हरीराम व्यास जी (HARIRAM VYAS : THE HINDI POET) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

हरीराम व्यास जी (HARIRAM VYAS : THE HINDI POET) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

इनका पूरा नाम हरीराम व्यास था और ये ओरछा के रहनेवाले सनाढय शुक्ल ब्राह्मण थे। ओरछानरेश मधुकरशाह के ये राजगुरु थे। पहले ये गौड़ संप्रदाय के वैष्णव थे, पीछे हितहरिवंश जी के शिष्य होकर राधवल्लभी हो गए। इनका काल संवत् 1620 के आसपास है। पहले ये संस्कृत के शास्त्रार्थी पंडित थे और सदा शास्त्रार्थ करने के लिए तैयार रहते थे। एक बार वृंदावन में जाकर गोस्वामी हितहरिवंश जी को शास्त्रार्थ के लिए ललकारा। गोसाईं जी ने नम्र भाव से यह पद कहा :

यह जो एक मन बहुत ठौर करि कहि कौनै सचु पायो।

जहँ तहँ बिपति जार जुवती ज्यों प्रगट पिंगला गायो।

यह पद सुनकर व्यास जी चेत गए और हितहरिवंश जी के अनन्य भक्त हो गए। उनकी मृत्यु पर इन्होंने इस प्रकार अपना शोक प्रकट किया :

हुतो रस रसिकन को आधार।

बिन हरिबंसहि सरस रीति को कापै चलिहै भार?

को राध दुलरावै गावै, बचन सुनावै कौन उचार?

वृंदावन की सहज माधुरी, कहिहै कौन उदार?

पद रचना अब कापै ह्वैहै? निरस भयो संसार।

बड़ो अभाग अनन्य सभा को, उठिगो ठाट सिंगार

जिन बिन दिन छिन जुग सम बीतत सहज रूप आगार।

व्यास एक कुल कुमुद चंद बिनु उडुगन जूठी थार।

जब हितहरिवंश जी से दीक्षा लेकर व्यास जी वृंदावन में ही रह गए तब महाराज मधुकर साह इन्हें ओरछा ले जाने के लिए आए, पर ये वृंदावन छोड़कर न गए और अधीर होकर इन्होंने यह पद कहा :

वृंदावन के रूख हमारे माता पिता सुत बंध।

गुरु गोविंद साधुगति मति सुख, फल फूलन की गंध।

इनहिं पीठि दै अनत डीठि करै सो अंधन में अंध।

व्यास इनहिं छोड़ै और छुड़ावै ताको परियो कंध।

इनकी रचना परिमाण में भी बहुत विस्तृत है और विषयभेद के विचार से भी अधिकांश कृष्णभक्तों की अपेक्षा व्यापक है। ये श्रीकृष्ण की बाललीला और श्रृंगारलीला में लीन रहने पर भी बीच बीच में संसार पर भी दृष्टि डाला करते थे। इन्होंने तुलसीदास जी के समान खलों, पाखंडियों आदि का भी स्मरण किया है और रसगान के अतिरिक्त तत्वनिरूपण में भी ये प्रवृत्त हुए हैं। प्रेम को इन्होंने शरीर व्यवहार से अलग अतनअर्थात् मानसिक या आध्यात्मिक वस्तु कहा है। ज्ञान, वैराग्य और भक्ति तीनों पर बहुत से पद और साखियाँ इनकी मिलती हैं। इन्होंने एक रासपंचाध्यायीभी लिखी है, जिसे लोगों ने भूल से सूरसागर में मिला लिया है। इनकी रचना के थोड़े से उदाहरण यहाँ दिए जाते हैं :

आज कछु कुंजन में बरषा सी।

बादल दल में देखि सखी री! चमकति है चपला सी।

नान्हीं नान्हीं बूँदन कछु धुरवा से, पवन बहै सुखरासी

मंद मंद गरजनि सी सुनियतु, नाचति मोरसभा सी।

इंद्रधनुष बगपंगति डोलति, बोलति कोककला सी

इंद्रबधू छबि छाइ रही मनु, गिरि पर अरुनघटा सी

उमगि महीरुह स्यों महि फूली, भूली मृगमाला सी।

रटति प्यास चातक ज्यों रसना, रस पीवत हू प्यासी।

 

सुघर राधिका प्रवीन बीना, वर रास रच्यो,

स्याम संग वर सुढंग तरनि तनया तीरे।

आनंदकंद वृंदावन सरद मंद मंद पवन,

कुसुमपुंज तापदवन, धुनित कल कुटीरे

रुनित किंकनी सुचारु, नूपुर तिमि बलय हारु,

अंग बर मृदंग ताल तरल रंग भीरे

गावत अति रंग रह्यो, मोपै नहिं जात कह्यो,

व्यास रसप्रवाह बह्यो निरखि नैन सीरे।

 

(साखी)

व्यास न कथनी काम की, करनी है इक सार।

भक्ति बिना पंडित वृथा, ज्यों खर चंदन भार।

अपने अपने मत लगे, बादि मचावत सोर।

ज्यों त्यों सबको सेइबो, एकै नंदकिसोर

प्रेम अतन या जगत में, जानै बिरला कोय।

व्यास सतन क्यों परसि है, पचि हारयो जग रोय

सती, सूरमा संत जन, इन समान नहिं और।

आगम पंथ पै पग धरै, डिगे न पावैं ठौर।

 

प्रश्नोत्तरी-26 (हिंदी भाषा एवं साहित्य)

#हरीराम व्यास के संबंध में निम्नलिखित में कौन-कौन से कथन सत्य हैं :

(A) ओरछानरेश मधुकरशाह के हरीराम व्यास राजगुरु थे।

(B) हितहरिवंश जी से दीक्षा लेकर हरीराम व्यास जी वृंदावन में ही रह गए।

(C) प्रेम को हरीराम व्यास ने शरीर व्यवहार से अलग अतनअर्थात् मानसिक या आध्यात्मिक वस्तु कहा है।

(D) ‘बसौ मेरे नैननि में दोउ चंद।

गोर बदनि बृषभानु नंदिनी, स्यामबरन नँदनंद।इन काव्य-पंक्तियों के रचनाकार हरीराम व्यास हैं।

(A)(a)(b)(c)

(B)(b)(c)(d)

(C)(a)(c)(d)

(D)(a)(b)(d)

Ans. : (A)(a)(b)(c)

#‘व्यास न कथनी काम की, करनी है इक सार।

भक्ति बिना पंडित वृथा, ज्यों खर चंदन भार।’ इन काव्य-पंक्तियों के रचनाकार हैं :

(A) हरीराम व्यास

(B) मीराबाई

(C) स्वामी हरिदास

(D) सूरदास मदनमोहन

Ans. : (A) हरीराम व्यास

#हरीराम व्यास जी ने एक रासपंचाध्यायीभी लिखी है, जिसे लोगों ने भूल से सूरसागरमें मिला लिया है।यह कथन किसका है?

(A) रामचंद्र शुक्ल

(B) हज़ारीप्रसाद द्विवेदी

(C) विद्यानिवास मिश्र

(D) श्रीभट्ट

Ans. : (A) रामचंद्र शुक्ल

 

#‘न सुघर राधिका प्रवीन बीना, वर रास रच्यो,

स्याम संग वर सुढंग तरनि तनया तीरे।’

इन काव्य-पंक्तियों के रचनाकार हैं :

(A) परमानंददास

(B) सूरदास

(C) हरीराम व्यास

(D) गदाधर भट्ट

Ans. : (C) हरीराम व्यास

 

#‘वृंदावन के रूख हमारे माता पिता सुत बंध।

गुरु गोविंद साधुगति मति सुख, फल फूलन की गंध।’

इन काव्य-पंक्तियों के रचनाकार हैं :

(A) परमानंददास

(B) हरीराम व्यास

(C) सूरदास

(D) गदाधर भट्ट

Ans. : (B) हरीराम व्यास

 

#‘आज कछु कुंजन में बरषा सी।

बादल दल में देखि सखी री! चमकति है चपला सी।’

इन काव्य-पंक्तियों के रचनाकार हैं :

(A) हरीराम व्यास

(B) परमानंददास

(C) सूरदास

(D) गदाधर भट्ट

Ans. : (A) हरीराम व्यास

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण 5—सगुणधारा : कृष्णभक्ति शाखा)