महाराज टोडरमल (Maharaj Todarmal : the Hindi poet) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

महाराज टोडरमल (Maharaj Todarmal : the Hindi poet) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

ये कुछ दिन शेरशाह के यहाँ ऊँचे पद पर थे, पीछे अकबर के समय में भूमिकर विभाग के मंत्री हुए। इनका जन्म संवत् 1550 में और मृत्यु संवत् 1646 में हुई। ये कुछ दिनों तक बंगाल के सूबेदार भी थे। ये जाति के खत्री थे। इन्होंने शाही दफ्तरों में हिन्दी के स्थान पर फ़ारसी का प्रचार किया जिससे हिंदुओं का झुकाव फ़ारसी की शिक्षा की ओर हुआ। ये प्राय: नीति संबंधी पद्य कहते थे। इनकी कोई पुस्तक तो नहीं मिलती, फुटकल कवित्त इधर उधर मिलते हैं। एक कवित्त नीचे दिया जाता है :

जार को विचार कहाँ, गनिका को लाज कहाँ,

गदहा को पान कहाँ, आँधरे को आरसी।

निगुनी को गुन कहाँ, दान कहाँ दारिद को।

सेवा कहाँ सूम की अरंडन की डार सी

मदपी को सुचि कहाँ, साँच कहाँ लंपट को,

नीच को बचन कहाँ स्यार की पुकार सी।

टोडर सुकवि ऐसे हठी तौ न टारे टरै,

भावै कहाँ सूधी बात भावै कहाँ फ़ारसी।

प्रश्नोत्तरी-36 (हिंदी भाषा एवं साहित्य, महाराज टोडरमल)

# महाराज टोडरमल के संबंध में निम्नलिखित में कौन-कौन से कथन सत्य हैं :

(A) ये कुछ दिन शेरशाह के यहाँ ऊँचे पद पर थे, पीछे अकबर के समय में भूमिकर विभाग के मंत्री हुए।

(B) ये प्राय: नीति संबंधी पद्य कहते थे।

(C) ‘माधवानल कामकंदला श्रृंगार रस की दृष्टि से ही लिखी जान पड़ती है, आध्यात्मिक दृष्टि से नहीं।

(D) ‘‘मदपी को सुचि कहाँ, साँच कहाँ लंपट को,

नीच को बचन कहाँ स्यार की पुकार सी।’’ इन काव्य-पंक्तियों के रचनाकार महाराज टोडरमल हैं।

(A)(a)(b)(c)

(B)(b)(c)(d)

(C)(a)(c)(d)

(D)(a)(b)(d)

Ans. : (D)(a)(b)(d)

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण 6 : भक्तिकाल की फुटकल रचनाएं)