#भूल-ग़लती (गजानन माधव #मुक्तिबोध, NTAUGC NET/JRF के नए पाठ्यक्रम में शामिल)

#भूल-ग़लती (गजानन माधव #मुक्तिबोध, NTAUGC NET/JRF के नए पाठ्यक्रम में शामिल)

मुक्तिबोध ने भूल-गलती कविता में भूल-गलती को ही सुल्तान के रूप में पेश किया है। उसके सामने हथकड़ी पहने हुए ऊंचे क़द का मूर्त रूप ईमान प्रस्तुत होता है। सारे धार्मिक संत और सैनिक सरदार आदि ख़ामोश रहते हैं। ईमान को जीवन की शर्मनाक शर्तें मंज़ूर नहीं।

 

भूल-ग़लती

गजानन माधव मुक्तिबोध

 

आज बैठी है ज़िरहबख़्तर पहनकर

तख़्त पर दिल के,

चमकते हैं खड़े हथियार उसके दूर तक,

आँखें चिलकती हैं नुकीले तेज़ पत्थर-सी,

खड़ी हैं सिर झुकाए

सब क़तारें

बेज़ुबाँ बेबस सलाम में,

अनगिनत खम्भों व मेहराबों-थमे

दरबारे आम में।

 

सामने

बेचैन घावों की अज़ब तिरछी लकीरों से कटा

चेहरा

कि जिस पर काँप

दिल की भाप उठती है…

पहने हथकड़ी वह एक ऊँचा क़द

समूचे जिस्म पर लत्तर

झलकते लाल लम्बे द़ाग

बहते खू के

वह क़ैद कर लाया गया ईमान…

सुलतानी निगाहों में निगाहें डालता,

बेख़ौफ़ नीली बिजलियों को फैंकता

ख़ामोश !!

सब ख़ामोश

मनसबदार

शाइर और सूफ़ी,

अल ग़ज़ालीइब्ने सिनाअलबरूनी

आलिमो फ़ाज़िल सिपहसालारसब सरदार

हैं ख़ामोश !!

 

नामंज़ूर

उसको ज़िन्दगी की शर्म की सी शर्त

नामंज़ूर हठ इनकार का सिर तान..ख़ुद-मुख़्तारर

कोई सोचता उस वक्त

छाये जा रहे हैं सल्तनत पर घने साये स्याह,

सुलतानी जिरहबख़्तर बना है सिर्फ़ मिट्टी का,

वो-रेत का-सा ढेर-शाहंशाह,

शाही धाक का अब सिर्फ़ सन्नाटा !!

(लेकिनना

जमाना साँप का काटा)

भूल (आलमगीर)

मेरी आपकी कमज़ोरियों के स्याह

लोहे का जिरहबख़्तर पहनख़ूंखार

हाँ ख़ूंख़ार आलीजाह,

वो आँखें सचाई की निकाले डालता,

सब बस्तियाँ दिल की उजाड़े डालता

करता हमे वह घेर

बेबुनियादबेसिर-पैर..

हम सब क़ैद हैं उसके चमकते तामझाम में

शाही मुक़ाम में !!

 

इतने में हमीं में से

अजीब कराह सा कोई निकल भागा

भरे दरबारे-आम में मैं भी

सम्भल जागा

कतारों में खड़े ख़ुदग़र्ज़-बा-हथियार

बख़्तरबंद समझौते

सहमकररह गए,

दिल में अलग जबड़ाअलग दाढ़ी लिए,

दुमुँहेपन के सौ तज़ुर्बों की बुज़ुर्गी से भरे,

दढ़ियल सिपहसालार संजीदा

सहमकर रह गये !!

 

लेकिनउधर उस ओर,

कोईबुर्ज़ के उस तरफ़ जा पहुँचा,

अँधेरी घाटियों के गोल टीलोंघने पेड़ों में

कहीं पर खो गया,

महसूस होता है कि यह बेनाम

बेमालूम दर्रों के इलाक़े में

(सचाई के सुनहले तेज़ अक्सों के धुँधलके में)

मुहैया कर रहा लश्कर;

हमारी हार का बदला चुकाने आयगा

संकल्प-धर्मा चेतना का रक्तप्लावित स्वर,

हमारे ही हृदय का गुप्त स्वर्णाक्षर

 

प्रकट होकर विकट हो जायगा !!