ध्रुवदास (Druvdas : the Hindi poet) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

ध्रुवदास (Druvdas : the Hindi poet) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

ये श्री हितहरिवंश जी के शिष्य स्वप्न में हुए थे। इसके अतिरिक्त इनका कुछ जीवनवृत्त नहीं प्राप्त हुआ है। ये अधिकतर वृंदावन ही में रहा करते थे। इनकी रचना बहुत ही विस्तृत है और इन्होंने पदों के अतिरिक्त दोहे, चौपाई, कवित्त, सवैये आदि अनेक छंदों में भक्ति और प्रेमतत्व का वर्णन किया है। छोटे मोटे सब मिलाकर इनके लगभग चालीस ग्रंथ मिले हैं जिनके नाम ये हैं :

वृंदावनसत, सिंगारसत, रसरत्नावली, नेहमंजरी, रहस्यमंजरी, सुखमंजरी, रतिमंजरी, वनविहार, रंगविहार, रसविहार, आनंददसाविनोद, रंगविनोद, नृत्यविलास, रंगहुलास, मानरसलीला, रहसलता, प्रेमलता, प्रेमावली, भजनकुंडलिया, भक्तनामावली, मनसिंगार, भजनसत, प्रीतिचौवनी, रसमुक्तावली, बामन बृहत् पुराण की भाषा, सभा मंडली, रसानंदलीला, सिद्धांतविचार, रसहीरावली, हित सिंगार लीला, ब्रजलीला, आनंदलता, अनुरागलता, जीवदशा, वैद्यलीला, दानलीला, व्याहलो।

नाभा जी के भक्तमाल के अनुकरण पर इन्होंने भक्तनामावलीलिखी है जिसमें अपने समय तक के भक्तों का उल्लेख किया है। इनकी कई पुस्तकों में संवत् दिए हैं जैसे सभामंडली 1681, वृंदावनसत 1686 और रसमंजरी 1698 अत: इनका रचनाकाल संवत् 1660 से 1700 तक माना जा सकता है। इनकी रचना के कुछ नमूने नीचे दिए जाते हैं :

 

(‘सिंगारसतसे)

रूपजल उठत तरंग हैं कटाछन के,

अंग अंग भौंरन की अति गहराई है।

नैनन को प्रतिबिंब परयो है कपोलन में,

तेई भए मीन तहाँ, ऐसी उर आई है

अरुन कमल मुसुकान मानो फबि रही,

थिरकन बेसरि के मोती की सुहाई है।

भयो है मुदित सखी लाल को मराल मन,

जीवन जुगल ध्रुव एक ठाँव पाई है।

(‘नेहमंजरीसे)

प्रेम बात कछु कहि नहिं जाई । उलटी चाल तहाँ सब भाई।।

प्रेम बात सुनि बौरो होई। तहाँ सयान रहै नहिं कोई।।

तन मन प्रान तिही छिनहारे । भली बुरी कछुवै न विचारे

ऐसो प्रेम उपजिहै जबहीं । हित ध्रुव बात बनैगी तबहीं।

(‘भजनसतसे)

बहु बीती थोरी रही, सोऊ बीती जाय।

हित ध्रुव बेगि बिचारि कै बसि वृंदावन आय।

बसि वृंदावन आय त्यागि लाजहि अभिमानहि।

प्रेमलीन ह्वै दीन आपको तृन सम जानहि

सकल सार कौ सार, भजन तू करि रस रीती।

रे मन सोच विचार, रही थोरी, बहु बीती।

कृष्णोपासक भक्त कवियों की परंपरा अब यहीं समाप्त की जाती है। पर इसका अभिप्राय यह नहीं कि ऐसे भक्त कवि आगे और नहीं हुए। कृष्णगढ़ नरेश महाराज नागरीदासजी, अलबेली अलिजी, चाचा हितवृंदावनदासजी, भगवत रसिक आदि अनेक पहुँचे हुए भक्त बराबर होते गए हैं जिन्होंने बड़ी सुंदर रचनाएँ की हैं। पर पूर्वोक्तकाल के भीतर ऐसे भक्त कवियों की जितनी प्रचुरता रही है उतनी आगे चलकर नहीं। वे कुछ अधिक अंतर देकर हुए हैं। ये कृष्णभक्त कवि हमारे साहित्य में प्रेममाधुर्य का जो सुध स्रोत बहा गए हैं, उसके प्रभाव से हमारे काव्यक्षेत्र में सरसता और प्रफुल्लता बराबर बनी रहेगी। दु:खवादकी छाया आ आकर भी टिकने न पाएगी। इन भक्तों का हमारे साहित्य पर बड़ा भारी उपकार है।

 

प्रश्नोत्तरी (हिंदी भाषा एवं साहित्य)

#ध्रुवदास के संबंध में निम्नलिखित में कौन-कौन से कथन सत्य हैं :

(A) ये श्री हितहरिवंश जी के शिष्य स्वप्न में हुए थे।

(B) इन्होंने पदों के अतिरिक्त दोहे, चौपाई, कवित्त, सवैये आदि अनेक छंदों में भक्ति और प्रेमतत्व का वर्णन किया है।

(C) ये रामाश्रयी शाखा के कवि थे।

(D) ‘‘रूपजल उठत तरंग हैं कटाछन के,

अंग अंग भौंरन की अति गहराई है।’’ इन काव्य-पंक्तियों के रचनाकार ध्रुवदास हैं।

(A)(a)(b)(c)

(B)(b)(c)(d)

(C)(a)(c)(d)

(D)(a)(b)(d)

Ans. : (D)(a)(b)(d)

 

#ध्रुवदास के संबंध में निम्नलिखित में कौन-कौन से कथन सत्य हैं :

  • नाभा जी के भक्तमाल के अनुकरण पर इन्होंने भक्तनामावलीलिखी है जिसमें अपने समय तक के भक्तों का उल्लेख किया है।
  • ये प्रेममार्गी शाखा के कवि हैं।
  •  सभामंडली (संवत् 1681), वृंदावनसत ( संवत् 1686) और रसमंजरी (संवत् 1698) ध्रुवदास की रचनाएं हैं।
  • ‘‘प्रेम बात कछु कहि नहिं जाई । उलटी चाल तहाँ सब भाई।।

प्रेम बात सुनि बौरो होई। तहाँ सयान रहै नहिं कोई।।’’ इन काव्य-पंक्तियों के रचनाकार ध्रुवदास हैं।

(A)(a)(b)(c)

(B)(b)(c)(d)

(C)(a)(c)(d)

(D)(a)(b)(d)

Ans. : (C)(a)(c)(d)

 

#‘‘ये कृष्णभक्त कवि हमारे साहित्य में प्रेममाधुर्य का जो सुध स्रोत बहा गए हैं, उसके प्रभाव से हमारे काव्यक्षेत्र में सरसता और प्रफुल्लता बराबर बनी रहेगी। दु:खवादकी छाया आ आकर भी टिकने न पाएगी। इन भक्तों का हमारे साहित्य पर बड़ा भारी उपकार है।’’ यह कथन किसका है?

(A) श्यामसुंदरदास

(B) हज़ारीप्रसाद

(C) विद्यानिवास मिश्र

(D) रामचंद्र शुक्ल

Ans. : (D) रामचंद्र शुक्ल

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण 5—सगुणधारा : कृष्णभक्ति शाखा)