कृष्णदास (Krishnadas) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

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कृष्णदास (Krishnadas) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

ये भी बल्लभाचार्य जी के शिष्य और अष्टछाप में थे। यद्यपि ये शूद्र थे पर आचार्य जी के बड़े कृपापात्र और मंदिर के प्रधन मुखिया हो गए थे। चौरासी वैष्णवों की वार्तामें इनका कुछ वृत्त दिया हुआ है। एक बार गोसाईं विट्ठलनाथ जी से किसी बात पर अप्रसन्न होकर इन्होंने उनकी डयोढ़ी बंद कर दी। इस पर गोसाईं विट्ठलनाथ जी के कृपापात्र महाराज बीरबल ने इन्हें क़ैद कर लिया। पीछे गोसाईं जी इस बात से बड़े दुखी हुए और इनको कारागार से मुक्त कराके प्रधान के पद पर फिर ज्यों का त्यों प्रतिष्ठित कर दिया। इन्होंने भी और सब कृष्णभक्तों के समान राधाकृष्ण के प्रेम को लेकर श्रृंगार रस के ही पद गाए हैं। जुगलमान चरित्रनामक इनका एक छोटा सा ग्रंथ मिलता है। इसके अतिरिक्त इनके बनाए दो ग्रंथ और कहे जाते हैं ‘भ्रमरगीत’ और ‘प्रेमतत्वनिरूपण’। फुटकल पदों के संग्रह इधर उधर मिलते हैं। सूरदास और नंददास के सामने इनकी कविता साधरण कोटि की है। इनके कुछ पद नीचे दिए जाते हैं :

तरनि तनया तट आवत है प्रात समय,

कंदुक खेलत देख्यो आनंद को कँदवा

नूपुर पद कुनित, पीतांबर कटि बाँधो,

लाल उपरना, सिर मोरन के चँदवा

 

कंचन मनि मरकत रस ओपी।

नंदसुवन के संगम सुखकर अधिक विराजति गोपी

मनहुँ विधता गिरिधर पिय हित सुरतधुजा सुख रोपी।

बदन कांति कै सुनु री भामिनी! सघन चंदश्री लोपी

प्राननाथ के चित चोरन को भौंह भुजंगम कोपी।

कृष्णदास स्वामी बस कीन्हें, प्रेमपुंज को चोपी

 

मो मन गिरधर छवि पै अटक्यो।

ललित त्रिभंग चाल पै चलि कै, चिबुक चारि गड़ि ठटक्यो।

सजल स्याम घन बरन लीन ह्वै, फिरि चित अनत न भटक्यो।

कृष्णदास किए प्रान निछावर, यह तन जग सिर पटक्यो

कहते हैं कि इसी अंतिम पद को गाकर कृष्णदासजी ने शरीर छोड़ा था। इनका कविता काल संवत् 1600 के आगे पीछे माना जा सकता है।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण 5—सगुणधारा : कृष्णभक्ति शाखा)