महाराज बीरबल (Maharaj Birbal : the Hindi poet) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

महाराज बीरबल (Maharaj Birbal : the Hindi poet) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

इनकी जन्मभूमि कुछ लोग नारनौल बतलाते हैं और इनका नाम महेशदास। प्रयाग के किले के भीतर जो अशोकस्तंभ हैं उस पर यह खुदा है, संवत् 1632 शाके 1493 मार्गब दी 5, सोमवार गंगादास सुत महाराज बीरबल श्री तीरथराज प्रयाग की यात्रा सुफल लिखित।यह लेख महाराज बीरबल के संबंध में ही जान पड़ता है क्योंकि गंगादास और महेशदास नाम मिलते जुलते हैं जैसे कि पिता पुत्र के हुआ करते हैं। बीरबल का जो उल्लेख भूषण ने किया है उससे इनके निवास स्थान का पता चलता है :

द्विज कनौज कुल कस्यपी रतनाकर सुत धीर।

बसत त्रिविक्रमपुर सदा तरनि तनूजा तीर।

बीर बीरबल से जहाँ उपजे कवि अरु भूप।

देव बिहारीश्वर जहाँ विश्वेश्वर तद्रूप।

इनका जन्मस्थान तिकवाँपुर ही ठहरता है; पर कुल का निश्चय नहीं होता। यह तो प्रसिद्ध ही है कि ये अकबर के मंत्रिायों में थे और बड़े ही वाक्चतुर और प्रत्युत्पन्नमति थे। इनके और अकबर के बीच होनेवाले विनोद और चुटकुले उत्तर भारत के गाँवों में प्रसिद्ध हैं। महाराज बीरबल ब्रजभाषा के अच्छे कवि थे और कवियों का बड़ी उदारता के साथ सम्मान करते थे। कहते हैं, केशवदासजी को इन्होंने एक बार छह लाख रुपये दिए थे और केशवदास की पैरवी से ओरछा नरेश पर एक करोड़ का जुरमाना मुआफ़ करा दिया था। इनके मरने पर अकबर ने यह सोरठा कहा था :

दीन देखि सब दीन, एक न दीन्हों दुसह दुख।

सो अब हम कहँ दीन, कछु नहिं राख्यो बीरबल।

इनकी कोई पुस्तक नहीं मिलती है, पर कई सौ कवित्तों का एक संग्रह भरतपुर में है। इनकी, रचना अलंकार आदि काव्यांगों से पूर्ण और सरस होती थी। कविता में ये अपना नाम ब्रह्म रखते थे। दो उदाहरण नीचे दिए जाते हैं :

उछरि उछरि भेकी झपटै उरग पर,

उरग पै केकिन के लपटै लहकि हैं।

केकिन के सुरति हिए की ना कछू है, भए,

एकी करी केहरि, न बोलत बहकि है।

कहै कवि ब्रह्म वारि हेरत हरिन फिरैं,

बैहर बहत बड़े  ज़ोर  सो जहकि हैं।

तरनि कै तावन तवा सी भई भूमि रही,

दसहू दिसान में दवारि सी दहकि है।

 

पूत कपूत, कुलच्छनि नारि, लराक परोसि, लजायन सारो।

बंधु कुबुद्धि , पुरोहित लंपट, चाकर चोर, अतीथ धुतारो।

साहब सूम, अड़ाक तुरंग, किसान कठोर, दीवान नकारो।

ब्रह्म भनै सुनु साह अकब्बर बारहौं बाँधि समुद्र में डारौ।

 

प्रश्नोत्तरी-37 (हिंदी भाषा एवं साहित्य, महाराज बीरबल)

#महाराज बीरबल के संबंध में निम्नलिखित में कौन-कौन से कथन सत्य हैं :

(A) महाराज बीरबल और अकबर के बीच होनेवाले विनोद और चुटकुले उत्तर भारत के गाँवों में प्रसिद्ध हैं।

(B) ‘माधवानल कामकंदला’ श्रृंगार रस की दृष्टि से ही लिखी जान पड़ती है, आध्यात्मिक दृष्टि से नहीं।

(C) महाराज बीरबल ब्रजभाषा के अच्छे कवि थे और कवियों का बड़ी उदारता के साथ सम्मान करते थे।

(D) ‘‘पूत कपूत, कुलच्छनि नारि, लराक परोसि, लजायन सारो।

बंधु कुबुद्धि, पुरोहित लंपट, चाकर चोर, अतीथ धुतारो।

साहब सूम, अड़ाक तुरंग, किसान कठोर, दीवान नकारो।

ब्रह्म भनै सुनु साह अकब्बर बारहौं बाँधि समुद्र में डारौ’’ इन काव्य-पंक्तियों के रचनाकार महाराज बीरबल हैं।

(A)(a)(b)(c)

(B)(b)(c)(d)

(C)(a)(c)(d)

(D)(a)(b)(d)

Ans. : (C)(a)(c)(d)

#महाराज बीरबल के संबंध में निम्नलिखित में कौन-कौन से कथन सत्य हैं :

(A) महाराज बीरबल ने एक खंडकाव्य ध्रुवचरित लिखा है।

(B) इनकी रचना अलंकार आदि काव्यांगों से पूर्ण और सरस होती थी।

(C) कविता में ये अपना नाम ब्रह्म रखते थे।

(D) ‘‘कहै कवि ब्रह्म वारि हेरत हरिन फिरैं,

बैहर बहत बड़े  ज़ोर  सो जहकि हैं।

तरनि कै तावन तवा सी भई भूमि रही,

दसहू दिसान में दवारि सी दहकि है।’’ इन काव्य-पंक्तियों के रचनाकार महाराज बीरबल हैं।

(A)(a)(b)(c)

(B)(b)(c)(d)

(C)(a)(c)(d)

(D)(a)(b)(d)

Ans. : (B)(b)(c)(d)

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण 6 : भक्तिकाल की फुटकल रचनाएं)