#अँधेरे में (गजानन माधव #मुक्तिबोध, NTAUGC NET/JRF के नए पाठ्यक्रम में शामिल)

#अँधेरे में (गजानन माधव #मुक्तिबोध, NTAUGC NET/JRF के नए पाठ्यक्रम में शामिल)

 

अंधेरे में कविता एक स्वप्न कथा है, एक फेंटेसी है। यह फेंटेसी अंतःदर्शन की ऐसी प्रक्रिया के रूप में प्रयुक्त है, जिसमें एक स्तर पर साम्राज्यवादी, पूंजीवादी और फ़ासिस्ट प्रतिष्ठानों की गतिविधियों के रहस्य खुलते हैं और दूसरे स्तर पर इस बाह्यजगत् और अंतर्जगत् की विषमता के संवेदनात्मक ज्ञान परस्पर आबद्ध हैं। मुक्तिबोध ने फेंटेसी को अनुभव की कन्या कहा है। शमशेर बहादुर सिंह ने मुक्तिबोध के अंधेरे में कविता को आधुनिक जन इतिहास का स्वतंत्रता से पूर्व और पश्चात का एक दहकता इस्पाती दस्तावेज़ कहा है। इसका प्रथम प्रकाशन आशंका के द्वीप अंधेरे में शीर्षक से हुआ था। मुक्तिबोध फैंटेसी शिल्प में लिखने वाले पहले कवि माने जाते हैं। यह मुक्तिबोध की सबसे लंबी काव्य-रचना है। डॉ. नामवर सिंह ने इसे नई कविता की चरम उपलब्धि कहा है। यह आठ खंडों में विभक्त है। ऊपरी तौर पर देखने पर प्रत्येक खंड एक-दूसरे से भिन्न लग सकता है, किंतु काव्य की दृष्टि से पूरी कविता आद्यंत एक सूत्र में पिरोई हुई है। कल्पना में नवंबर 1964 में हुआ।

अँधेरे में

ज़िन्दगी के…    

कमरों में अँधेरे
लगाता है चक्कर
कोई एक लगातार;

 

आवाज़ पैरों की देती है सुनाई
बार-बार….बार-बार,
वह नहीं दीखता… नहीं ही दीखता,
किन्तु वह रहा घूम
तिलस्मी खोह में ग़िरफ्तार कोई एक,
भीत-पार आती हुई पास से,
गहन रहस्यमय अन्धकार ध्वनि-सा

 

अस्तित्व जनाता
अनिवार कोई एक,

 

और मेरे हृदय की धक्-धक्
पूछती हैवह कौन
सुनाई जो देतापर नहीं देता दिखाई !
इतने में अकस्मात गिरते हैं भीतर से
फूले हुए पलस्तर,
खिरती है चूने-भरी रेत
खिसकती हैं पपड़ियाँ इस तरह
ख़ुद-ब-ख़ुद
कोई बड़ा चेहरा बन जाता है,
स्वयमपि
मुख बन जाता है दिवाल पर,
नुकीली नाक और
भव्य ललाट है,
दृढ़ हनु
कोई अनजानी अन-पहचानी आकृति।
कौन वह दिखाई जो देतापर
नहीं जाना जाता है !!
कौन मनु ?

 

बाहर शहर केपहाड़ी के उस पारतालाब
अँधेरा सब ओर,
निस्तब्ध जल,
परभीतर से उभरती है सहसा
सलिल के तम-श्याम शीशे में कोई श्वेत आकृति
कुहरीला कोई बड़ा चेहरा फैल जाता है
और मुसकाता है,
पहचान बताता है,
किन्तुमैं हतप्रभ,
नहीं वह समझ में आता।

 

अरे ! अरे !!
तालाब के आस-पास अँधेरे में वन-वृक्ष
चमक-चमक उठते हैं हरे-हरे अचानक
वृक्षों के शीशे पर नाच-नाच उठती हैं बिजलियाँ,
शाखाएँडालियाँ झूमकर झपटकर
चीख़एक दूसरे पर पटकती हैं सिर कि अकस्मात्
वृक्षों के अँधेरे में छिपी हुई किसी एक
तिलस्मी खोह का शिला-द्वार
खुलता है धड़ से
……………………
घुसती है लाल-लाल मशाल अजीब-सी
अन्तराल-विवर के तम में
लाल-लाल कुहरा,
कुहरे मेंसामनेरक्तालोक-स्नात पुरुष एक,
रहस्य साक्षात् !!

 

तेजो प्रभामय उसका ललाट देख
मेरे अंग-अंग में अजीब एक थरथर
गौरवर्णदीप्त-दृगसौम्य-मुख
सम्भावित स्नेह-सा प्रिय-रूप देखकर
विलक्षण शंका,
भव्य आजानुभुज देखते ही साक्षात्
गहन एक संदेह।

 

वह रहस्यमय व्यक्ति
अब तक न पायी गयी मेरी अभिव्यक्ति है
पूर्ण अवस्था वह
निज-सम्भावनाओंनिहित प्रभावोंप्रतिमाओं की,
मेरे परिपूर्ण का आविर्भाव,
हृदय में रिस रहे ज्ञान का तनाव वह,
आत्मा की प्रतिमा।
प्रश्न थे गम्भीरशायद ख़तरनाक भी,
इसी लिए बाहर के गुंजान
जंगलों से आती हुई हवा ने
फूँक मार एकाएक मशाल ही बुझा दी-
कि मुझको यों अँधेरे में पकड़कर
मौत की सज़ा दी !

 

किसी काले डैश की घनी काली पट्टी ही
आँखों में बँध गयी,
किसी खड़ी पाई की सूली पर मैं टाँग दिया गया,
किसी शून्य बिन्दु के अँधियारे खड्डे में

 

गिरा दिया गया मैं
अचेतन स्थिति में !

(अंधेरे मेंशीर्षक से कल्पना में नवंबर 1964 में हुआ।)