हृदयराम (Hridayram : the Hindi poet): आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

हृदयराम (Hridayram : the Hindi poet): आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में  

ये पंजाब के रहनेवाले और कृष्णदास के पुत्र थे। इन्होंने संवत् 1680 में संस्कृत के हनुमन्नाटक के आधार पर भाषा हनुमन्नाटक लिखा जिसकी कविता बड़ी सुंदर और परिमार्जित है। इसमें अधिकतर कवित्त और सवैयों में बड़े अच्छे संवाद हैं। पहले कहा जा चुका है कि गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने समय की सारी प्रचलित काव्य पद्धतियों पर रामचरित का गान किया। केवल रूपक या नाटक के ढंग पर उन्होंने कोई रचना नहीं की। गोस्वामी जी के समय से ही उनकी ख्याति के साथ साथ रामभक्ति की तरंगें भी देश के भिन्न भिन्न भागों में उठ चली थीं। अत: उस काल के भीतर ही नाटक के रूप में कई रचनाएँ हुईं जिनमें सबसे अधिक प्रसिद्ध हृदयराम का हनुमन्नाटक हुआ।

नीचे कुछ उदाहरण दिए जाते हैं :

देखन जौ पाऊँ तौ पठाऊँ जमलोक, हाथ

दूजो न लगाऊँ, वार करौं एक करको।

मीजि मारौं उर ते उखारि भुजदंड, हाड़,

तोरि डारौं बर अवलोकि रघुबर को

कासों राग द्विज को, रिसात भहरात राम,

अति थहरात गात लागत है धार को।

सीता को संताप मेटि प्रगट प्रताप कीनों,

को है वह आप चाप तोरयो जिन हर को।

 

जानकी को मुख न बिलोक्यों ताते कुंडल,

न जानत हौं, वीर पायँ छुवै रघुराई के।

हाथ जो निहारे नैन फूटियो हमारे,

ताते कंकन न देखे, बोल कह्यो सतभाइ के

पाँयन के परिबे कौ जाते दास लछमन

यातें पहिचानत है भूषन जे पायँ के।

बिछुआ है एई, अरु झाँझर हैं एई जुग।

नूपुर हैं, तेई राम जानत जराइ के।

 

सातों सिंधु, सातों लोक, सातों रिषि हैं ससोक,

सातों रबि घोरे, थोरे देखे न डरात मैं।

सातों दीप, सातों ईति काँप्यई करत और

सातों मत रात दिन प्रान हैं न गात मैं

सातों चिरजीव बरराइ उठैं बार बार,

सातों सुर हाय हाय होत दिन रात मैं।

सातहूँ पताल काल सबद कराल, राम

भेदे सात ताल, चाल परी सात सात मैं

 

एहो हनू! कह्यौ श्री रघुबीर कछू सुधि है सिय की छिति माँही?

है प्रभु लंक कलंक बिना सुबसै तहँ रावन बाग की छाँहीं

जीवति है? कहिबेई को नाथ, सु क्यों न मरी हमतें बिछुराहीं।

प्रान बसै पद पंकज में जम आवत है पर पावत नाहीं।

रामभक्ति का एक अंग आदि रामभक्त हनुमान जी की उपासना भी हुई। स्वामी रामानंद जी कृत हनुमान जी की स्तुति का उल्लेख हो चुका है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने हनुमान की वंदना बहुत स्थलों पर की है। हनुमानबाहुकतो केवल हनुमान जी को ही संबोधन करके लिखा गया है। भक्ति के लिए किसी पहुँचे हुए भक्त का प्रसाद भी भक्तिमार्ग में अपेक्षित होता है। संवत् 1696 में रायमल्ल पांडे ने हनुमच्चरित्रलिखा था। गोस्वामी जी के पीछे भी कई लोगों ने रामायणें लिखीं, पर वे गोस्वामी जी की रचनाओं के सामने प्रसिद्धि न प्राप्त कर सकीं। ऐसा जान पड़ता है कि गोस्वामी जी की प्रतिभा का प्रखर प्रकाश डेढ़ सौ वर्ष तक ऐसा छाया रहा कि रामभक्ति की और रचनाएँ उसके सामने ठहर न सकीं। विक्रम की 19वीं और 20वीं शताब्दी में अयोध्या के महंत बाबा रामचरणदास, बाबा रघुनाथदास, रीवाँ के महाराज रघुराज सिंह आदि ने रामचरित संबंधी विस्तृत रचनाएँ कीं जो सर्वप्रिय हुईं। इस काल में रामभक्ति विषयक कविता बहुत कुछ हुई।

रामभक्ति की काव्यधारा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसमें सब प्रकार की रचनाएँ हुईं, उसके द्वारा कई प्रकार की रचना पद्धतियों को उत्तेजना मिली। कृष्णोपासी कवियों ने मुक्तक के एक विशेष अंग गीतकाव्य की ही पूर्ति की, पर रामचरित को लेकर अच्छे अच्छे प्रबंधकाव्य रचे गए।

तुलसीदास जी के प्रसंग में यह दिखाया जा चुका है कि रामभक्ति में भक्ति का पूर्ण स्वरूप विकसित हुआ है। प्रेम और श्रद्धा अर्थात् पूज्य बुद्धि दोनों के मेल से भक्ति की निष्पत्ति होती है। श्रद्धा धर्म की अनुगामिनी है। जहाँ धर्म का स्फुरण दिखाई पड़ता है वहीं श्रद्धा टिकती है। धर्म ब्रह्म के सत्स्वरूप की व्यक्त प्रवृत्ति है, उस स्वरूप की क्रियात्मक अभिव्यक्ति है, जिसका आभास अखिल विश्व की स्थिति में मिलता है। पूर्ण भक्त व्यक्त जगत् के बीच सत् की इस सर्वशक्तिमयी प्रवृत्ति के उदय का, धर्म की इस मंगलमयी ज्योति के स्फुरण का साक्षात्कार चाहता रहता है। इसी ज्योति के प्रकाश में सत् के अनंत रूप सौंदर्य की भी मनोहर झाँकी उसे मिलती है। लोक में जब कभी वह धर्म के स्वरूप को तिरोहित या आच्छादित देखता है तब मानो भगवान उसकी दृष्टि से उसकी खुली हुई आंखों के सामने से ओझल हो जाते हैं और वह वियोग की आकुलता का अनुभव करता है। फिर जब अधर्म का अंधकार फाड़कर धर्मज्योति अमोघ शक्ति के साथ साथ फूट पड़ती है तब मानो उसके प्रिय भगवान का मनोहर रूप सामने आ जाता और वह पुलकित हो उठता हैभीतर का चित्तजब बाहर सत्का साक्षात्कार कर पाता है तब आनंदका आविर्भाव होता है और सदानंदकी अनुभूति होती है।

यह है उस सगुण भक्तिमार्ग का पक्ष जो भगवान के अवतार को लेकर चलता है और जिसका पूर्ण विकास तुलसी की रामभक्ति में पाया जाता है। विनयपत्रिकामें गोस्वामी जी ने लोक में फैले अधर्म, अनाचार, अत्याचार आदि का भीषण चित्र खींचकर भगवान से अपना सत् स्वरूप, धर्म संस्थापक स्वरूप व्यक्त करने की प्रार्थना की है। उन्हें दृढ़ विश्वास है कि धर्मस्वरूप भगवान की कला का कभी न कभी दर्शन होगा। अत: वे यह भावना करके पुलकित हो जाते हैं कि सत्स्वरूप का लोकव्यक्त प्रकाश हो गया, रामराज्य प्रतिष्ठित हो गया और चारों ओर फिर मंगल छा गया :

रामराज भयो काज सगुन सुभ, राजा राम जगत विजई है

समरथ बड़ो सुजान सुसाहब, सुकृत सेन हारत जितई है।

जो भक्तिमार्ग श्रद्धा के अवयव को छोड़कर केवल प्रेम को ही लेकर चलेगा, धर्म से उसका लगाव न रह जायगा। वह एक प्रकार से अधूरा रहेगा। श्रृंगारोपासना, माधुर्य भाव आदि की ओर उसका झुकाव होता जायगा और धीरे धीरे उसमें ‘गुह्य, रहस्य’ आदि का भी समावेश होगा। परिणाम यह होगा कि भक्ति के बहाने विलासिता और इंद्रियासक्ति की स्थापना होगी। कृष्णभक्ति शाखा कृष्ण भगवान के धर्मस्वरूप को लोकरक्षक और लोकरंजक स्वरूप को छोड़कर केवल मधुर स्वरूप और प्रेमलक्षणा भक्ति की सामग्री लेकर चली। इससे धर्म सौंदर्य के आकर्षण से वह दूर पड़ गई। तुलसीदास जी ने भक्ति को अपने पूर्ण रूप में, श्रद्धा प्रेम समन्वित रूप में, सबके सामने रखा और धर्म या सदाचार को उसका नित्यलक्षण निर्धारित किया।

अत्यंत खेद की बात है कि इधर कुछ दिनों से एक दल इस रामभक्ति को भी श्रृंगारी भावनाओं में लपेटकर विकृत करने में जुट गया है। तुलसीदास जी के प्रसंग में हम दिखा आए हैं कि कृष्णभक्त सूरदास जी की श्रृंगारी रचना का कुछ अनुकरण गोस्वामी जी की ‘गीतावली’ के उत्तरकांड में दिखाई पड़ता है पर वह केवल आनंदोत्सव तक रह गया है। इधर आकर कृष्णभक्ति शाखा का प्रभाव बहुत बढ़ा। विषयवासना की ओर मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति के कारण कुछ दिनों से रामभक्ति मार्ग के भीतर भी श्रृंगारी भावना का अनर्गल प्रवेश हो रहा है। इस श्रृंगारी भावना के प्रवर्तक थे रामचरितमानस के प्रसिद्ध टीकाकार जानकीघाट (अयोध्या) के रामचरणदास जी, जिन्होंने पति पत्नी भाव की उपासना चलाई। इन्होंने अपनी शाखा का नाम स्वसुखी शाखारखा। स्त्रीवेष धारण करके पति लाल साहब‘ (यह खिताब राम को दिया गया है) से मिलने के लिए सोलह श्रृंगार करना, सीता की भावना सपत्नी रूप में करना आदि इस शाखा के लक्षण हुए। रामचरणदास जी ने अपने मत की पुष्टि के लिए अनेक नवीन कल्पित ग्रंथ प्राचीन बताकर अपनी शाखा में फैलाए, जैसे लोमशसंहिता, हनुमत्संहिता, अमर रामायण, भुशुंडि रामायण, महारामायण (5 अध्याय), कोशलखंड, रामनवरत्न, महारासोत्सव सटीक (संवत् 1904 में प्रिंटिंग प्रेस, लखनऊ में छपा)।

‘कोशलखंड’ में राम की रासलीला, विहार आदि के अश्लील वृत्त कल्पित किए गए हैं और कहा गया है कि रासलीला तो वास्तव में राम ने की थी। रामावतार में 99 रास वे कर चुके थे। एक ही शेष था जिसके लिए उन्हें फिर कृष्ण रूप में अवतार लेना पड़ा। इस प्रकार विलास क्रीड़ा में कृष्ण से कहीं अधिक राम को बढ़ाने की होड़ लगाई गई। गोलोक में जो नित्य रासलीला होती रहती है उससे कहीं बढ़कर साकेत में हुआ करती है। वहाँ की नर्तकियों की नामावली में रंभा, उर्वशी आदि के साथ साथ राधा और चंद्रावली भी गिना दी गई हैं।

रामचरणदास की इस श्रृंगारी उपासना में चिरान छपरा के जीवाराम जी ने थोड़ा हेरफेर किया। उन्होंने पति पत्नी भावना के स्थान पर सखीभावरखा और अपनी शाखा का नाम तत्सुखी शाखा रखा। इसी सखीभावकी उपासना का खूब प्रचार लक्ष्मण किला (अयोध्या) वाले युगलानन्यशरण ने किया। रीवाँ के महाराज रघुराजसिंह इन्हें बहुत मानते थे और इन्हीं की सम्मति से उन्होंने चित्रकूट में ‘प्रमोदवन’ आदि कई स्थान बनवाए। चित्रकूट की भावना वृंदावन के रूप में की गई और वहाँ के कुंज भी ब्रज के से क्रीड़ाकुंज माने गए । इस रसिक पंथ का आजकल अयोध्या में बहुत ज़ोर है और वहाँ के बहुत से मंदिरों में अब राम की तिरछी चितवनऔर बाँकी अदाके गीत गाए जाने लगे हैं। इस पंथ के लोगों का उत्सव प्रति वर्ष चैत्र कृष्ण नवमी को वहाँ होता है। ये लोग सीताराम को ‘युगलसरकार’ कहा करते हैं और अपना आचार्य ‘कृपानिवास’ नामक एक कल्पित व्यक्ति को बतलाते हैं जिसके नाम पर एक ‘कृपानिवास पदावली’ संवत् 1901 में छपी (प्रिंटिंग प्रेस लखनऊ)। इसमें अनेक अश्लील पद हैं, जैसे :

  1. नीबी करषत बरजति प्यारी।

रसलंपट संपुट कर जोरत, पद परसत पुनि लै बलिहारी (पृ. 138)

  1. पिय हँसि रस रस कंचुकि खोलैं।

चमकि निवारति पानि लाड़िली, मुरक मुरक मुख बोलैं।

ऐसी ही एक और पुस्तक ‘श्रीरामावतार भजन तरंगिणी’ इन लोगों की ओर से निकली है, जिसका एक भजन देखिए :

हमरे पिय ठाढ़े सरजू तीर।

छोड़ि लाज मैं जाय मिली जहँ खड़े लखन के वीर।

मृदु मुसकाय पकरि कर मेरो खैंचि लियो तब चीर।

झाऊ वृक्ष की झाड़ी भीतर करन लगे रति धीर।

भगवान राम के दिव्य पुनीत चरित्र के कितने घोर पतन की कल्पना इन लोगों के द्वारा हुई है। यह दिखाने के लिए इतना बहुत है। लोकपावन आदर्श का ऐसा ही बीभत्स विपर्यय देखकर चित्त क्षुब्ध हो जाता है। रामभक्ति शाखा के साहित्य का अनुसंधान करने वालों को सावधान करने के लिए ही इस ‘रसिक शाखा’ का यह थोड़ा सा विवरण दे दिया गया है। ‘गुह्य’, ‘रहस्य’, ‘माधुर्य भाव’ इत्यादि के समावेश से किसी भक्तिमार्ग की यही दशा होती है। गोस्वामी जी ने शुद्ध, सात्विक और खुले रूप में जिस रामभक्ति का प्रकाश फैलाया था, वह इस प्रकार विकृत की जा रही है।

प्रश्नोत्तरी-42 (हिंदी भाषा एवं साहित्य, हृदयराम)

#हृदयराम के संबंध में निम्नलिखित में कौन-कौन से कथन सत्य हैं :

(A) हृदयराम ने संवत् 1680 में संस्कृत के ‘हनुमन्नाटक’ के आधार पर भाषा ‘हनुमन्नाटक’ लिखा जिसकी कविता बड़ी सुंदर और परिमार्जित है।

(B) हिततरंगिणी का निर्माण बिहारी सतसई से पहले हुआ है।

(C) सबसे अधिक प्रसिद्ध हृदयराम का ‘हनुमन्नाटक’ हुआ।

(D) ‘‘बिछुआ है एई, अरु झाँझर हैं एई जुग।

नूपुर हैं, तेई राम जानत जराइ के।’’ इन काव्य-पंक्तियों के रचनाकार हृदयराम हैं।

(A)(a)(b)(c)

(B)(b)(c)(d)

(C)(a)(c)(d)

(D)(a)(b)(d)

Ans. : (C)(a)(c)(d)

#हृदयराम के संबंध में निम्नलिखित में कौन-कौन से कथन सत्य हैं :

(A) हृदयराम ने संवत् 1598 में रसरीति पर हिततरंगिणीनामक ग्रंथ दोहों में बनाया। रीति या लक्षण ग्रंथों में यह बहुत पुराना है।

(B) हृदयराम के ‘हनुमन्नाटक’ में अधिकतर कवित्त और सवैयों में बड़े अच्छे संवाद हैं।

(C) ‘दशम स्कंध भाषा’ का अनुवाद फ़ारसी भाषा में हुआ है।

(D) ‘‘जीवति है? कहिबेई को नाथ, सु क्यों न मरी हमतें बिछुराहीं।

प्रान बसै पद पंकज में जम आवत है पर पावत नाहीं।’’ इन काव्य-पंक्तियों के रचनाकार हृदयराम हैं।

(A)(a)(b)

(B)(b)(d)

(C)(a)(c)

(D)(a)(d)

Ans. : (B)(b)(d)

#‘‘गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने समय की सारी प्रचलित काव्य पद्धतियों पर रामचरित का गान किया। था।’’ इस पंक्ति के रचनाकार कौन हैं?

  • महावीर प्रसाद द्विवेदी
  • रामचंद्र शुक्ल
  • रामकुमर वर्मा
  • हज़ारीप्रसाद द्विवेदी

Ans. : (2) रामचंद्र शुक्ल

#‘‘गोस्वामी तुलसीदास जी ने शुद्ध, सात्विक और खुले रूप में रामभक्ति का प्रकाश फैलाया था।’’ इस पंक्ति के रचनाकार कौन हैं?

  • महावीर प्रसाद द्विवेदी
  • हज़ारीप्रसाद द्विवेदी
  • रामकुमर वर्मा
  • रामचंद्र शुक्ल

Ans. : (4) रामचंद्र शुक्ल

#‘‘गोस्वामी जी के समय से ही उनकी ख्याति के साथ साथ रामभक्ति की तरंगें भी देश के भिन्न भिन्न भागों में उठ चली थीं। था।’’ इस पंक्ति के रचनाकार कौन हैं?

  • महावीर प्रसाद द्विवेदी
  • हज़ारीप्रसाद द्विवेदी
  • रामकुमर वर्मा
  • रामचंद्र शुक्ल

Ans. : (4) रामचंद्र शुक्ल

#‘‘जो भक्तिमार्ग श्रद्धा के अवयव को छोड़कर केवल प्रेम को ही लेकर चलेगा, धर्म से उसका लगाव न रह जायगा। वह एक प्रकार से अधूरा रहेगा।’’ इस पंक्ति के रचनाकार कौन हैं?

  • महावीर प्रसाद द्विवेदी
  • रामचंद्र शुक्ल
  • रामकुमर वर्मा
  • हज़ारीप्रसाद द्विवेदी

Ans. : (2) रामचंद्र शुक्ल

#‘‘रामचरणदास की—श्रृंगारी उपासना में चिरान छपरा के जीवाराम जी ने थोड़ा हेरफेर किया। उन्होंने पति पत्नी भावना के स्थान पर ‘सखीभाव’ रखा और अपनी शाखा का नाम ‘तत्सुखी’ शाखा रखा।’’ इस पंक्ति के रचनाकार कौन हैं?

  • महावीर प्रसाद द्विवेदी
  • हज़ारीप्रसाद द्विवेदी
  • श्यामसुंदरदास
  • रामचंद्र शुक्ल

Ans. : (4) रामचंद्र शुक्ल

#‘‘रामचरणदास ने अपनी शाखा का नाम ‘स्वसुखी शाखा’ रखा। स्त्रीवेष धारण करके पति ‘लाल साहब’ (यह खिताब राम को दिया गया है) से मिलने के लिए सोलह श्रृंगार करना, सीता की भावना सपत्नी रूप में करना आदि इस शाखा के लक्षण हुए।’’ इस पंक्ति के रचनाकार कौन हैं?

  • महावीर प्रसाद द्विवेदी
  • हज़ारीप्रसाद द्विवेदी
  • श्यामसुंदरदास
  • रामचंद्र शुक्ल

Ans. : (4) रामचंद्र शुक्ल

#‘‘कृष्णभक्ति शाखा कृष्ण भगवान के धर्मस्वरूप को लोकरक्षक और लोकरंजक स्वरूप को छोड़कर केवल मधुर स्वरूप और प्रेमलक्षणा भक्ति की सामग्री लेकर चली। इससे धर्म सौंदर्य के आकर्षण से वह दूर पड़ गई। हुए।’’ यह कथन किसका है?

(1) रामचंद्र शुक्ल

(2)     हज़ारीप्रसाद द्विवेदी

(3)     श्यामसुंदरदास

(4) महावीर प्रसाद द्विवेदी

Ans. : (1) रामचंद्र शुक्ल

#इन में से कौन-सा कथन असत्य है?

(a) ‘हनुमानबाहुक’ तो केवल हनुमान जी को ही संबोधन करके लिखा गया है।

(b) भक्ति के लिए किसी पहुँचे हुए भक्त का प्रसाद भी भक्तिमार्ग में अपेक्षित होता है।

(c) संवत् 1696 में रायमल्ल पांडे ने ‘हनुमच्चरित्र’ लिखा था।

(d) जो भक्तिमार्ग श्रद्धा के अवयव को छोड़कर केवल प्रेम को ही लेकर चलेगा, धर्म से उसका लगाव न रह जायगा। वह एक प्रकार से पूर्ण रहेगा।

(A)(a)

(B)(b)

(C)(c)

(D)(d)

Ans. : (D)(d)

#इन में से कौन-सा कथन असत्य है?

(a) गोस्वामी जी की प्रतिभा का प्रखर प्रकाश डेढ़ सौ वर्ष तक ऐसा छाया रहा कि रामभक्ति की और रचनाएँ उसके सामने ठहर न सकीं।

(b) प्रेम और श्रद्धा अर्थात् पूज्य बुद्धि दोनों के मेल से भक्ति की निष्पत्ति होती है। श्रद्धा धर्म की अनुगामिनी है। जहाँ धर्म का स्फुरण दिखाई पड़ता है वहीं श्रद्धा टिकती है।

(c) धर्म ब्रह्म के सत्स्वरूप की व्यक्त प्रवृत्ति है, उस स्वरूप की क्रियात्मक अभिव्यक्ति है, जिसका आभास अखिल विश्व की स्थिति में मिलता है। पूर्ण भक्त व्यक्त जगत् के बीच सत् की इस सर्वशक्तिमयी प्रवृत्ति के उदय का, धर्म की इस मंगलमयी ज्योति के स्फुरण का साक्षात्कार चाहता रहता है। इसी ज्योति के प्रकाश में सत् के अनंत रूप सौंदर्य की भी मनोहर झाँकी उसे मिलती है।

(d) ‘विनयपत्रिका’ सूरदास जी की प्रसिद्ध रचना है।

(A)(a)

(B)(b)

(C)(c)

(D)(d)

Ans. : (D)(d)

#इन में से कौन-सा कथन असत्य है?

(a) ‘विनयपत्रिका’ में गोस्वामी जी ने लोक में फैले अधर्म, अनाचार, अत्याचार आदि का भीषण चित्र खींचकर भगवान से अपना सत् स्वरूप, धर्म संस्थापक स्वरूप व्यक्त करने की प्रार्थना की है।

(b) प्रेम और श्रद्धा अर्थात् पूज्य बुद्धि दोनों के मेल से भक्ति की निष्पत्ति होती है। श्रद्धा धर्म की अनुगामिनी है। जहाँ धर्म का स्फुरण दिखाई पड़ता है वहीं श्रद्धा टिकती है।

(c) धर्म ब्रह्म के सत्स्वरूप की व्यक्त प्रवृत्ति है, उस स्वरूप की क्रियात्मक अभिव्यक्ति है, जिसका आभास अखिल विश्व की स्थिति में मिलता है। पूर्ण भक्त व्यक्त जगत् के बीच सत् की इस सर्वशक्तिमयी प्रवृत्ति के उदय का, धर्म की इस मंगलमयी ज्योति के स्फुरण का साक्षात्कार चाहता रहता है। इसी ज्योति के प्रकाश में सत् के अनंत रूप सौंदर्य की भी मनोहर झाँकी उसे मिलती है।

(d) ‘हनुमानबाहुक’ तो केवल रावण को ही संबोधन करके लिखा गया है।

(A)(a)

(B)(b)

(C)(c)

(D)(d)

Ans. : (D)(d)

#‘‘जब अधर्म का अंधकार फाड़कर धर्मज्योति अमोघ शक्ति के साथ साथ फूट पड़ती है तब मानो उसके प्रिय भगवान का मनोहर रूप सामने आ जाता और वह पुलकित हो उठता है। भीतर का ‘चित्त’ जब बाहर ‘सत्’ का साक्षात्कार कर पाता है तब ‘आनंद’ का आविर्भाव होता है और ‘सदानंद’ की अनुभूति होती है।’’ यह कथन किसका है?

(1) रामचंद्र शुक्ल

(2)     हज़ारीप्रसाद द्विवेदी

(3)     श्यामसुंदरदास

(4) महावीर प्रसाद द्विवेदी

Ans. : (1) रामचंद्र शुक्ल

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण 4 : सगुणधारा, रामभक्तिशाखा)