चतुर्भुजदास (Chaturbhujdas) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

चतुर्भुजदास (Chaturbhujdas) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

चतुर्भुजदासजी कुंभनदासजी के पुत्र और गोसाईं विट्ठलनाथ जी के शिष्य थे। ये भी अष्टछाप के कवियों में हैं। इनकी भाषा चलती और सुव्यवस्थित है। इनके बनाए तीन ग्रंथ मिले हैं द्वादशयश, भक्तिप्रताप तथा हितजू को मंगल

इनके अतिरिक्त फुटकल पदों के संग्रह भी इधर-उधर पाए जाते हैं। एक पद नीचे दिया जाता है :

जसोदा! कहा कहौं हौं बात।

तुम्हरे सुत के करतब मो पै कहत कहे नहिं जात।

भाजन फोरि, ढारि सब गोरस, लै माखन दधि खात।

जौ बरजौं तौ ऑंखि दिखावै, रंचहु नाहिं सकात।

और अटपटी कहँ लौ बरनौं, छुवत पानि सों गात।

दास चतुर्भुज गिरिधर गुन हौं कहति कहति सकुचात।