परमानंददास (Parmananddas) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

परमानंददास (Parmananddas) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

यह भी बल्लभाचार्य जी के शिष्य और अष्टछाप में थे। ये संवत् 1606 के आसपास वर्तमान थे। इनका निवास स्थान कन्नौज था। इसी से ये कान्यकुब्ज अनुमान किए जाते हैं। ये अत्यंत तन्मयता के साथ बड़ी ही सरल कविता करते थे। कहते हैं कि इनके किसी एक पद को सुनकर आचार्य जी कई दिनों तक तन बदन की सुध भूले रहे। इनके फुटकल पद कृष्णभक्तों के मुँह से प्राय: सुनने में आते हैं। इनके 835 पद परमानंदसागरमें हैं। दो पद देखिए

कहा करौ बैकुंठहि जाय?

जहँ नहिं नंद, जहाँ न जसोदा, नहिं जहँ गोपी ग्वाल न गाय।

जहँ नहिं जल जमुना को निर्मल और नहीं कदमन की छायँ।

परमानंद प्रभु चतुर ग्वालिनी, ब्रजरज तजि मेरी जाय बलाय।

 

राधो जू हारावलि टूटी।

उरज कमलदल माल मरगजी, बाम कपोल अलक लट छूटी

बर उर उरज करज बिच अंकित, बाहु जुगल बलयावलि फूटी।

कंचुकि चीर बिबिध रंग रंजित, गिरधर अधर माधुरी घूँटी

आलस बलित नैन अनियारे, अरुन उनींदे रजनी खूटी।

परमानंद प्रभु सुरति समय रस मदन नृपति की सेना लूटी।