महापात्र नरहरि बंदीजन (Mahapatra Narhari Bandijan : the Hindi poet) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

महापात्र नरहरि बंदीजन (Mahapatra Narhari Bandijan : the Hindi poet) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

महापात्र नरहरि बंदीजन : इनका जन्म संवत् 1562 में और मृत्यु संवत् 1667 में कही जाती है। महापात्र की उपाधि इन्हें अकबर के दरबार से मिली थी। ये असनी फतेहपुर के रहनेवाले थे और अकबर के दरबार में इनका बहुत मान था। इन्होंने छप्पय और कवित्त कहे हैं। इनके बनाए दो ग्रंथ परंपरा से प्रसिद्ध हैं रुक्मिणीमंगलऔर छप्पय नीति। एक तीसरा ग्रंथ कवित्तसंग्रहभी खोज में मिला है। इनका वह प्रसिद्ध छप्पय नीचे दिया जाता है जिस पर कहते हैं, अकबर ने गोवध बंद कराया था :

अरिहु दंत तिन धरै ताहि नहिं मारि सकतकोइ।

हम संतत तिनु चरहिं वचन उच्चरहिं दीन होइ।

अमृत पय नित स्रवहिं बच्छ महि थंभन जावहिं।

हिंदुहि मधुर न देहिं कटुक तुरकहि न पियावहिं।

कह कवि नरहरि अकबर सुनौ बिनवति गउ जोरे करन।

अपराध कौन मोहिं मारियत मुएहु चाम सेवइ चरन।

प्रश्नोत्तरी (हिंदी भाषा एवं साहित्य, महापात्र नरहरि बंदीजन)

# महापात्र नरहरि बंदीजन के संबंध में निम्नलिखित में कौन-कौन से कथन सत्य हैं :

(A) नरहरि बंदीजन को महापात्र की उपाधि अकबर के दरबार से मिली थी।

(B) हिततरंगिणी का निर्माण बिहारी सतसई से पहले नहीं हुआ है।

(C) इनके बनाए तीन ग्रंथ रुक्मिणीमंगल‘ ‘छप्पय नीति और कवित्तसंग्रह हैं।

(D) ‘‘अरिहु दंत तिन धरै ताहि नहिं मारि सकतकोइ।

हम संतत तिनु चरहिं वचन उच्चरहिं दीन होइ।’’ इन काव्य-पंक्तियों के रचनाकार कृपाराम हैं।

(A)(a)(b)(c)

(B)(b)(c)(d)

(C)(a)(c)(d)

(D)(a)(b)(d)

Ans. : (C)(a)(c)(d)

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण 6 : भक्तिकाल की फुटकल रचनाएं)