कृपाराम (Kriparam : the Hindi poet) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

कृपाराम (Kriparam : the Hindi poet) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

कृपाराम : इनका कुछ वृत्तांत ज्ञात नहीं। इन्होंने संवत् 1598 में रसरीति पर हिततरंगिणीनामक ग्रंथ दोहों में बनाया। रीति या लक्षण ग्रंथों में यह बहुत पुराना है। कवि ने कहा है कि और कवियों ने बड़े छंदों के विस्तार में श्रृंगार रस का वर्णन किया है पर मैंने सुघरताके विचार से दोहों में वर्णन किया है। इससे जान पड़ता है कि इनके पहले और लोगों ने भी रीतिग्रंथ लिखे थे जो अब नहीं मिलते हैं। हिततरंगिणीके कई दोहे बिहारी के दोहों से मिलते-जुलते हैं। पर इससे यह नहीं सिद्ध होता कि यह ग्रंथ बिहारी के पीछे का है क्योंकि ग्रंथ में निर्माणकाल बहुत स्पष्ट रूप से दिया हुआ है :

सिधि निधि सिव मुख चंद्र लखि माघ सुद्दि तृतियासु।

हिततरंगिनी हौं रची कवि हित परम प्रकासु।

दो में से एक बात हो सकती है या तो बिहारी ने उन दोहों को जान बूझकर लिया अथवा वे दोहे पीछे से मिल गए। हिततरंगिणी के दोहे बहुत ही सरस, भावपूर्ण तथा परिमार्जित भाषा में हैं। कुछ नमूने देखिए :

लोचन चपल कटाच्छ सर अनियारे विष पूरि।

मन मृग बेधौं मुनिन के जगजन सहत बिसूरि।

आजु सबारे हौं गई नंदलाल हित ताल।

कुमुद कुमुदुनी के भटू निरखे औरै हाल।

पति आयो परदेस तें ऋतु बसंत को मानि।

झमकि झमकि निज महल में टहलैं करै सुरानि।

प्रश्नोत्तरी (हिंदी भाषा एवं साहित्य, कृपाराम)

#कृपाराम के संबंध में निम्नलिखित में कौन-कौन से कथन सत्य हैं :

(A) हिततरंगिणीके कई दोहे बिहारी के दोहों से मिलते-जुलते हैं।

(B) हिततरंगिणी का निर्माण बिहारी सतसई से पहले हुआ है।

(C) ‘दशम स्कंध भाषा’ का अनुवाद फ़ारसी भाषा में नहीं हुआ है।

(D) ‘‘लोचन चपल कटाच्छ सर अनियारे विष पूरि।

मन मृग बेधौं मुनिन के जगजन सहत बिसूरि।’’ इन काव्य-पंक्तियों के रचनाकार कृपाराम हैं।

(A)(a)(b)(c)

(B)(b)(c)(d)

(C)(a)(c)(d)

(D)(a)(b)(d)

Ans. : (D)(a)(b)(d)

 

#कृपाराम के संबंध में निम्नलिखित में कौन-कौन से कथन सत्य हैं :

(A) कृपाराम ने संवत् 1598 में रसरीति पर हिततरंगिणीनामक ग्रंथ दोहों में बनाया। रीति या लक्षण ग्रंथों में यह बहुत पुराना है।

(B) हिततरंगिणी के दोहे बहुत ही सरस, भावपूर्ण तथा परिमार्जित भाषा में हैं।

(C) ‘दशम स्कंध भाषा’ का अनुवाद फ़ारसी भाषा में हुआ है।

(D) ‘‘पति आयो परदेस तें ऋतु बसंत को मानि।

झमकि झमकि निज महल में टहलैं करै सुरानि।’’ इन काव्य-पंक्तियों के रचनाकार कृपाराम हैं।

(A)(a)(b)(c)

(B)(b)(c)(d)

(C)(a)(c)(d)

(D)(a)(b)(d)

Ans. : (D)(a)(b)(d)

 (आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण 6 : भक्तिकाल की फुटकल रचनाएं)