#इंशा अल्लाह ख़ां : हिंदी-उर्दू के साहित्यकार

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#इंशा अल्लाह ख़ां : हिंदी-उर्दू के साहित्यकार

#मुहम्मद इलियास हुसैन

समय शक्तिमान है, अत्यन्त बलवान है। इसके सामने किसी की कोई चाल नहीं चलती, चाहे दुनिया में वह अपनी सत्ता क़ायम रखने के लिए लाख चालें चलता रहा हो। समय की पकड़ से कोई नहीं बच सकता, चाहे वह सीसा पिलाई हुई दीवार से निर्मित भवन में रहता हो या कहीं और।

सैयद इंशा अल्लाह ख़ां ‘इंशा’ को भी काल ने लखनऊ में एक दिसम्बर 1817 ई॰ को दबोच ही लिया, वे भी के गाल में समा गये और जो शेष बचें हैं, वे भी एक दिन काल-कवलित हो जायेंगे, उनकी सांसारिक जीवन-लीला भी समाप्त हो जायेगी, क्योंकि मनुष्य मरणशील है और हर जीव को मौत का मज़ा चखना है, विधि का विधान यही है।

समय की इस अचूक पकड़ और अनुपम मारक क्षमता का वर्णन ‘इंशा’ ने अपनी एक कालजयी शेअर (द्विपदी) में इस प्रकार किया है

कमर बांधे हुए चलने को यां सब तैयार बैठे हैं

बहुत आगे गये, बाक़ी जो हैं तैयार बैठे हैं

समय-चक्र किसी को भी चैन से बैठने नहीं देता

भला गर्दिश फ़लक की चैन देती है किसे ‘इंशा’!

ग़नीमत है कि हमसूरत यहां दो-चार बैठे हैं।

सैयद इंशा अल्लाह ख़ां ‘इंशा’ नवाब सआदत अली ख़ां̅युग के उर्दू के महान शायर और गद्यकार हैं। वे हिंदी के पहले कहानीकार हैं। हालांकि इस बात को लेकर विद्वानों में मतभेद है। उनकी रचनाएं तत्युगीन उत्तर भारतीय समाज और संस्कृति का सर्वांगपूर्ण चित्रण करती हैं। 

इंशा’ ने सन 1903 ई॰ में फ़ारसी लिपि में अमर प्रेम कहानी ‘रानी केतकी की कहानी’ या ‘उदयभान चरित’ लिखी । साथ ही, फ़ारसी भाषा में उर्दू के प्रथम व्याकरण और भाषाविज्ञान की एक महत्त्वपूर्ण पुस्तक ‘दरिया-ए-लताफ़त’ की रचना की।

इंशा’ बड़े ही हंसमुख, हाज़िर जवाब और प्रतिभाशाली व्यक्ति थे। उनका दिमाग़ एक ऐसा भंडार था, जो अनायास ही उनके सामने क्षण भर में हर चीज़ पेश कर देता था। विनोदप्रियता, हास्य-व्यंग्य और छेड़-छाड़ उनके रग-रग में समाया हुआ था।

छेड़-छाड़ और बिगाड़, जो आजीवन उनके साथ लगा रहा, पर उनका एक मशहूर शेअर देखिए

अजीब लुत्फ़ कुछ आपस की छेड़-छाड़ में है।

कहां मिलाप में वह बात जो बिगाड़ में है।

लेकिन जब उनके अच्छे दिन लद गए और बुरे दिन आ धमके तो सुबह की शीतल पूरबी हवा भी उन्हें मानो चिढ़ाने लगी̅

न छेड़ ऐ निकहते-बादे-बहारी, राह लग अपनी

तुझे अठखेलियां सूझी हैं हम बेज़ार बैठे हैं।

और अपनी दुर्दशा का हाल अपने दोस्तों तक पहुंचाने का सुबह की पूरबैया हवा से विनती करते हुए ‘इंशा’ कहते हैं

ऐ बादे-सबा महफ़िले-अहबाब में कहियो

देखा है जो कुछ हाल तहे-दाम हमारा।

फलतः ‘इंशा’ के यहां तंगी और भुखमरी ने डेरा जमा लिया और वही ‘इंशा’ जिसके दरवाज़े पर हाथी झूमा करते थे और धन-दौलत पहरा दिया करते थे, इसी प्रतिकूल समय और दयनीय दशा में 19 मई 1817 को लखनऊ में इस दुख भरी दुनिया से कूच गये।

#रानी केतकी की कहानी

यह एक लौकिक अमर प्रेम कहानी है। ‘इंशा’ ने सन् 1903 ई॰ (उर्दू के विद्वानों के अनुसार 1904 ई.) में खड़ी बोली में और फ़ारसी लिपि में इसकी रचना की। यह एकमात्र कहानी है, जिसे हिन्दी-उर्दू दोनों भाषाओं की पहली कथात्मक रचना होने का गौरव प्राप्त है। हिन्दी-उर्दू दोनों में इसका ऐतिहासिक महत्त्व है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार ‘इंशा’ ने इस कहानी में कुछ ठेठ खडी बोली के पद्य भी उर्दू छन्दों में रखे हैं। बाबू श्यामसुन्दर दास ने इसे ‘हिन्दी की प्रथम कहानी’ और चन्द्रबली पाण्डेय ने उर्दू कहानी माना है। आचार्य शुक्ल इसे लम्बी कहानी के अन्तर्गत रखते हैं, जबकि डॉ॰ कुसुम राय ने इसे ‘लघु उपन्यास’ कहा है और उर्दू के महान विद्वान डॉ॰ सैयद अब्दुल बारी ने इसे ‘उर्दू की संक्षिप्ततम गाथा ‘दास्तान’ कहा है। उर्दू के दूसरे साहित्येतिहासकारों ने इसे उर्दू कहानी ही माना है। 

सैयद एजाज़ हुसैन ने ‘रानी केतकी की कहानी’ को विशु) उर्दू भाषा की कहानी माना है । उन्हीं के शब्दों में

‘‘दूसरी किताब की भाषा उर्दू है, जिसका नाम ‘रानी केतकी कहानी’ है। इसमें यह प्रयास किया गया है कि अरबी-फ़ारसी का एक शब्द भी न आने पाये। यह विशु) उर्दू का एक अच्छा नमूना है।’’[i]

‘इंशा’ की गद्य-रचनाओं का उल्लेख करते हुए सैयद एहतिशाम हुसैन ने भी लिखा है कि ‘रानी केतकी की कहानी’ उर्दू भाषा की गद्य-रचना है

दरिया-ए-लताफ़त’ और ‘लतायफ़ुल-सआदत’ फ़ारसी गद्य में और ‘रानी केतकी की कहानी’ और ‘सिल्के-गुहर’ उर्दू गद्य में मौजूद हैं।’’[ii]

डॉ॰ कुसुम राय लिखती हैं कि ‘इंशा’ ‘रानी केतकी की कहानी’ में अरबी, फ़ारसी, तुर्की, गंवारी अर्थात् ब्रजभाषा, अवधी और संस्कृत शब्दों के मेल से अपनी भाषा को दूर रखना चाहते थे 

‘‘बाहर की बोली अर्थात् अरबी, फ़ारसी, तुर्की, गंवारी अर्थात् ब्रजभाषा, अवधी और भाखापन अर्थात् संस्कृत शब्दों के मेल से अपनी भाषा को दूर रखना चाहते थे। प्रारम्भिक गद्य लेखकों में शुक्ल जी ने उनकी भाषा को सबसे चटकीली, मुहावरेदार और चलती बताया है, जिसमें फ़ारसी ढंग के वाक्य-विन्यास कहीं-कहीं प्रयुक्त हुए हैं।’’[iii]

विजयेन्द्र स्नातक ने ‘इंशा’-रचित ‘रानी केतकी की कहानी’ की रचना-कला की भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए लिखा है

‘‘इन्होंने ‘रानी केतकी की कहानी’ भी बिना किसी तात्कालिक उद्देश्य से प्रेरित होकर सुबोध तथा रोचक भाषा में लिखी। अरबी-फ़ारसी के वातावरण लखनऊमें रहते हुए भी हिन्दीपन से रंगी हुई चुलबुली भाषा में सफलतापूर्वक गद्य लिखा। ‘रानी केतकी की कहानी’ न केवल शब्द भंडार में वरन भावों की दृष्टि से भी प्रौढ़ एवं चटकीली भाषा का रूप उपस्थित करती है।’’[iv]

आचार्य शुक्ल ने ‘इंशा’ द्वारा ‘रानी केतक की कहानी’ का आरम्भ मनोरंजक ढंग से करने के बारे में लिखा है कि अपनी कहानी का आरम्भ ही उन्होंने इस ढंग से किया है जैसे लखनऊ के भांड घोड़ा कुदाते हुए महफ़िल में आते हैं।

उन्होंने कहा है कि इंशा अल्लाह ख़ां दूसरे लेखक हैं, जिन्होंने हिन्दी गद्य के निर्माण में विशेष योगदान दिया है। वे लल्लूलाल और सदल मिश्र के समसामयिक थे, पर ‘रानी केतकी की कहानी’ लाल और मिश्र की रचनाओं से पहले लिखी जा चुकी थी। ‘रानी केतकी की कहानी’ लखनऊ में लिखी गई। इसे लिखने के कारण पर स्वयं ‘इंशा’ ने इन शब्दों में प्रकाश डाला है

‘‘एक दिन बैठे यह बात अपने ध्यान में चढ़ी कि कोई कहानी ऐसी कहिए कि जिसमें हिन्दवी छुट और किसी बोली का पुट न मिले, तब जा के मेरा जी फूल की कली के रूप में खिले। बाहर की बोली और गंवारी कुछ उसके बीच में न हो। अपने मिलने वालों में से एक कोई बड़े पढ़े-लिखे पुराने-धुराने डांग बूढ़े घाग यह खटराग लगा लाएलगे कहने यह बात होते दिखाई नहीं देती। हिन्दवीपन भी न निकले और भाखापन न हो। बस, भले लोग अच्छों से अच्छे आपस में बोलते-चालते हैं, ज्यों का त्यों वही सब डौल रहे औ छांव किसी की न हो, यही नहीं होने का।’’[v]

इससे स्पष्ट है कि ‘इंशा’ का उद्देश्य ठेठ हिन्दी लिखने का था, जिसमें हिन्दी को छोड़कर और किसी बोली का पुट न रहे।[vi]   

विषय की दृष्टि से भी इस कृति का महत्व स्मरणीय है। इसके माध्यम से सर्वप्रथम खड़ी बोली गद्य में लौकिक प्रेम की कहानी कही गई है, जो खड़ी बोली (हिन्दी-उर्दू) की अमर प्रेम कहानी है ।

यहां यह उल्लेखनीय जान पड़ता है कि उर्दू के साहित्येतिहाकारों ने इसका उल्लेख केवल ‘रानी केतकी कहानी’ के रूप में किया है, जबकि हिन्दी साहित्येतिहासकारों ने ‘उदयभान चरित’ अथवा ‘रानी केतकी की कहानी’ के नाम से इसका उल्लेख किया है। 

त्तकालीन रचकाकार अपनी रचना के आरम्भ में ईश-वन्दना अवश्य करते थे। ‘इंशा’ ने भी इस परम्परा का पालन करते किया है। उन्होंने लिखा है

‘‘सर झुकाकर नाक रगड़़ता हूं, अपने बनानेवाले के सामने जिसने हम सबको बनाया।’’[vii]

इस कहानी का महत्त्व भाषा-शैली और विषय-वस्तु सभी दृष्टियों से है। लेखक ने इसको मुअल्लापन (पुरानी उर्दू) के साथ ही ब्रजभाषा, अवधी और संस्कृत के तत्सम शब्दों को भी अलग रखने का प्रयास किया है और इसमें बहुत हद तक सफल भी हुए हैं। यह कहानी शु) लौकिक प्रेम को आधार बनाकर पाठकों के मनोरंजन के लिए लिखी गयी है।

अन्त में डॉ॰ बच्चन सिंह के शब्दों में यही कहा जा सकता है कि ‘इंशा’ ने शिष्टजनों की बोलचाल की भाषा में, जिसमें न तो संस्कृत प्रभाव था, न अरबी-फ़ारसी का रानी केतकी की कहानी लिखी।’’[viii]

उर्दू के मशहूर शायर फ़िराक़ गोरखपुरी ने हिन्दी-उर्दू दोनों भाषाओं में इस कहानी का ऐतिहासिक महत्त्व प्रतिपादित करते हुए लिखा है

‘‘फ़ारसी और अरबी के प्रकाण्ड विद्वान थे और भारत की कई भाषाओं पर भी उन्हें अधिकार प्राप्त था। यही नहीं, भाषा पर ऐसा अधिकार था कि देशज शब्दों में ही एक पूरी पुस्तक ‘रानी केतकी की कहानी’ लिख गये, जिसका हिन्दी तथा उर्दू दोनों में ऐतिहासिक महत्त्व है। इस कहानी में संस्कृत, अरबी या फ़ारसी का एक भी शब्द नहीं है।’’[ix]

वस्तुव में,  ‘इंशा’ अपनी प्रवाहमयी, मनोरंजक और हास्यपूर्ण वर्णन-शैली, चटपटी और लच्छेदार काव्यावली तथा विशु) खड़ी बोली हिन्दी-उर्दू लेखन के साहसिक प्रयोग के कारण हिन्दी-उर्दू-गद्य-साहित्य के इतिहास में सदैव स्मरणीय रहेंगे ।

अनेक भाषाओं के ज्ञाता

इंशा’ न सिर्फ़ उर्दू-हिन्दी-फ़ारसी के विशेषज्ञ थे, बल्कि दुनिया की कई भाषाओं जैसे तुर्की, पश्तो, अरबी, पंजाबी, कश्मीरी, मारवाड़ी, ब्रज, अवधी और बंगला के भी ज्ञाता थे। कभी-कभी अंग्रेज़ी शब्द भी इस्तेमाल करते थे। उनकी रचनाएं देखने से ज्ञात होता है कि भाषाई सामर्थ्य और कौशल उन्हें प्राप्त था। मुहावरों पर उनका शासन चलता था।  

डॉ॰ सैयद एजाज़ हुसैन कहते हैं

‘सौदा’ की तरह ‘इंशा’ का रुझान फ़ारसी, अरबी के अलावा हिन्दी की तरफ़ भी था। इस मामले में वह यक़ीनन ‘सौदा’ से बढ़े हुए थे। यही नहीं कि हिन्दी कविता और गूढ़ शब्द प्रयोग करते हों, बल्कि इस मामले में इतनी अधिक दक्षता प्राप्त थी कि छन्दों और विभिन्न प्रकार की कविताओं का नाम अरबी से बदल कर हिन्दी में करना चाहते थे। इसी लिए ‘मुसल्लस’ का नाम ‘नकड़ा’ और ‘मुरब्बा’ का ‘चौकड़’ रखा था । ……इसी तरह तर्कशास्त्र के अनेक शब्द भी हिन्दी में निर्मित किए। ….. कभी किसी शब्द या मुहावरे की शु)ता के बारे में उनसे प्रमाण मांगा जाता तो शब्दकोशों और उस्ताद शायरों के काव्य से फ़ौरन नमूना पेश कर देते।’’[x]

इंशा’ की भाषा मुहावरेदार और चलती हुई है। ठेठ घरेलू शब्दों के प्रयोग के कारण वह बड़ी प्यारी लगती है। उनमें सानुप्रास विराम देने की प्रवृत्ति अधिक है। इन्होंने पुरानी उर्दू के अनुकरण पर कृदन्तों और विशेषणों में भी बहुवचन सूचक चिह्न लगाया है। ‘इंशा’ ने जगह-जगह बड़ी प्यारी घरेलू ठेठ खड़ी बोली का व्यवहार किया है। इनकी चलती-चटपटी भाषा का नमूना देखिए

इस बात पर पानी डाल दो नहीं तो पछताओगी और अपना किया पाओगी। मुझसे कुछ न हो सकेगा। तुम्हारी जो कुछ अच्छी बात होती तो मेरे मुंह से जीते जी न निकलती, पर यह बात मेरे पेट नहीं पच सकती। तुम अभी अल्लड़ हो, तुमने अभी कुछ देखा नहीं। जो ऐसी बात पर सचमुच ढलाव देखूंगी तो तुम्हारे बाप से कहकर वह भभूत जो वह मुआ निगोड़ा भूत, मुछन्दर का पूत अवधूत दे गया है, हाथ मुरकवाकर छिनवा लूंगी।’

कहीं रोचकता के लिए तुकान्त गद्य का भी प्रयोग किया गया है

आतियां-जातियां जो सांसें हैं। उसके बिन ध्यान यह सब फांसें हैं ….. घरवालियां जो किसी डौल से बहलातियां हैं।

कुंजनियां’, ‘रामजनियां’, ‘डोमिनियां’ के साथ वे ‘धूम-मचातियां’, ‘अंगड़ातियां’ और ‘जम्हातियां’ इत्यादि शब्दों का प्रयोग ‘इंशा’ ने ‘रानी केतकी की कहानी’ में किया है। लेकिन अब खड़ी बोली हिन्दी-उर्दू में इस प्रकार के प्रयोग नहीं चलते।

उर्दू और फ़ारसी के बड़े शायर

इंशा’ उर्दू और फ़ारसी के बड़े शायरों में से एक हैं। उनकी शायरी काव्य-कला से परिपूर्ण है। उनके विचार और भाव में ताज़गी तथा अभिव्यक्ति और संप्रेषण-शैली में नवीनता पाई जाती है। ऐसी कोई बात न थी जिसे वह शेअर में न कह सकते थे, लेकिन इस योग्यता का उपयोग अच्छी शायरी मे न करके वे मसख़रेपन में लगे रहे। वे मुशायरे में जाते तो एक तरफ़ किसी की तारीफ़ के पुल बांध देते तो दूसरी तरफ़ किसी का मुंह चिढ़ा देते। उनके बारे में उर्दू के मशहूर शायर फ़िराक़ गोरखपुरी ने लिखा है

इंशा’ बड़े विद्वान पुरुष थे। विनोदप्रियता आवश्यकता से अधिक न बढ़ी होती तो उर्दू कविता के नाम को चमका जाते।……उनके काव्य को उनकी अति विनोदी प्रवृत्ति ने बिगाड़ दिया। उनकी समस्त रचनाओं में सरलता, प्रवाह और ओज दिखाई देता है, किन्तु गंभीरता बहुत कम मिलती है। कुछ नज़्में उन्होंने गंभीरतापूर्वक आरम्भ की हैं, किन्तु उनमें भी छिछोरेपन के शोर आ गये हैं।’’[xi] 

प्रो॰ सैयद एहतिशाम हुसैन उनकी शायरी के गुण-दोषों पर इन शब्दों में प्रकाश डालते हैं

‘‘शायर की हैसियत से देखा जाये तो ‘इंशा’ की गिनती बड़े शायरों में होगी। उनकी कुछ ग़ज़लें कला और अभिव्यक्ति की दृष्टि से गज़ल-तत्त्व से भरपूर हैं। लेकिन अक्सर जगहों पर द्रवणशीलता या संवेदनशीलता की कमी है। विचार में ताज़गी और अभिव्यक्ति में नवीनता के बावजूद वह शायरी को जीवन का सर्वोत्तम क्रिया-कलाप न बना सके। उनके ज्ञान के तक़ाज़े क़सीदों में ज़रूर पूरे होते हैं, जहां वह कठिन विषयों, विद्वतापूर्ण विचारों और भारी-भरकम क्रमों से क्सीदे की फ़ज़ा पैदा कर लेते थे। मसनवियों में भी अच्छी परिकल्पनाएं मिलती हैं और काव्य-सर्जन-शक्ति का पता चलता है, लेकिन यह कहना ग़लत न होगा कि उन्होंने शायरी को दरबारी दिलचस्पियों की चीज़ बना दिया। ….. अगर दरबार से सम्ब) न होते तो शायरी इस तरह पथहीन न होती।’’[xii]

इंशा’ के ज्ञान और विद्वता के शायर उर्दू में कम ही होंगे। उनके ज्ञानी और विद्वान होने का पता इससे चलता है कि उन्होंने एक छोटा-सा दीवान (काव्य-संग्रह) ऐसा लिखा है, जिसमें फ़ारसी लिपि का कोई बिन्दी वाला अक्षर प्रयोग में नहीं आया है और एक क़सीदा लिखा है, जो सात भाषाओं में है। उन्होंने कठिन से कठिन छन्दों तथा तुकान्तों में भी ग़ज़लें लिखीं हैं। नयी-नयी तरह की चीज़ें लिखना उनका प्रिय कार्य था। उनके ‘कुल्लियात’ में ग़ज़लों के अलावा मसनवियां, क़सीदे, क़तआत, मंज़ूमात इत्यादि मौजूद हैं। 

उर्दू के साहित्येतिहासकार डॉ॰ सैयद एहतिशाम हुसैन ने लिखा है

‘‘इंशा अल्लाह ख़ां के ‘कुल्लियात’ के अध्ययन से मालूम होता है कि दरबारी संस्कृति और हास्य (हंसोड़पन) ने उनकी शायरी की कई सतहें बना रखी थीं। गम्भीरता और विचार है, तो सतह ऊंची है, हंसोड़पन और छेड़-छाड़ है तो नीची।’’

स्त्रियों की बोलचाल की भाषा में कविता

अपने मित्र सआदत यार ख़ां ‘रंगीन’ के आविष्कार ‘रेख़्ती’ (स्त्रिायों की बोलचाल की भाषा में कविता) को उन्होंने न केवल शौक़ से अपनाया, बल्कि इतना विस्तार दिया और विकसित किया कि कुछ लोग भ्रमवश ‘रेख़्ती’ को ‘इंशा’ का ही आविष्कार समझने लगे।

यहां पाठकों की सेवा में ‘इंशा’ के कुछ मशहूर शेअर पेश हैं। इन्हें देखिए और विचार कीजिए कि वे काव्य-कला और भाव-पक्ष की दृष्टि से कितने उच्च स्तर के हैं

चालाक लोग अपनी चालाकी छिपाने और दुनिया को दिखावे के लिए लोगों की मदद करते हैं, उनपर मेहरबानी करते हैं। ऐसे लोगों की रूखी-सूखी मेहरबानी न लेने का साहस ‘इंशा’ ने दिखाया है। हांलाकि ऐसा बहुत कम लोग ही कर पाते हैं

ले के मैं ओढ़ूं बिछाऊं, लपेटूं क्या करूं,

रूखी-फीकी, सूखी-साखी मेहरबानी आपकी।

इंशा’ को ऐसे इन्सानों पर हंसी आती है, क्योंकि ग़लतियां तो इनसान ख़ुद करते हैं और शैतान के गले मढ़ते हैं, बुरे कर्म तो ख़ुद करते हैं और लानत शैतान पर भेजते हैं

क्या हंसी आती है मुझको हज़रते-इन्सान पर

फ़ेअले-बद ख़ुद ही करें लानत करें शैतान पर।

बुराई को भलाई से मिटाना इस्लामी कर्म है। यह कर्म ‘इंशा’ जैसे कुछ लोग ही कर पाते हैं

ख़याल कीजिए क्या आज काम मैंने किया

जब उनने दी मुझे गाली, सलाम मैंने किया।

बड़े शायर अपनी रचना में बड़ी कुशलता से लौकिक और पारलौकिक प्रेम दोनों को चित्रित कर देते हैं और इसका पता लगाना आम आदमी के बूते की बात नहीं होती कि इसमें लौकिक प्रेम का वर्णन हुआ है या पारलौकिक प्रेम का। ‘इंशा’ का ऐसा ही एक मर्मस्पर्शी शेअर देखिए

जो घड़ी याद में तिरी कट जाए

वो ही आठों पहर की पूंजी है।

प्रेम बड़ा बलशाली है। इससे ईश-सिंहासन भी हिल उठता है

धूम इतनी तिरे दीवाने मचा सकते हैं

कि अभी अर्श को चाहें तो हिला सकते हैं। 

प्रेम इन्सान को अमर बना देता है और प्रेम की आग में तपकर इन्सान कुन्दन बन जाता है। आशिक़ और मशूक़ (प्रेमी और प्रेमिका) एक हो जाते हैं, एक-दूसरे में विलीन। ‘इंशा’ इस तथ्य को इन शब्दों में अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं

ज़मीं से उट्ठी है या चर्ख़ पर से उतरी है

ये आग इश्क़ की या रब किधर से उतरी है।

इंशा’ कहते हैं कि अगर आपका प्रेम-भाव निश्छल और निर्मल है, तो आपके चाहने वाले प्रेम के कच्चे धगे में भी बन्धे चले आएंगे

जज़्बा-ए-इश्क़ सलामत है तो इंशा अल्लाह

कच्चे धगे से चले आएंगे सरकार बंधे

मौसम बहार का हो और कवि जब रोमांस के मूड में तो क्या कहने

लगी है मेंह की झड़ी बाग़ में चलो झूलें

कि झूलने का मज़ा अभी इस बहार में है।

अगर किसी का प्रियतम किसी पराये के हाथ से पान खाता है और पराये के साथ हंसी-ठट्ठा करता है तो स्वभावतः उसका ख़ून खौल उठता है, लेकिन लोक-लाज के डर से वह चुप रह जाता है, ख़ून का घूंट पीकर रह जाता है। प्रेमी की इस विवशता का अत्यन्त सजीव चित्रण ‘इंशा’ ने इस प्रकार किया है

पान जो हाथ से कल ग़ैर के तू ने खाया

पी के लहू को ग़रज़ घूंट रहे हम ज्यूं पीक।

हिन्दू देवी-देवताओं का रोमांकारी चित्रण भी ‘इंशा’ के काव्य में मिलता है। वे कहते हैं कि शिवा जी के गले से पार्वती जी के लिपटने की वजह से ब्रह्लोक में बसन्त की-सी छटा छा गई। उनके प्रेमालाप का रोमांचकारी चित्रण पाठकों के तन-मन को रोमांचित कर देता है

शिव के गले से पार्वती जी लिपट गयीं

क्या ही बहार आज है ब्रह्मा के रुण्ड पर।

श्याम सलोने श्रीकृष्ण की रूप-माधुरी का अत्यन्त चित्ताकर्षक वर्णन ‘इंशा’ ने इन शब्दों में किया है

सांवले तन पे ग़ज़ब धज है बसंती शाल की

जी में है कह बैठिए अब जय कन्हैया लाल की।

और राधा के कुण्ड पर बैठे महन्त का मनोहर चित्रण देखिए

ये जो महन्त बैठे हैं राधा के कुण्ड पर

अवतार बनके गिरते हैं परियों के झुण्ड पर।

 इस प्रकार हम देखते हैं कि ‘इंशा’ का काव्य व्यापक, बहुआयामी, रंग-बिरंगा और काव्य-कला से परिपूर्ण है। उनका काव्य तत्कालीन उत्तर भारतीय समाज और दरबारी संस्कृति का दर्पण है। ‘इंशा’ के काव्य में बहुत-सी ख़ूबियों के बावजूद कुछ ख़ामियां भी हैं।

इंशा’ की रचनाएं

(1) दीवाने-उर्दू, (2) दीवाने-फ़रसी, (3) उर्दू क़सीदे, (4) फ़ारसी व़फसीदे, (5) फ़ारसी की दो मसनवियां, जिनमें से एक बिन्दुरहित अक्षरों में लिखी गयी है और दूसरी (6) ‘शीर विरंज’, जिसमें सूफ़ी अध्यात्मवाद का मज़ाक़ उड़ाया गया है, (7) एक अरबी मसनवी का ‘मायतुल-अमल’ के नाम से फ़ारसी में अनुवाद, (8) उर्दू मसनवी ‘शिकारनामा’ (9) उर्दू मसनवी ‘शिकायते-ज़माना’, (10) दो मनोरंजक उर्दू मसनवियां जिनमें से एक में मुर्ग़ों की लड़ाई का वर्णन है और दूसरी में एक हाथी और हथिनी के विवाह का वि़फस्सा है, (11) निन्दात्मक मसनवियां जिनमें ‘मुसहफ़ी’ और दुकानदारों से लेकर गर्मी, बर्रों, खटमल, मच्छर, मक्खी आदि सभी को कोसा गया है, (12) रानी केतकी की कहानी, (13) दरिया-ए-लताफ़त, (14) ‘इंशा’ की तुर्की डायरी (15) सिल्वेफ-गुहर (16) दीवाने-रेख़्ती (17) और वुफल्लियाते-इंशा, (18) कलामे-इंशा इत्यादि।

इंशा’ की गद्य रचनाएं

इंशा’ ने गद्य में (1) ‘दरिया-ए-लताफ़त’ (फ़ारसी), (2) रानी केतकी कहानी’ (उर्दू/हिंदी), (3) सिल्वेफ-गुहर (उर्दू), (4) लताइप़ेफ-सआदत (फ़ारसी) और (5) तुर्की रोज़नामचा (डायरी) कुल पांच रचनाएं कीं।

सैयद एहतिशाम हुसैन ने ‘दरिया-ए-लताफ़त’ को ‘इंशा’ की सबसे महत्त्वपूर्ण रचना माना है । वे कहते हैं

‘‘‘इंशा’ की सर्वाध्कि महत्वपूर्ण रचना ‘दरिया-ए-लताफ़त’ है, जो भाषाविज्ञान और दूसरे महत्वपूर्ण साहित्यिक विषयों का एक ख़ज़ाना है। इसके अध्ययन से उस उर्दू भाषा का परिचय मिलता है, जो विभिन्न इलाफ़ों और वर्गों में विभिन्नि रूपों में प्रचलित थी। इसमें भाषा के दिलचस्प नमूने भी हैं ।’’[xiii]

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि बहुमुखी प्रतिभा के धनी और बहुभाषाविद इंशा अल्लाह ख़ां ‘इंशा’ अपने विलक्षण लेखन के द्वारा हिन्दी-उर्दू और फ़ारसी साहित्य के इतिहास में अमर हो गये । यदि वे केवल ‘रानी केतकी की कहानी’ ही लिखते और कुछ नहीं लिखते, तो यही एक कहानी उन्हें अमर बनाने के लिए पर्याप्त होती।

संदर्भ-ग्रंथ

[i] मुख़्तसर तारीख़े-अदब उर्दू, डॉ॰ सैयद एजाज़ हुसैन, संस्करण : दिसम्बर 1964 ई॰, पृ॰ 73, 74

[ii] उर्दू अदब की तंक़ीदी तारीख़, क़ौमी कोंसिल बराये फ़रोग़ उर्दू ज़बान, नई दल्लिी, तीसरा एडीशन, 1997 ई॰, पृ॰ 90

[iii] हिन्दी साहित्य का वस्तुनिष्ठ इतिहास, द्वितीय खण्ड, विश्वविद्यायल प्रकाशन, वाराणसी, द्वितीय संस्करण 2017 ई॰, पृ॰ 26

[iv] हिन्दी साहित्य का इतिहास, साहित्य अकादमी, नई दिल्ली, पुनमुद्रण 2916 ई॰, पृ॰ 185

[v] आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ॰ 396

[vi] आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास पृ॰ 284

[vii] आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ॰ 397

[viii] आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिन्दी साहित्य का इतिहास, पृ॰ 50

[ix] उर्दू भाषा और साहित्य, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, लखनऊ, तृतीय संस्करण : 2004 ई॰, पृ॰ 57

[x] मुख़्तसर तारीख़े-अदब उर्दू, संस्करण : दिसम्बर 1964 ई॰, पृ॰ 73

[xi] मुख़्तसर तारीख़े-अदब उर्दू, डॉ॰ सैयद एजाज़ हुसैन, संस्करण: दिसम्बर 1964 ई॰, पृ॰ 73

[xii] तारीख़े-अदब उर्दू, संस्करण : दिसम्बर 1964 ई॰, पृ॰ 73

[xiii] उर्दू अदब की तंक़ीदी तारीख़, सैयद एहतिसाम हुसैन, क़ौमी कोंसिल बराये फ़रोग़ उर्दू ज़बान, नई दिल्ली, तीसरा एडीशन, 1997 ई॰, पृ॰ 90, 91