मुबारक (Mubarak : The Hindi poet) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

मुबारक (Mubarak : The Hindi poet) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

मुबारक : सैयद मुबारक अली बिलग्रामी का जन्म संवत् 1640 में हुआ था, अत: इनका कविताकाल संवत् 1670 के पीछे मानना चाहिए।

ये संस्कृत, फ़ारसी और अरबी के अच्छे पंडित और हिन्दी के सहृदय कवि थे। जान पड़ता है कि ये केवल श्रृंगार की ही कविता करते थे। इन्होंने नायिका के अंगों का वर्णन बड़े विस्तार से किया है। कहा जाता है कि दस अंगों को लेकर इन्होंने एक एक अंग पर सौ सौ दोहे बनाए थे। इनका प्राप्त ग्रंथ ‘अलकशतक’ और ‘तिलशतक‘ उन्हीं के अंतर्गत है। इन दोहों के अतिरिक्त इनके बहुत से कवित्त सवैये संग्रह ग्रंथों में पाए जाते और लोगों के मुँह से सुने जाते हैं। इनकी उत्प्रेक्षा बहुत बढ़ी चढ़ी होती थी और वर्णन के उत्कर्ष के लिए कभी कभी ये बहुत दूर तक बढ़ जाते थे। कुछ नमूने देखिए :

(अलकशतक और तिलशतक से)

परी मुबारक तिय बदन अलक ओप अति होय।

मनो चंद की गोद में रही निसा सी सोय

चिबुक कूप में मन परयो छबिजल तृषा विचारि।

कढ़ति मुबारक ताहि तिय अलक डोरि सी डारि

चिबुक कूप रसरी अलक तिल सु चरस दृग बैल।

बारी वैस सिंगार को सींचत मनमथ छैल।

 

(फुटकल से)

कनक बरन बाल, नगन लसत भाल,

मोतिन के माल उर सोहैं भलीभाँति है।

चंदन चढ़ाय चारु चंदमुखी मोहनी सी,

प्रात ही अन्हाय पग धरे मुसकाति है।

चूनरी विचित्र स्याम सजि कै मुबारकजू,

ढाँकि नखसिख तें निपट सकुचाति है।

चंद्रमैं लमेटि कै समेटि कै नखत मानो।

दिन को प्रनाम किए राति चली जाति है।