मीराबाई (Meerabai : the Hindi poetess) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

मीराबाई (Meerabai : the Hindi poetess) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

ये मेड़तिया के राठौर रत्नसिंह की पुत्री, राव दूदाजी की पौत्री और जोधपुर के बसाने वाले प्रसिद्ध राव जोध जी की प्रपौत्री थीं। इनका जन्म संवत् 1573 में चोकड़ी नाम के एक गाँव में हुआ था और विवाह उदयपुर के महाराणा कुमार भोजराज जी के साथ हुआ था। ये आरंभ से ही कृष्णभक्ति में लीन रहा करती थीं। विवाह के उपरांत थोड़े दिनों में इनके पति का परलोकवास हो गया। ये प्राय: मंदिर में जाकर उपस्थित भक्तों और संतों के बीच श्रीकृष्ण भगवान की मूर्ति के सामने आनंदमग्न होकर नाचती और गाती थीं। कहते हैं कि इनके इस राजकुलविरुद्ध आचरण से इनके स्वजन लोकनिंदा के भय से रुष्ट रहा करते थे। यहाँ तक कहा जाता है कि इन्हें कई बार विष देने का प्रयत्न किया गया, पर भगवत् कृपा से विष का कोई प्रभाव इन पर न हुआ। घर वालों के व्यवहार से खिन्न होकर ये द्वारका और वृंदावन के मंदिरों में घूम-घूमकर भजन सुनाया करती थीं। जहाँ जातीं वहाँ इनका देवियों का सा सम्मान होता। ऐसा प्रसिद्ध है कि घरवालों से तंग आकर इन्होंने गोस्वामी तुलसीदास जी को यह पद लिखकर भेजा था :

स्वस्ति श्री तुलसी कुल भूषन दूषन हरन गोसाईं।

बारहिं बार प्रनाम करहुँ, अब हरहु सोक समुदाई।

घर के स्वजन हमारे जेते सबन्ह उपाधि बढ़ाई।

साधु संग अरु भजन करत मोहिं देत कलेस महाई।

मेरे मात पिता के सम हौ, हरिभक्तन्ह सुखदाई।

हमको कहा उचित करिबो है, सो लिखिए समझाई।

इस पर गोस्वामी जी ने विनयपत्रिका का यह पद लिखकर भेजा था :

जाके प्रिय न राम बैदेही।

सो नर तजिय कोटि बैरी सम जद्यपि परम सनेही।

× × × ×

नाते सबै राम के मनियत सुहृद सुसेव्य जहाँ लौं।

अंजन कहा ऑंखि जौ फूटै, बहुतक कहौं कहाँ लौं।

पर मीराबाई की मृत्यु द्वारका में संवत् 1603 में हो चुकी थी। अत: यह जनश्रुति किसी की कल्पना के आधर पर ही चल पड़ी।

मीराबाई की उपासना माधुर्यभावकी थी अर्थात् वे अपने इष्टदेव श्रीकृष्ण की भावना प्रियतम या पति के रूप में करती थीं। पहले यह कहा जा चुका है कि इस भाव की उपासना में रहस्य का समावेश अनिवार्य है। इसी ढंग की उपासना का प्रचार सूफी भी कर रहे थे अत: उनका संस्कार भी इन पर अवश्य कुछ पड़ा। जब लोग इन्हें खुले मैदान मंदिरों में पुरुषों के सामने जाने से मना करते तब वे कहतीं कि कृष्ण के अतिरिक्त और पुरुष है कौन जिसके सामने लज्जा करूँ?’ मीराबाई का नाम भारत के प्रधान भक्तों में है और इनका गुणगान नाभाजी, ध्रुवदास, व्यास जी, मलूकदास आदि सब भक्तों ने किया है। इनके पद कुछ तो राजस्थानी मिश्रित भाषा में हैं और कुछ विशुद्ध साहित्यिक ब्रजभाषा में। पर सबमें प्रेम की तल्लीनता समान रूप से पाई जाती है। इनके बनाए चार ग्रंथ कहे जाते हैं : नरसीजी का मायरा, गीतगोविंद टीका, राग गोविंद, राग सोरठ के पद।

इनके दो पद नीचे दिए जाते हैं :

बसो मेरे नैनन में नंदलाल।

मोहनि मूरति, साँवरि सूरति, नैना बने रसाल।

मोर मुकुट मकराकृत कुंडल, अरुन तिलक दिए भाल

अधर सुधरस मुरली राजति, उर बैजंती माल

छुद्रघंटिका कटि तट सोभित, नूपुर शब्द रसाल

मीरा प्रभु संतन सुखदाई, भक्तबछल गोपाल।

 

मन रे परसि हरि के चरन।

सुभग सीतल कमल कोमल त्रिविध ज्वाला हरन।

जो चरन प्रहलाद परसे इंद्र पदवी हरन।

जिन चरन धु्रव अटल कीन्हौं राखि अपनी सरन

जिन चरन ब्रह्मांड भेटयो नखसिखौ श्री भरन।

जिन चरन प्रभु परस लीन्हें तरी गौतम घरनि

जिन चरन धरयो गोबरधन गरब-मघवा-हरन।

दासि मीरा लाल गिरधर अगम तारन तरन।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण 5—सगुणधारा : कृष्णभक्ति शाखा)

 

प्रश्नोत्तरी-22 (हिंदी भाषा एवं साहित्य)

# मीराबाई के संबंध में निम्नलिखित में कौन-कौन से कथन सत्य हैं :

(A) मीराबाई की उपासना माधुर्यभावकी थी अर्थात् वे अपने इष्टदेव श्रीकृष्ण की भावना प्रियतम या पति के रूप में करती थीं।

(B) ‘कृष्ण के अतिरिक्त और पुरुष है कौन जिसके सामने लज्जा करूँ?’ यह कथन मीराबाई का है।

(C) ‘परमानंदसागर’ मीराबाई की रचना है।

(D) ‘मन रे परसि हरि के चरन।

सुभग सीतल कमल कोमल त्रिविध ज्वाला हरन।‘ इन काव्य-पंक्तियों की रचनाकार मीराबाई हैं।

(A)(a)(b)(c)

(B)(b)(c)(d)

(C)(a)(c)(d)

(D)(a)(b)(d)

Ans. : (D)(a)(b)(d)

 

#‘बसो मेरे नैनन में नंदलाल।

मोहनि मूरति, साँवरि सूरति, नैना बने रसाल।।’

इन काव्य-पंक्तियों के रचनाकार हैं :

(A) परमानंददास

(B) सूरदास

(C) मीराबाई

(D) गदाधर भट्ट

Ans. : (C) मीराबाई

# नरसीजी का मायरा, गीतगोविंद टीका, राग गोविंद।

इन रचनाओं के रचनाकार हैं :

(A) गदाधर भट्ट

(B) मीराबाई

(C) कुंभनदास

(D) परमानंददास

Ans. : (B) मीराबाई

#‘जाके प्रिय न राम बैदेही।

सो नर तजिय कोटि बैरी सम जद्यपि परम सनेही।’ गोस्वामी तुलसीदास जी ने विनयपत्रिका का यह पद लिखकर किसको भेजा था :

(A) परमानंददास

(B) मीराबाई

(C) कुंभनदास

(D) गदाधर भट्ट

Ans. : (B) मीराबाई

#स्वस्ति श्री तुलसी कुल भूषन दूषन हरन गोसाईं।

बारहिं बार प्रनाम करहुँ, अब हरहु सोक समुदाई।’

ये काव्य-पंक्तियां किसने किसको लिखकर भेजा था?

Ans. : घरवालों से तंग आकर मीराबाई ने गोस्वामी तुलसीदास जी को यह पद लिखकर भेजा था।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण 5—सगुणधारा : कृष्णभक्ति शाखा)