गदाधर भट्ट (Gadadhar Bhatta : the Hindi poet) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

गदाधर भट्ट (Gadadhar Bhatta : the Hindi poet) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

ये दक्षिणी ब्राह्मण थे। इनके जन्म संवत् आदि का ठीक ठीक पता नहीं। पर यह बात प्रसिद्ध है कि ये श्री चैतन्य महाप्रभु को भागवत सुनाया करते थे। इसका समर्थन भक्तमाल की इन पंक्तियों से भी होता है :

भागवत सुध बरखै बदन, काहू को नाहिंन दुखद।

गुणनिकर गदाधर भट्ट अति सबहिन को लागै सुखद।

श्री चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव संवत् 1542 में और गोलोकवास 1584 में माना जाता है। अत: संवत् 1584 के भीतर ही आपने श्री महाप्रभु से दीक्षा ली होगी। महाप्रभु के जिन छह विद्वान शिष्यों ने गौड़ीय संप्रदाय के मूल संस्कृत ग्रन्थों की रचना की थी उनमें जीव गोस्वामी भी थे। ये वृंदावन में रहते थे। एक दिन दो साधुओं ने जीव गोस्वामी के सामने गदाधर भट्टजी का यह पद सुनाया :

सखी हौं स्याम रंग रँगी।

देखि बिकाय गई वह मूरति, सूरत माँहि पगी।

संग हुतो अपनो सपनो सो सोइ रही रस खोई।

जागेहु आगे दृष्टि परै, सखि, नेकु न न्यारो होई।

एक जु मेरी अंखियन में निसि द्यौस रह्यो करि भौन।

गाय चरावन जात सुन्यो, सखि सो धौं कन्हैया कौन?

कासौं कहौं कौन पतियावै कौन करे बकवाद?

कैसे कै कहि जाति गदाधर, गूँगे ते गुर स्वाद?

इस पद को सुन जीव गोस्वामी ने भट्टजी के पास यह श्लोक लिख भेजा :

अनाराधय राधपदाम्भोजयुग्ममाश्रित्य वृन्दाटवीं तत्पदा(म्।

असम्भाष्य तद्भावगम्भीरचित्तान कुत:श्यामासिन्धो: रहस्यावगाह:।

यह श्लोक पढ़कर भट्ट जी मूर्छित हो गए फिर सुध आने पर सीधे वृंदावन में जाकर चैतन्य महाप्रभु के शिष्य हुए। इस वृत्तांत को यदि ठीक मानें तो इनकी रचनाओं का आरंभ 1580 से मानना पड़ता है और अंत संवत् 1600 के पीछे। इस हिसाब से इनकी रचना का प्रादुर्भाव सूरदास जी के रचनाकाल के साथ साथ अथवा उससे भी कुछ पहले से मानना होगा।

संस्कृत के चूड़ांत पंडित होने के कारण शब्दों पर इनका बहुत विस्तृत अधिकार था। इनका पदविन्यास बहुत ही सुंदर है। गोस्वामी तुलसीदास जी के समान इन्होंने संस्कृत पदों के अतिरिक्त संस्कृतगर्भित भाषा कविता भी की है। नीचे कुछ उदाहरण दिए जाते हैं :

जयति श्री राधिके, सकल सुख साधिके,

तरुनि मनि नित्य नव तन किसोरी।

कृष्ण तन लीन मन, रूप की चातकी,

कृष्ण मुख हिम किरन की चकोरी

कृष्ण दृग भृंग विश्राम हित पद्मिनी,

कृष्ण दृग मृगज बंधन सुडोरी।

कृष्ण अनुराग मकरंद की मधुकरी,

कृष्ण गुन गान रससिंधु बोरी

विमुख पर चित्त तें चित्त जाको सदा,

करति निज नाह कै चित्त चोरी।

प्रकृति यह गदाधर कहत कैसे बने,

अमित महिमा, इतै बुद्धि थोरी।

 

झूलति नागरि नागर लाल।

मंद मंद सब सखी झुलावति, गावति गीत रसाल।

फरहरात पट पीत नील के, अंचल चंचल चाल।

मनहुँ परस्पर उमगि ध्यान छबि, प्रगट भई तिहि काल

सिलसिलात अति प्रिया सीस तें, लटकति बेनी भाल।

जन प्रिय मुकुट बरहि भ्रम बस तहँ ब्याली बिकल बिहाल

मल्लीमाल प्रिया के उर की, पिय तुलसीदल माल।

जनु सुरसरि रवितनया मिलिकै सोभित श्रेनि मराल

स्यामल गौर परस्पर प्रति छबि, सोभा बिसद विसाल।

निरखि गदाधर रसिक कुँवरि मन परयो सुरस जंजाल।

 

प्रश्नोत्तरी (हिंदी भाषा एवं साहित्य)

#गदाधर भट्ट जी के संबंध में निम्नलिखित में कौन सा कथन असत्य है :

(A) गदाधर भट्ट चैतन्य महाप्रभु के शिष्य थे।

(B) बल्लभाचार्य जी के शिष्य और अष्टछाप के कवि थे।

(C) ‘परमानंदसागर’ इनकी रचना है।

(D) ‘सखी हौं स्याम रंग रँगी।

देखि बिकाय गई वह मूरति, सूरत माँहि पगी।‘ इन काव्य-पंक्तियों के रचनाकार गदाधर भट्ट हैं।

(A)(a)(b)

(B)(b)(c)

(C)(a)(d)

(D)(b)(d)

Ans. : (C)(a)(d)

 

#‘जयति श्री राधिके, सकल सुख साधिके,

तरुनि मनि नित्य नव तन किसोरी।’

इन काव्य-पंक्तियों के रचनाकार हैं :

(A) परमानंददास

(B) सूरदास

(D) कुंभनदास

(D) गदाधर भट्ट

Ans. : (D) गदाधर भट्ट

#मनहुँ परस्पर उमगि ध्यान छबि, प्रगट भई तिहि काल

सिलसिलात अति प्रिया सीस तें, लटकति बेनी भाल।

इन काव्य-पंक्तियों के रचनाकार हैं :

(A) गदाधर भट्ट

(B) सूरदास

(D) कुंभनदास

(D) परमानंददास

Ans. : (A) गदाधर भट्ट

#‘झूलति नागरि नागर लाल।

मंद मंद सब सखी झुलावति, गावति गीत रसाल।’

इन काव्य-पंक्तियों के रचनाकार हैं :

(A) परमानंददास

(B) सूरदास

(D) कुंभनदास

(D) गदाधर भट्ट

Ans. : (D) गदाधर भट्ट

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण 5—सगुणधारा : कृष्णभक्ति शाखा)