बलभद्र मिश्र (Balbhadra Mishra

: the Hindi poet) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

ये ओरछा के सनाढय ब्राह्मण पं. काशीनाथ के पुत्र और प्रसिद्ध कवि केशवदास के बड़े भाई थे। इनका जन्मकाल संवत् 1600 के लगभग माना जा सकता है। इनका नखशिखश्रृंगार का एक प्रसिद्ध ग्रंथ है जिसमें इन्होंने नायिका के अंगों का वर्णन उपमा, उत्प्रेक्षा, संदेह आदि अलंकारों के प्रचुर विधन द्वारा किया है। ये केशवदासजी के समकालीन या पहले के उन कवियों में थे जिनके चित्त में रीति के अनुसार काव्यरचना की प्रवृत्ति हो रही थी। कृपाराम ने जिस प्रकार रसरीति का अवलंबन कर नायिकाओं का वर्णन किया उसी प्रकार बलभद्र नायिका के अंगों को एक स्वतंत्र विषय बनाकर चले थे। इनका रचनाकाल संवत् 1640 के पहले माना जा सकता है। रचना इनकी बहुत प्रौढ़ और परिमार्जित है, इससे अनुमान होता है कि नखशिख के अतिरिक्त इन्होंने और पुस्तकें भी लिखी होंगी। संवत् 1891 में गोपाल कवि ने बलभद्र कृत नखशिख की एक टीका लिखी जिसमें उन्होंने बलभद्र कृत तीन और ग्रंथों का उल्लेख किया है : बलभद्री व्याकरण, हनुमन्नाटक और गोवर्द्धनसतसई टीका। पुस्तकों की खोज में इनका दूषणविचारनाम का एक और ग्रंथ मिला है जिसमें काव्यदोषों का निरूपण है। नखशिख के दो कवित्त उद्धृत किए जाते हैं :

पाटल नयन कोकनद के से दल दोऊ,

बलभद्र बासर उनीदी लखी बाल मैं।

सोभा के सरोवर में बाड़व की आभा कैंधौं,

देवधुनी भारती मिली है पुन्यकाल मैं।

काम-कैवरत कैधौं नासिकर उडुप बैठो,

खेलत सिकार तरुनी के मुख ताल मैं।

लोचन सितासित में लोहित लकीर मानो,

बाँधो जुग मीन लाल रेशम की डोर मैं।

 

मरकत के सूत कैधौं पन्नग के पूत अति

राजत अभूत तमराज कैसे तार हैं।

मखतूल गुनग्राम सोभित सरस स्याम,

काम मृग कानन कै कुहू के कुमार हैं।

कोप की किरन कै जलज नाल नील तंतु,

उपमा अनंत चारु चँवर सिंगार हैं।

कारे सटकारे भींजे सोंधो सों सुगंध बास,

ऐसे बलभ्रद नवबाला तेरे बार हैं।

प्रश्नोत्तरी-40 (हिंदी भाषा एवं साहित्य, बलभद्र मिश्र)

#बलभद्र मिश्र के संबंध में निम्नलिखित में कौन-कौन से कथन सत्य हैं :

(A) बलभद्र मिश्र का नखशिखश्रृंगार का एक प्रसिद्ध ग्रंथ है जिसमें इन्होंने नायिका के अंगों का वर्णन उपमा, उत्प्रेक्षा, संदेह आदि अलंकारों के प्रचुर विधान द्वारा किया है।

(B) ‘माधवानल कामकंदला’ श्रृंगार रस की दृष्टि से ही लिखी जान पड़ती है, आध्यात्मिक दृष्टि से नहीं।

(C) बलभद्र कृत तीन ग्रंथ हैं : बलभद्री व्याकरण, हनुमन्नाटक और गोवर्द्धनसतसई टीका। इनका दूषणविचारनाम का एक और ग्रंथ मिला है जिसमें काव्यदोषों का निरूपण है।

(D) ‘‘मरकत के सूत कैधौं पन्नग के पूत अति

राजत अभूत तमराज कैसे तार हैं।’’ इन काव्य-पंक्तियों के रचनाकार बलभद्र मिश्र हैं।

(A)(a)(b)(c)

(B)(b)(c)(d)

(C)(a)(c)(d)

(D)(a)(b)(d)

Ans. : (C)(a)(c)(d)

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण 6 : भक्तिकाल की फुटकल रचनाएं)