#सुमित्रनंदन पंत (1900-1977 ई.) की लम्बी कविता : #परिवर्तन (NTA/UGCNET/JRF के नए सिलेबस में सम्मिलित)

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#सुमित्रनंदन पंत (1900-1977 ई.) की लम्बी कविता : #परिवर्तन (NTA/UGCNET/JRF के नए सिलेबस में सम्मिलित)

#रोला छन्द में रचित सुमित्रानंदनपंत की कविता #परिवर्तन‘ (अप्रैल, 1924 ई.) एक लम्बी कविता है। यह कविता उनके #तीसरे काव्य-संग्रह ‘#पल्लव‘ (1928 ई.) में संकलित है। पल्लवकी भूमिका को समीक्षकों ने #छायादाद का घोषणापत्रकहा है।

कविवर सुमित्रानंदन पंत का #जन्म 20 मई 1900 को कौसानीउत्तराखण्ड में और मृत्यु #28 दिसंबर1977 ई. प्रयाग उत्तर प्रदेश (भारत) में।

परिवर्तन

(1)

#कहां आज वह पूर्ण-पुरातन, वह सुवर्ण का काल?

भूतियों का दिगंत-छबि-जाल,

ज्योति-चुम्बित जगती का भाल?

राशि राशि विकसित वसुधा का वह यौवन-विस्तार?

स्वर्ग की सुषमा जब साभार

#धरा पर करती थी अभिसार!

प्रसूनों के शाश्वत-शृंगार,

(स्वर्ण-भृंगों के गंध-विहार)

#गूंज उठते थे बारंबार,

सृष्टि के प्रथमोद्गार!

नग्न-सुंदरता थी सुकुमार,

ॠद्धि औ‘  सिद्धि अपार !

#अये, विश्व का स्वर्ण-स्वप्न, संसृति का प्रथम प्रभात,

कहाँ वह सत्य, वेद-विख्यात?

दुरित, दु:ख-दैन्य न थे जब ज्ञात,

अपरिचित जरा-मरण भ्रू-पात!

(2)

हाय ! सब मिथ्या बात !—

आज तो सौरभ का मधुमास

शिशिर में भरता सूनी साँस !

वही मधुऋतु की गुंजित डाल

झुकी थी जो यौवन के भार,

अकिंचनता में निज तत्काल

सिहर उठती, —जीवन है भार !

आज पावस नद के उद्गार

काल के बनते चिह्न कराल

प्रात का सोने का संसार;

जला देती संध्या की ज्वाल ।

#अखिल यौवन के रंग उभार

हड्डियों के हिलते कंकाल;

कचों के चिकने, काले व्याल

केंचुली, कांस, सिवार;

गूँजते हैं सबके दिन चार,

सभी फिर हाहाकार !

(3)

आज बचपन का कोमल गात

जरा का पीला पात !

#चार दिन सुखद चाँदनी राल

और फिर अन्धकार, अज्ञात !

शिशिर-सा झर नयनों का नीर

झुलस देता गालों के फूल,

प्रणय का चुम्बन छोड़ अधीर

अधर जाते अधरों को भूल !

#मृदुल होंठों का हिमजल हास

उड़ा जाता नि:श्वास समीर,

सरल भौंहों का शरदाकाश

घेर लेते घन, घिर गम्भीर !

शून्य सांसों का विधुर वियोग

छुड़ाता अधर मधुर संयोग;

#मिलन के पल केवल दो, चार,

विरह के कल्प अपार !

अरे, ये अपलक चार-नयन

आठ-आँसू रोते निरुपाय;

उठे-रोओँ के आलिंगन

कसक उठते काँटों-से हाय !

(4)

#किसी को सोने के सुख-साज

मिल गये यदि ॠण भी कुछ आज,

चुका लेता दुख कल ही व्याज,

काल को नहीं किसी की लाज !

विपुल मणि-रत्नों का छबि-जाल,

इन्द्रधनु की-सी छटा विशाल—

विभव की विद्युत्-ज्वाल

चमक, छिप जाती है तत्काल;

#मोतियों-जड़ी ओस की डार

हिला जाता चुपचाप बयार !

(5)

खोलता इधर जन्म लोचन,

मूँदती उधर मृत्यु क्षण, क्षण;

अभी उत्सव औहास-हुलास,

अभी अवसाद, अश्रु, उच्छ्वास !

अचिरता देख जगत की आप

शून्य भरता समीर नि:श्वास,

डालता पातों पर चुपचाप,

#ओस के आँसू नीलाकाश;

सिसक उठता समुद्र का मन

सिहर उठते उडगन !

(7)

#अहे निष्ठुर परिवर्तन!

तुम्हारा ही तांडव नर्तन

विश्व का करुण विवर्तन!

तुम्हारा ही नयनोन्मीलन,

निखिल उत्थान, पतन!

अहे वासुकि सहस्र फन!

लक्ष्य अलक्षित चरण तुम्हारे चिह्न निरंतर

छोड़ रहे हैं जग के विक्षत वक्षस्थल पर !

शत-शत फेनोच्छ्वासित,स्फीत फुतकार भयंकर

घुमा रहे हैं घनाकार जगती का अंबर !

#मृत्यु तुम्हारा गरल दंत, कंचुक कल्पान्तर,

अखिल विश्व की विवर,

वक्र कुंडल

दिग्मंडल !

(7)

अहे दुर्जेय विश्वजित !

नवाते शत सुरवर नरनाथ

तुम्हारे इन्द्रासन तल माथ;

घूमते शत-शत भाग्य अनाथ,

सतत रथ के चक्रों के साथ !

तुम नृशंस से जगती पर चढ़ अनियंत्रित ,

करते हो संसृति को उत्पीड़न, पद-मर्दित ,

नग्न नगर कर, भग्न भवन, प्रतिमाएँ खंडित

हर लेते हो विभव, कला, कौशल चिर संचित !

आधि, व्याधि, बहुवृष्टि, वात, उत्पात, अमंगल

वह्नि, बाढ़, भूकम्प, —तुम्हारे विपुल सैन्य दल;

अहे निरंकुश ! पदाघात से जिनके विह्वल

हिल-हिल उठता है टल-मल

पद-दलित धरातल !

(8)

जगत का अविरत हृतकंपन

तुम्हारा ही भय —सूचन ;

निखिल पलकों का मौन पतन

तुम्हारा ही आमंत्रण !

विपुल वासना विकच विश्व का मानस-शतदल

छान रहे तुम, कुटिल काल-कृमि-से घुस पल-पल;

तुम्हीं स्वेद-सिंचित संसृति के स्वर्ण-शस्य-दल

दलमल देते, वर्षोपल बन, वांछित कृषिफल !

#अये, सतत ध्वनि स्पंदित जगती का दिग्मंडल

नैश गगन-सा सकल

तुम्हारा ही समाधिस्थल !

(9)

#काल का अकरुण मृकुटि विलास

तुम्हारा ही परिहास;

विश्व का अश्रु-पूर्ण इतिहास

तुम्हारा ही इतिहास ।

एक कठोर कटाक्ष तुम्हारा अखिल प्रलयकर

समर छेड़ देता निसर्ग संसृति में निर्भर;

भूमि चूम जाते अभ्र ध्वज सौध, श्रृंगवर,

नष्ट-भ्रष्ट साम्राज्य–भूति के मेघाडंबर !

अये, एक रोमांच तुम्हारा दिग्भू कंपन,

गिर-गिर पड़ते भीत पक्षि पोतों-से उडुगन;

आलोड़ित अंबुधि फेनोन्नत कर शत-शत फन,

मुग्ध भूजंगम-सा, इंगित पर करता नर्तन ।

दिक् पिंजर में बद्ध, गजाधिप-सा विनतानन,

वाताहत हो गगन

आर्त करता गुरु गर्जन ।

(10)

जगत की शत कातर चीत्कार

बेधतीं बधिर, तुम्हारे कान !

अश्रु स्रोतों की अगणित धार

सींचतीं उर पाषाण !

अरे क्षण-क्षण सौ-सौ नि:श्वास

छा रहे जगती का आकाश !

चतुर्दिक् घहर-घहर आक्रांति ।

ग्रस्त करती सुख-शांति !

(11)

#हाय री दुर्बल भ्रांति !—

कहाँ नश्वर जगती में शांति ?

सृष्टि ही का तात्पर्य अशांति !

जगत अविरत जीवन संग्राम,

स्वप्न है यहाँ विराम !

एक सौ वर्ष, नगर उपवन,

एक सौ वर्ष, विजन वन !

—#यही तो है असार संसार,

सृजन, सिंचन, संहार !

आज गर्वोन्नत हर्म्य अपार,

रत्न दीपावलि, मंत्रोच्चार;

उलूकों के कल भग्न विहार,

झिल्लियों की झनकार !

#दिवस निशि का यह विश्व विशाल

मेघ मारुत का माया जाल !

(12)

अरे, देखो इस पार—

दिवस की आभा में साकार

दिगंबर, सहम रहा संसार !

हाय, जग के करतार !

प्रात ही तो कहलाई मात,

#पयोधर बने उरोज उदार,

मधुर उर इच्छा को अज्ञात

प्रथम ही मिला मृदुल आकार;

छिन गया हाय, गोद का बाल,

गड़ी है बिना बाल की नाल !

अभी तो मुकुट बँधा था माँथ,

हुए कल ही हलदी के हाथ;

खुले भी न थे लाज के बोल,

खिले भी चुंबन शून्य कपोल:

हाय ! रुक गया यहीं संसार

बना सिंदूर अंगार !

वात हत लतिका यह सुकुमार

पड़ी है छिन्नाधार !!

(13)

कांपता उधर दैन्य निरुपाय,

रज्जु-सा, छिद्रों का कृश काय !

न उर में गृह का तनिक दुलार,

उदर ही में दानों का भार !

#भूँकता सिड़ी शिशिर का श्वान

चीरता हरे ! अचीर शरीर;

न अधरों में स्वर, तन में प्राण,

न नयनों ही में नीर !

(14)

सकल रोओं से हाथ पसार

लूटता इधर लोभ गृह द्वार;

उधर वामन डग स्वेच्छाचार

नापता जगती का विस्तार !

#टिड्डियों-सा छा अत्याचार

चाट जाता संसार !

(15)

#बजा लोहे के दंत कठोर

नचाती हिंसा जिह्वा लोल;

भृकुटि के कुंडल वक्र मारोर

फुहुँकता अंध रोष खोल !

#लालची गीधों-से दिन-रात

नोचते रोग शोक नित गात

अस्थि-पंजर का दैत्य दुकाल,

निगल जाता निज बाल !

(16)

#बहा नर शोणित मूसलाधार,

रुंड मुंडो की कर बौछार,

प्रलय घन-सा घिर भीमाकार

गरजता है दिगंत संहार !

छेड़ कर शस्त्रों की झंकार

महाभारत गाता संसार !

#कोटि मनुजों के, निहत अकाल,

नयन मणेयों से जटित कराल

अरे, दिग्गज सिंहासन जाल

अखिल मृत देशों के कंकाल;

मोतियों के तारक लड़ हार

आंसुओं के श्रृंगार !

(17)

#रुधिर के हैं जगती के प्रात,

चितानल के ये सायंकाल;

शून्य निःश्वासों के आकाश,

आंसुओं के ये सिंधु विशाल;

यहां सुख सरसों, शोक सुमेरु,

अरे जग है जग का कंकाल ! !

वृथा ये अरण्य चीत्कार,

शांति सुख है उस पार !

(18)

आह भीषण उद्गार !

नित्य का यह अनित्य नर्तन

विवर्तन जग, जग व्यावर्तन,

अचिर में चिर का अन्वेषण

विश्व का तत्वपूर्ण दर्शन !

अतल से एक अकूल उमंग,

सृष्टि की उठती तरल तरंग,

उमड़ शत-शत बुदबुद संसार

बूड़ जाते निस्सार !

बना सैकत के तट अतिवात

गिरा देती अज्ञात !

(19)

एक के असंख्य उडुगण,

एक ही सब में स्पंदन;

एक छवि के विभास में लीन,

एक विधि के आधीन !

एक ही लोल लहर के छोर

#उभय सुख-दुख, निशि भोर;

इन्हीं से पूर्ण त्रिगुण संसार,  

सृजन ही है, संहार !

मूँदती नयन मृत्यु की रात

खोलती नवजीवन की प्रात,

शिशिर की सर्व प्रलयकर बात

बीज बोती अज्ञात !

म्लान कुसुमों की मृदु मुस्कान

फलों में फलती फिर अम्लान,

#महत् है, अरे, आत्म-बलिदान,

जगत् केवल आदान-प्रदान !

(20)

एक ही तो असीम उल्लास

विश्व में पाता विविधाभास;

तरल जलनिधि में हरित विलास,

शांत अंबर में नील विकास;

#वही उर उर में प्रेमोच्छोवास,

काव्य में रस, कुसुमों में वास;

अचल तारक पलकों में हास,

लोल लहरों में लास !

विविध द्रव्यों में विविध प्रकार

                          एक ही मर्म मधुर झंकार !

 (21)

#वही प्रज्ञा का सत्य स्वरूप

हृदय में बनता प्रणय अपार;

लोचनों में लावण्य अनूप,

लोक सेवा में शिव अविकार;

स्वरों में ध्वनित मधुर, सुकुमार

सत्य ही प्रेमोद्गार;

दिव्य सौंदर्य स्नेह साकार,

                   भावनामय संसार !

(22)

#स्वीय कर्मों के ही अनुसार

एक गुण फलता विविध प्रकार;

कहीं राखी बनता सुकुमार,

कहीं बेड़ी का भार !

(23)

कामनाओं के विविध प्रहार

छेड़ जगती के उर के तार,

जगाते जीवन की झंकार

स्फूर्ति करते संचार;

चूम सुख-दुख के पुलिन अपार

छलकती ज्ञानामृत की धार !

पिघल होठों का हिलता, हास

दृगों को देता जीवन दान,

#वेदना ही में तपकर प्राण

दमक, दिखलाते स्वर्ण हुलास !

तरसते हैं हम आठोंयाम,

इसी से सुख अति सरस, प्रकाम;

#झेलते निशि दिन का संग्राम,

इसी से जय अभिराम;

अलग है इष्ट, अतः अनमोल,

साधना ही जीवन का मोल !

(24)

#बिना दुख के सब सुख निस्सार,

बिना आँसू के जीवन भार;

दीन दुर्बल है रे संसार,

इसी से दयाक्षमा औ‘ प्यार !

(25)

#आज का दुखकल का आह्लाद,

और कल का सुखआज विषाद;

समस्या स्वप्न गूढ़ संसार,

पूर्ति जिसकी उसपार

जगत जीवन का अर्थ विकास,

मृत्युगति क्रम का ह्रास !

(26)

हमारे काम न अपने काम,

नहीं हमजो हम ज्ञात;

अरेनिज छाया में उपनाम

छिपे हैं हम अपरूप;

गंवाने आए हैं अज्ञात

गंवाकर पाते स्वीय स्वरूप !

(27)

#जगत की सुंदरता का चाँद

सजा लांछन को भी अवदात,

सुहाता बदलबदलदिनरात,

नवलता हो जग का आह्लाद !

(28)

#स्वर्ण शैशव स्वप्नों का जाल,

मंजरित यौवनसरस रसाल;

प्रौढ़ताछाया वट सुविशाल,

स्थविरतानीरव सायंकाल;

वही विस्मय का शिशु नादान

रूप पर मँडराबन गुंजार,

प्रणय से बिंधबँधचुन-चुन सार,

मधुर जीवन का मधु कर पान;

एक बचपन ही में अनजान

जागतेसोतेहम दिनरात;

वृद्ध बालक फिर एक प्रभात

देखता नव्य स्वप्न अज्ञात;

मूंद प्राचीन मरण,

खोल नूतन जीवन ।

(29)

#विश्वमय हे परिवर्तन !

अतल से उमड़ अकूलअपार

मेघ-से विपुलाकार,

दिशावधि में पल विविध प्रकार

अतल में मिलते तुम अविकार ।

#अहे अनिर्वचनीय ! रूप पर भव्यभयंकर,

इंद्रजाल सा तुम अनंत में रचते सुंदर;

गरज गरजहँस हँसचढ़ गिरछा ढा भू अंबर,

करते जगती को अजस्र जीवन से उर्वर;

अखिल विश्व की आशाओं का इंद्रचाप वर

अहे तुम्हारी भीम मृकुटि पर

अटका निर्भर !

(30)

एक औ‘ बहु के बीच अजान

घूमते तुम नित चक्र समान,

जगत के उर में छोड़ महान

गहन चिह्नों में ज्ञान ।

#परिवर्तित कर अगणित नूतन दृश्य निरंतर,

अभिनय करते विश्व मंच पर तुम मायाकर !

जहाँ हास के अधरअश्रु के नयन करुणतर

पाठ सीखते संकेतों में प्रकटअगोचर;

शिक्षास्थल यह विश्व मंचतुम नायक नटवर,

प्रकृति नर्त्तकी सुघर

अखिल में व्याप्त सूत्रधर !

( 31)

हमारे निज सुखदुखनि:श्वास

तूम्हें केवल परिहास;

#तुम्हारी ही विधि पर विश्वास

हमारा चिर आश्वास !

ऐ अनंत हृत्कंप ! तुम्हारा अविरत स्पंदन

सृष्टि शिराओं में संचारित करता जीवन,

खोल जगत के शत- शत नक्षत्रों-से लोचन,

भेदन करते अंधकार तुम जग का क्षण-क्षण;

सत्य तुम्हारी राज यष्टिसम्मुख नत त्रिभुवन,

भूपअकिंचन,

अटल शास्ति नित करते पालन !

(32)

#तुम्हारा ही अशेष व्यापार,

हमारा भ्रममिथ्याहंकार;

तुम्हीं में निराकार साकार,

मृत्यु जीवन सब एकाकार !

अहे महांबुधि ! लहरों-से शत लोकचराचर,

क्रीड़ा करते सतत तुम्हारे स्फीत वक्ष पर;

#तुंग तरंगों से शत युगशत-शत कल्पांतर

उगलमहोदर में विलीन करते तुम सत्वर;

शत सहस्र रवि शशिअसंख्य ग्रहउपग्रहउडुगण,

जलते बुझते हैं स्फुलिंग-से तुममें तत्क्षण;

#अरे विश्व में अखिलदिशावधिकर्म वचनमन,

तुम्हीं चिरंतन

अहे विवर्तन हीन विवर्तन !

                 (अप्रैल, 1924 ई.)