कुंभनदास (Kumbhandas) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

कुंभनदास (Kumbhandas) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

ये भी अष्टछाप के एक कवि थे और परमानंद जी के ही समकालीन थे। वे पूरे विरक्त और धन, मान मर्यादा की इच्छा से कोसों दूर थे। एक बार अकबर बादशाह के बुलाने पर इन्हें फतेहपुर सीकरी जाना पड़ा, जहाँ इनका बड़ा सम्मान हुआ। पर इसका इन्हें बराबर खेद ही रहा, जैसा कि इस पद से व्यंजित होता है :

संतन को कहा सीकरी सों काम?

आवत जात पहनियाँ टूटी, बिसरि गयो हरि नाम

जिनको मुख देखे दुख उपजत, तिनको करिबे परी सलाम।

कुंभनदास लाल गिरिधर बिनु और सबै बेकाम।।

इनका कोई ग्रंथ न तो प्रसिद्ध है और न अब तक मिला है। फुटकल पद अवश्य मिलते हैं। विषय वही कृष्ण की बाललीला और प्रेमलीला है :

तुम नीके दुहि जानत गैया।

चलिए कुँवर रसिक मनमोहन लागौं तिहारे पैयाँ।।

तुमहिं जानि करि कनक दोहनी घर तें पठई मैया।

निकटहि है यह खरिक हमारो, नागर लेहुँ बलैया।।

देखियत परम सुदेस लरिकई चित चहुँटयो सुंदरैया।

कुंभनदास प्रभु मानि लई रति गिरि गोबरधन रैया।।