हितहरिवंश (Hitharivansh : the Hindi poet) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

हितहरिवंश (Hitharivansh : the Hindi poet) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

राधवल्लभी संप्रदाय के प्रवर्तक गोसाईं हितहरिवंश का जन्म संवत् 1559 में मथुरा से 4 मील दक्षिण बादगाँव में हुआ था। राधवल्लभी संप्रदाय के पं. गोपालप्रसाद शर्मा ने इनका जन्म संवत् 1530 माना है, जो सब घटनाओं पर विचार करने से ठीक नहीं जान पड़ता। ओरछानरेश महाराज मधुकरशाह के राजगुरु श्री हरिराम व्यास जी संवत् 1622 के लगभग आपके शिष्य हुए थे। हितहरिवंश जी गौड़ ब्राह्मण थे। इनके पिता का नाम केशवदास मिश्र और माता का नाम तारावती था।

कहते हैं कि हितहरिवंश जी पहले माधवानुयायी गोपाल भट्ट के शिष्य थे। पीछे इन्हें स्वप्न में राधिका जी ने मंत्र दिया और इन्होंने अपना एक अलग संप्रदाय चलाया। अत: हित संप्रदाय को माधव संप्रदाय के अंतर्गत मान सकते हैं। हितहरिवंश जी के चार पुत्र और एक कन्या हुई। पुत्रों के नाम वनचंद्र, कृष्णचंद्र, गोपीनाथ और मोहनलाल थे। गोसाईं जी ने संवत् 1582 में श्री राधवल्लभ जी की मूर्ति वृंदावन में स्थापित की और वहीं विरक्त भाव से रहने लगे। ये संस्कृत के अच्छे विद्वान और भाषा काव्य के अच्छे मर्मज्ञ थे। 170 श्लोकों का राधासुधानिधिआप ही का रचा कहा जाता है। ब्रजभाषा की रचना आपकी यद्यपि बहुत विस्तृत नहीं है, तथापि है बड़ी सरस और हृदयग्राहिणी। आपके पदों का संग्रह हित चौरासी के नाम से प्रसिद्ध है क्योंकि उसमें 84 पद हैं। प्रेमदास की लिखी इस ग्रंथ की एक बहुत बड़ी टीका (500 पृष्ठों की) ब्रजभाषा गद्य में है।

इनके द्वारा ब्रजभाषा की काव्यश्री के प्रसार में बड़ी सहायता पहुँची। इनके कई शिष्य अच्छे अच्छे कवि हुए हैं। हरिराम व्यास ने इनके गोलोकवास पर बड़े चुभते पद कहे हैं। सेवक जी, ध्रुवदास आदि इनके शिष्य बड़ी सुंदर रचना कर गए हैं। अपनी रचना की मधुरता के कारण हितहरिवंश जी श्रीकृष्ण की वंशी के अवतार कहे जाते हैं। इनका रचनाकाल संवत् 1600 से संवत् 1640 तक माना जा सकता है। हित चौरासीके अतिरिक्त इनकी फुटकल बानी भी मिलती है जिसमें सिद्धांत संबंधी पद हैं। इनके हित चौरासीपर लोकनाथ कवि ने एक टीका लिखी है। वृंदावन ने इनकी स्तुति और वंदना में हितजी की सहस्रनामावलीऔर चतुर्भुजदास ने हितजू को मंगललिखा है। इसी प्रकार हितपरमानंद जी और ब्रजजीवनदास ने इनकी जन्म बधाइयाँ लिखी हैं। हितहरिवंश की रचना के कुछ उदाहरण नीचे दिए जाते हैं जिनसे इनकी वर्णन प्रचुरता का परिचय मिलेगा :

(सिद्धांत संबंधी कुछ फुटकल पदों से)

रहौ कोउ काहू मनहिं दिए।

मेरे प्राननाथ श्री स्यामा सपथ करौं तिन छिए।

जो अवतार कदंब भजत हैं धरि दृढ़ ब्रत जु हिए।

तेऊ उमगि तजत मर्यादा बन बिहार रस पिए।

खोए रतन फिरत जो घर घर कौन काज इमि जिए ?

हितहरिबंस अनत सचु नाहीं बिन या रसहिं पिए।

(हित चौरासी से)

ब्रज नव तरुनि कदंब मुकुटमनि स्यामा आजु बनी।

नख सिख लौं अंग अंग माधुरी मोहे स्याम धनी।

यों राजति कबरी गूथित कच कनक कंज बदनी।

चिकुर चंद्रिकन बीच अधर बिधु मानौ ग्रसित फनी॥

सौभग रस सिर स्रवत पनारी पिय सीमंत ठनी।

भ्रृकुटि काम कोदंड, नैन सर, कज्जल रेख अनी

भाल तिलक, ताटंक गंड पर, नासा जलज मनी।

दसन कुंद, सरसाधर पल्लव, पीतम मन समनी

हितहरिबंस प्रसंसित स्यामा कीरति बिसद घनी।

गावत श्रवननि सुनत सुखाकर विश्व दुरित दवनी।

 

बिपिन घन कुंज रति केलि भुज मेलि रुचि।

स्याम स्यामा मिले सरद की जामिनी।

हृदय अति फूल, रसमूल पिय नागरी।

कर निकर मत्ता मनु बिबिध गुन रागिनी।

सरस गति हास परिहास आवेस बस।

दलित दल मदन बल कोक रस कामिनी।

हितहरिबंस सुनि लाल लावन्य भिदे।

प्रिया अति सूर सुख सूरत संग्रामिनी।

 

प्रश्नोत्तरी-20 (हिंदी भाषा एवं साहित्य)

हितहरिवंश जी के संबंध में निम्नलिखित में कौन-से कथन सत्य हैं :

(A) अपनी रचना की मधुरता के कारण हितहरिवंश जी श्रीकृष्ण की वंशी के अवतार कहे जाते हैं।

(B) हितहरिवंश वल्लभाचार्य जी के शिष्य और अष्टछाप के कवि थे।

(C) ‘राधासुधानिधि’ और ‘हित चौरासी’ इनकी रचनाएं हैं।

(D) ‘प्रिया अति सूर सुख सूरत संग्रामिनी।’ यह पंक्ति हितहरिवंश जी की है।

 (A)(a)(b)(c)

(B)(b)(c)(d)

(C)(a)(b)(d)

(D)(a)(c)(d)

Ans. : (D)(a)(c)(d)

 

ब्रज नव तरुनि कदंब मुकुटमनि स्यामा आजु बनी।

नख सिख लौं अंग अंग माधुरी मोहे स्याम धनी।’

इन काव्य-पंक्तियों के रचनाकार हैं :

(A) परमानंददास

(B) हितहरिवंश

(D) कुंभनदास

(D) नंददास

Ans. : (B) हितहरिवंश