छीहल (Chheehal : the Hindi poet) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

छीहल (Chheehal : the Hindi poet) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

छीहल : ये राजपूताने की ओर के थे। संवत् 1575 में इन्होंने पंचसहेलीनाम की एक छोटी सी पुस्तक दोहों में राजस्थानी मिली भाषा में बनाई जो कविता की दृष्टि से अच्छी नहीं कही जा सकती। इसमें पाँच सखियों की विरह वेदना का वर्णन है दोहे इस ढंग के हैं :

देख्या नगर सुहावना, अधिक सुचंगा थानु।

नाउँ चँदेरी परगटा, जनु सुरलोक समानु।

ठाईं ठाईं सरवर पेखिय, सूभर भरे निवाण।

ठाईं ठाईं कुवाँ बावरी, सोहइ फटिक सवाँण।

पंद्रह सै पचहत्तारै, पूनिम फागुण मास।

पंचसहेली वर्णई, कवि छीहल परगास।

इनकी लिखी एक बावनीभी है जिसमें 52 दोहे हैं।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण 6 : भक्तिकाल की फुटकल रचनाएं)

प्रश्नोत्तरी (हिंदी भाषा एवं साहित्य, छीहल)

#छीहल के संबंध में निम्नलिखित में कौन-कौन से कथन सत्य हैं :

(A) ये श्री हितहरिवंश जी के शिष्य स्वप्न में हुए थे।

(B) संवत् 1575 में छीहल ने पंचसहेलीनाम की पुस्तक दोहों में राजस्थानी मिली भाषा में बनाई। इनकी लिखी एक बावनीभी है जिसमें 52 दोहे हैं।

(C) ‘पंचसहेली’ में पाँच सखियों की विरह वेदना का वर्णन है।

(D) ‘‘देख्या नगर सुहावना, अधिक सुचंगा थानु।

नाउँ चँदेरी परगटा, जनु सुरलोक समानु।’’ इन काव्य-पंक्तियों के रचनाकार छीहल हैं।

(A)(a)(b)(c)

(B)(b)(c)(d)

(C)(a)(c)(d)

(D)(a)(b)(d)

Ans. : (B)(b)(c)(d)