर दिए, आगल डाल दी। मानो अमरावती ने ऑंखें बंद कर लीं। यह कछुआ धरम का भाई शुतुरमुर्ग धरम है।

  1. हमारे यहाँ पूँजी शब्दों की है। जिससे हमें काम पड़ा, चाहे और बातों में हम ठगे गए, पर हमारी शब्दों की गाँठ नहीं कतरी गई। × × × यही नहीं जो आया उससे हमने कुछ ले लिया।

पहले हमें काम असुरों से पड़ा, असीरियावालों से। उनके यहाँ ‘असुर’ शब्द बड़ी शान का था। ‘असुर’ माने प्राणवाला, जबरदस्त। हमारे इंद्र की भी यही उपाधि हुई, पीछे चाहे शब्द का अर्थ बुरा हो गया। × × × पारस के पारसियों से काम पड़ा तो वे अपने सूबेदारों की उपाधि ‘क्षत्रप’, ‘क्षत्रपावन’ या ‘महाक्षत्रप’ हमारे यहाँ रख गए और गुस्तास्प, बिस्तास्प के वजन के कृशाश्व, श्यावाश्व, बृहदश्व आदि ऋषियों और राजाओं के नाम दे गए। यूनानी यवनों से काम पड़ा तो वे यवन की स्त्री यवनी तो नहीं, पर यवन की लिपि ‘यवनानी’ शब्द हमारे व्याकरण को भेंट कर गए। साथ ही बारह राशियाँ मेष, वृष, मिथुन आदि भी यहाँ पहुँचा गए। पुराने ग्रंथकार तो शुद्ध यूनानी नाम आर, तार, जितुम आदि ही काम में लाते थे। बराहमिहिर की स्त्री खना चाहे यवनी रही हो, या न रही हो, उसने आदर से कहा है कि म्लेच्छ यवन भी ज्योतिष शास्त्र जानने से ऋषियों की तरह पूजे जाते हैं। अब चाहे ‘वेल्यूवेबल सिस्टम’ भी वेद में निकाला जाए, पर पुराने हिंदू कृतघ्न और गुरुमार न थे। × × × यवन राजाओं की उपाधि ‘सीटर’ त्राातार का रूप लेकर हमारे राजाओं के यहाँ आ लगी। × × × शकों के हमले हुए तो ‘शाकपार्थिव’ वैयाकरणों के हाथ लगा और शक संवत् या शाका सर्वसाधारण के। हूण वंक्षु (ऑक्सस) नदी के किनारे पर से यहाँ चढ़ आए तो कवियों को नारंगी की उपमा मिली कि ताजे मुड़े हुए हूण की ठुव्ी की सी नारंगी।

×                ×                ×

बकौल शेक्सपियर के जो मेरा धन छीनता है वह कूड़ा चुराता है पर जो मेरा नाम चुराता है वह सितम ढाता है, आर्यसमाज ने मर्मस्थल पर वह मार की है कि कुछ कहा नहीं जाता। हमारी ऐसी चोटी पकड़ी है कि सिर नीचा कर दिया है। औरों ने तो गाँठ का कुछ न लिया, पर इन्होंने तो अच्छे अच्छे शब्द छीन लिए।

इसी से कहते हैं कि ‘मारेसि मोहिं कुठाउँ’। अच्छे अच्छे पद तो यों सफाई से ले लिए गए हैं कि इस पुरानी जमी हुई दुकान का दिवाला निकल गया? लेने के देने पड़ गए!!!

हम अपने आपको आर्य नहीं कहते, हिंदू कहते हैं। × × × और तो क्या ‘नमस्ते’ का वैदिक फिकरा हाथ से गया। चाहे ‘जय रामजी’ कह लो चाहे ‘जय श्रीकृष्ण’, नमस्ते मत कह बैठना। ओंकार बड़ा मांगलिक शब्द है। कहते हैं कि पहले यह ब्रह्मा का कंठ फाड़ कर निकला था।

(हिंदी साहित्य का इतिहास : आधुनिक काल : प्रकरण-4 : गद्य का प्रसार : निबंध)

संस्कृत के प्रकांड प्रतिभाशाली विद्वान हिन्दी के अनन्य आराधक श्री चंद्रधर शर्मा गुलेरी की अद्वितीय कहानी ‘उसने कहा था’ संवत् 1972 अर्थात् सन् 1915 की ‘सरस्वती’ में छपी थी। इसमें पक्के यथार्थवाद के बीच, सुरुचि की चरम मर्यादा के भीतर, भावुकता का चरम उत्कर्ष अत्यंत निपुणता के साथ संपुटित है। घटना इसकी ऐसी है जैसी बराबर हुआ करती है, पर उसमें भीतर से प्रेम का एक स्वर्गीय स्वरूप झाँक रहा है, केवल झाँक रहा है निर्लज्जता के साथ पुकार या कराह नहीं रहा है। कहानी भर में कहीं प्रेमी की निर्लज्जता, प्रगल्भता, वेदना की बीभत्स विवृत्ति नहीं है। सुरुचि के सुकुमार से सुकुमार स्वरूप पर कहीं आघात नहीं पहुँचता। इसकी घटनाएँ ही बोल रही हैं, पात्रों के बोलने की अपेक्षा नहीं। (यह कहानी प्रथम विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि में लिखी गई है।)

(हिंदी साहित्य का इतिहास : आधुनिक काल : प्रकरण-4 : गद्य का प्रसार : छोटी कहानियाँ)