पं. अंबिकादत्त व्यास (Pt. Ambikadatta Vyas) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

पं. अंबिकादत्त व्यास (Pt. Ambikadatta Vyas) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

पं. अंबिकादत्त व्यास  व्यास जी का जन्म संवत् 1915 और मृत्यु संवत् 1957 में हुई। ये संस्कृत के प्रतिभाशाली विद्वान, हिन्दी के अच्छे कवि और सनातन धर्म के बड़े उत्साही उपदेशक थे। इनके धर्मसंबंधी व्याख्यानों की धूम रहा करती थी। अवतार मीमांसा आदि धर्मसंबंधी पुस्तकों के अतिरिक्त इन्होंने बिहारी के दोहों के भाव को विस्तृत करने के लिए बिहारी बिहार नाम का एक बड़ा काव्यग्रंथ लिखा। गद्यरचना का भी विवेचन इन्होंने अच्छा किया है। पुरानी चाल की कविता (जैसे पावसपचासा) के अतिरिक्त इन्होंने गद्यकाव्य मीमांसा आदि अनेक गद्यकी पुस्तकें भी लिखीं। ‘इन्होंने’ ‘उन्होंने’ के स्थान पर ये ‘इनने’ ‘उनने’ लिखते थे।

ब्रजभाषा की अच्छी कविता ये बाल्यावस्था से ही करते थे जिससे बहुत शीघ्र रचना करने का इन्हें अभ्यास हुआ। कृष्णलीला को लेकर इन्होंने ब्रजभाषा में एक ललिता नाटिका लिखी थी। भारतेंदु के कहने से इन्होंने गोसंकट नाटकलिखा जिसमें हिंदुओं के बीच असंतोष फैलने पर अकबर द्वारा गोवध बंद किए जाने की कथावस्तु रखी गई है।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 2—गद्य का प्रवर्तन : प्रथम उत्थान)

पं. अंबिकादत्त व्यास जी ने नए नए विषयों पर भी कुछ फुटकल कविताएँ रची हैं जो पुरानी पत्रिकाओं में निकली हैं। एक बार उन्होंने कुछ बेतुके पद्य भी आजमाइश के लिए बनाए थे, पर इस प्रयत्न में उन्हें सफलता नहीं दिखाई पड़ी थी, क्योंकि उन्होंने हिन्दी का कोई प्रचलित छंद लिया था।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 2—काव्यखंड : नई धारा : प्रथम उत्थान)

पं. अंबिकादत्त व्यास ने अपने बिहारी बिहार’ में सब दोहों के भावों को पल्लवित करके रोला छंद लगाए हैं।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, रीतिकाल, प्रकरण 2—रीतिग्रंथकार कवि)

व्यास जी का ‘बिहारी बिहार’ (बिहारी के सब दोहों पर कुंडलियां) बहुत बड़ा ग्रंथ है, जिसमें उन्होंने बिहारी के दोहों का भाव बड़ी मार्मिकता से पल्लवित किया है।  

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 1—काव्यखंड : पुरानी धारा : अन्य कवि)

 

इनका (असनी वाले ठाकुर का) विशेष वृत्तांत स्व. पं. अंबिकादत्त व्यास ने अपने ‘बिहारी बिहार’ की भूमिका में दिया है।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, रीतिकाल, प्रकरण 3—अन्य कवि)

धर्म संबंधी विषयों पर लिखनेवालों (जैसे पं. अंबिकादत्त व्यास) ने शास्त्रीय विषयों को व्यक्त करने में, संवाद पत्रों में राजनीतिक बातों को सफाई के साथ सामने रखने में हिन्दी को लगाया।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 3—गद्य का प्रवर्तन : सामान्य परिचय)

पीयूष प्रवाह (काशी, 1941, अंबिकादत्त व्यास)

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 1—गद्य का प्रवर्तन : सामान्य परिचय)

हरिश्चंद्र के जीवनकाल में ही लेखकों और कवियों का एक खासा मंडल चारों ओर तैयार हो गया। उपाधयाय पं. बदरीनारायण चौधरी, पं. प्रतापनारायण मिश्र, बाबू तोताराम, ठाकुर जगमोहन सिंह, लाला श्रीनिवासदास, पं. बालकृष्ण भट्ट, पं. केशवराम भट्ट, पं. अंबिकादत्त व्यास, पं. राधचरण गोस्वामी इत्यादि कई प्रौढ़ और प्रतिभाशाली लेखकों ने हिन्दी साहित्य के इस नूतन विकास में योग दिया था।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 2—गद्य का प्रवर्तन : प्रथम उत्थान)

भारतेंदु काल में  पं. अंबिकादत्त व्यास ने बंगला की देखा देखी कुछ अतुकांत पद्य आज़माए थे।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 4—काव्यखंड : नई धारा : तृतीय उत्थान)

नवीनधरा के प्रथम उत्थान के भीतर हम हरिश्चंद्र, प्रतापनारायण मिश्र, अंबिकादत्त व्यास, राधकृष्णदास, उपाधयाय बदरीनारायण चौधरी आदि को ले सकते हैं।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 2—काव्यखंड : नई धारा : प्रथम उत्थान)

अब उन लोगों का समय आता है जिन्होंने एक तो हिंदी साहित्य की नवीन गति के प्रवर्तन में योग दिया, दूसरी ओर पुरानी परिपाटी की कविता के साथ भी अपना पूरा संबंध बनाए रखा। ऐसे लोगों में भारतेंदु हरिश्चंद्र, पं. प्रताप नारायण मिश्र, उपाध्याय पंडित  बदरीनारायण चौधरी, ठाकुर जगमोहनसिंह, पंडित अंबिकादत्त व्यास और बाबू रामकृष्ण वर्मा मुख्य हैं।

……भारतेंदु जी ने कवि समाज भी स्थापित किए थे, जिनमें समस्यापूर्तियां बराबर हुआ करती थीं। दूर दूर से कवि लोग आकर उसमें सम्मिलित हुआ करते थे। पंडित अंबिकादत्त व्यास ने अपनी प्रतिभा का चमत्कार पहले पहल ऐसे ही कवि समाज के बीच समस्यापूर्ति करके दिखाया था।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 1—काव्यखंड : पुरानी धारा : अन्य कवि)