अब्दुर्रहीम खानखाना : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में (Rahim : hindi poet)

अब्दुर्रहीम खानखाना : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

ये (अब्दुर्रहीम खानखाना) अकबर बादशाह के अभिभावक प्रसिद्ध मोगल सरदार बैरम खाँ खानखाना के पुत्र थे। इनका जन्म संवत् 1610 में हुआ। ये संस्कृत, अरबी और फ़ारसी के पूर्ण विद्वान और हिन्दी काव्य के पूर्ण मर्मज्ञ कवि थे। ये दानी और परोपकारी ऐसे थे कि अपने समय के कर्ण माने जाते थे; इनकी दानशीलता हृदय की सच्ची प्रेरणा के रूप में थी, कीर्ति की कामना से उसका कोई संपर्क न था। इनकी सभा विद्वानों और कवियों से सदा भरी रहती थी। गंग कवि को इन्होंने एक बार छत्ताीस लाख रुपये दे डाले थे। अकबर के समय में ये प्रधान सेनानायक और मंत्री थे और अनेक बड़े-बड़े युद्धों में भेजे गए थे।

ये जहाँगीर के समय तक वर्तमान रहे। लड़ाई में धोखा देने के अपराध में एक बार जहाँगीर के समय इनकी सारी जागीर ज़ब्त हो गई और क़ैद कर लिए गए। क़ैद से छूटने पर इनकी आर्थिक अवस्था कुछ दिनों तक बड़ी हीन रही। पर जिस मनुष्य ने करोड़ों रुपये दान कर दिए, जिसके यहाँ से कोई विमुख न लौटा उसका पीछा याचकों से कैसे छूट सकता था? अपनी दरिद्रता का दुख वास्तव में इन्हें उसी समय होता था जिस समय इनके पास कोई याचक जा पहुँचता और ये उसकी यथेष्ट सहायता नहीं कर सकते थे। अपनी अवस्था के अनुभव की व्यंजना इन्होंने इस दोहे में की है :

तबही लौं जीबो भलो देबौ होय न धीम।

जग में रहिबो कुचित गति उचित न होय रहीम।।

संपत्ति के समय में जो लोग सदा घेरे रहते हैं विपद के आने पर उनमें से अधिकांश किनारा खींचते हैं, इस बात का द्योतक यह दोहा है :

ये रहीम दर दर फिरैं, माँगि मधुकरी खाहिं।

यारो यारी छाँड़िए, अब रहीम वे नाहिं।।

कहते हैं कि इसी दीन दशा में इन्हें एक याचक ने आ घेरा। इन्होंने यह दोहा लिखकर उसे रीवाँ नरेश के पास भेजा :

चित्रकूट में रमि रहे रहिमन अवध नरेस।

जापर विपदा परति है सो आवत यहि देस।।

रीवाँ नरेश ने उस याचक को एक लाख रुपए दिए।

गोस्वामी तुलसीदास जी से भी इनका बड़ा स्नेह था। ऐसी जनश्रुति है कि एक बार एक ब्राह्मण अपनी कन्या के विवाह के लिए धन न होने से घबराया हुआ गोस्वामी जी के पास आया। गोस्वामी जी ने उसे रहीम के पास भेजा और दोहे की यह पंक्ति लिखकर दे दी :

‘सुरतिय नरतिय नागतिय यह चाहत सब कोय।’

रहीम ने उस ब्राह्मण को बहुत सा द्रव्य देकर विदा किया और दोहे की दूसरी पंक्ति इस प्रकार पूरी करके दे दी,

‘गोद लिये हुलसी फिरै तुलसी सो सुत होय।’

रहीम ने बड़ी बड़ी चढ़ाइयाँ की थीं और मोगल साम्राज्य के लिए न जाने कितने प्रदेश जीते थे। इन्हें जागीर में बहुत बड़े बड़े सूबे और गढ़ मिले थे। संसार का इन्हें बड़ा गहरा अनुभव था। ऐसे अनुभवों के मार्मिक पक्ष को ग्रहण करने की भावुकता इनमें अद्वितीय थी। अपने उदार और ऊँचे हृदय को संसार के वास्तविक व्यवहारों के बीच रखकर जो संवेदना इन्होंने प्राप्त की है उसी की व्यंजना अपने दोहे में की है। तुलसी के वचनों के समान रहीम के वचन भी हिन्दी भाषी भूभाग में सर्वसाधरण के मुँह पर रहते हैं। इसका कारण है जीवन की सच्ची परिस्थितियों का मार्मिक अनुभव। रहीम के दोहे वृंद और गिरधर के पद्यों के समान कोरी नीति के पद्य नहीं हैं। उनमें मार्मिकता है, उनके भीतर से एक सच्चा हृदय झाँक रहा है। जीवन की सच्ची परिस्थितियों के मार्मिक रूप को ग्रहण करने की क्षमता जिस कवि में होगी वही जनता का प्यारा कवि होगा। रहीम का हृदय, द्रवीभूत होने के लिए, कल्पना की उड़ान की अपेक्षा नहीं रखता था। वह संसार के सच्चे और प्रत्यक्ष व्यवहारों में ही अपने द्रवीभूत होने के लिए पर्याप्त स्वरूप पा जाता था। ‘बरवै नायिकाभेद’ में भी जो मनोहर और छलकते हुए चित्र हैं वे भी सच्चे हैं,कल्पना के झूठे खेल नहीं हैं। उनमें भारतीय प्रेमजीवन की सच्ची झलक है।

भाषा पर तुलसी का सा ही अधिकार हम रहीम का भी पाते हैं। ये ब्रज और अवधी,पश्चिमी और पूरबी,दोनों काव्य भाषाओं में समान कुशल थे। ‘बरवै नायिकाभेद’ बड़ी सुंदर अवधी भाषा में है। इनकी उक्तियाँ ऐसी लुभावनी हुईं कि बिहारी आदि परवर्ति कवि भी बहुतों का अपहरण करने का लोभ न रोक सके। यद्यपि रहीम सर्वसाधरण में अपने दोहों के लिए ही प्रसिद्ध हैं, पर इन्होंने बरवै, कवित्त, सवैया, सोरठा, पद सब में थोड़ी बहुत रचना की है।

रहीम का देहावसान संवत् 1682 में हुआ। अब तक इनके निम्नलिखित ग्रंथ ही सुने जाते थे : रहीम दोहावली या सतसई, बरवै नायिका भेद, श्रृंगारसोरठ, मदनाष्टक, रासपंचाध्यायी। पर भरतपुर के श्रीयुत् पं. मयाशंकरजी याज्ञिक ने इनकी और भी रचनाओं का पता लगाया है, जैसे नगरशोभा, फुटकल बरवै, फुटकल कवित्त सवैये और रहीम का एक पूरा संग्रह ‘रहीम रत्नावली’ के नाम से निकाला है।

कहा जा चुका है कि ये कई भाषाओं और विद्याओं में पारंगत थे। इन्होंने फ़ारसी का एक दीवान भी बनाया था और ‘वाक़यात बाबरी’ का तुर्की से फ़ारसी में अनुवाद किया था। कुछ मिश्रित रचना भी इन्होंने की है,’रहीम काव्य’ हिन्दी संस्कृत की खिचड़ी है और ‘खेट कौतुकम्’ नामक ज्योतिष का ग्रंथ संस्कृत और फ़ारसी की खिचड़ी है। कुछ संस्कृत श्लोकों की रचना भी ये कर गए हैं। इनकी रचना के कुछ नमूने नीचे दिए जाते हैं,

(सतसई या दोहावली से)

दुरदिन परे रहीम कह भूलत सब पहिचानि।

सोच नहीं बित हानि को जौ न होय हित हानि

कोउ रहीम जनि काहु के द्वार गए पछिताय।

संपति के सब जात हैं, बिपति सबै लै जाय

ज्यों रहीम गति दीप की, कुल कपूत गति सोय।

बारे उजियारो लगै, बढ़े अंधोरो होय

सर सूखे पंछी उड़ै, औरै सरन समाहिं।

दीन मीन बिन पंख के, कहु रहीम कहँ जाहिं

माँगत मुकरि न को गयो, केहि न त्यागियो साथ।

माँगत आगे सुख लह्यो, ते रहीम रघुनाथ

रहिमन वे नर मर चुके, जे कहुँ माँगन जाहिं।

उनते पहिले वे मुए, जिन मुख निकसत ‘नाहिं’

रहिमन रहिला की भली, जौ परसै चितलाय।

परसत मन मैलो करै, सो मैदा जरि जाय

 

(बरवै नायिका भेद से)

भोरहिं बोलि कोइलिया बढ़वति ताप।

घरी एक भरि अलिया रहु चुपचाप

बाहर लैकै दियवा बारन जाइ।

सासु ननद घर पहुँचत देति बुझाइ

पिय आवत अंगनैया उठिकै लीन।

बिहँसत चतुर तिरियवा बैठक दीन

लै कै सुघर खुरपिया पिय के साथ।

छइबै एक छतरिया बरसत पाथ

पीतम इक सुमरिनियाँ मोहिं देइ जाहु।

जेहि जपि तोर बिरहवा करब निबाहु

 

(मदनाष्टक से)

कलित ललित माला वा जवाहिर जड़ा था।

चपल चखन वाला चाँदनी में खड़ा था।

कटितट बिच मेला पीत सेला नवेला।

अलि, बन अलबेला यार मेरा अकेला

 

(नगरशोभा से)

उत्तम जाति है बाह्मनी, देखत चित्त लुभाय।

परम पाप पल में हरत, परसत वाके पाय

रूपरंग रतिराज में, छतरानी इतरान।

मानौ रची बिरंचि पचि, कुसुम कनक में सान

बनियाइनि बनि आइकै, बैठि रूप की हाट।

पेम पेक तन हेरिकै, गरुवै टारति बाट

गरब तराजू करति चख, भौंह मोरि मुसकाति।

डाँड़ी मारति बिरह की, चित चिंता घटि जाति

 

(फुटकल कवित्त आदि से)

बड़न सो जान पहचान कै रहीम कहा,

जो पै करतार ही न सुख देनहार है।

सीतहर सूरज सों नेह कियो याहि हेत,

ताहू पै कमल जारि डारत तुषार है

छीरनिधि माहिं धाँस्यो संकर के सीस बस्यो,

तऊ ना कलंक लस्यो, ससि में सदा रहै

बड़ो रिझवार या चकोर दरबार है,

पै कलानिधि यार तऊ चाखत अंगार है

 

जाति हुती सखी गोहन में मनमोहन को लखि ही ललचानो।

नागरि नारि नई ब्रज की उनहूँ नंदलाल को रीझिबो जानो

जाति भई फिरि कै चितई तब भाव रहीम यहै उर आनो।

ज्यौं कमनैत दमानक में फिरि तीर सों मारि लै जात निसानो

 

कमलदल नैनन की उनमानि।

बिसरति नाहिं, सखी! मो मन तें मंद मंद मुसकानि।

बसुध की बसकरी मधुरता सुधपगी बतरानि

मढ़ी रहै चित उर बिसाल की मुकुतमाल थहरानि।

नृत्य समय पीतांबर हू की फहर फहर फहरानि

अनुदिन श्रीवृंदावन ब्रज तें आवन आवन जानि।

अब रहीम चित ते न टरति है सकल स्याम की बानि।।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण 6— सगुणधारा : टकल रचनाएं)

माता के नाम के प्रमाण में रहीम का यह दोहा कहा जाता है :

सुरतिय, नरतिय, नागतिय, सब चाहति अस होय।

गोद लिये हुलसी फिरैं, तुलसी सो सुत होय।।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण 4— सगुणधारा : रामभक्तिशाखा)

गोस्वामी जी के मित्रों और स्नेहियों में नवाब अब्दुर्रहीम खानखाना, महाराज मानसिंह, नाभाजी और मधुसूदन सरस्वती आदि कहे जाते हैं। ‘रहीम’ से इनसे समय समय पर दोहों में लिखा पढ़ी हुआ करती थी।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण 4— सगुणधारा : रामभक्तिशाखा)

अकबर की चाहे नीतिकुशलता कहिए, चाहे उदारता, उसने देश की परंपरागत संस्कृति में पूरा योग दिया जिससे कला के क्षेत्र में फिर से उत्साह का संचार हुआ। जो भारतीय कलावंत छोटे मोटे राजाओं के यहाँ किसी प्रकार अपना निर्वाह करते हुए संगीत को सहारा दिए हुए थे वे अब शाही दरबार में पहुँचकर वाह वाहकी ध्वनि के बीच अपना करतब दिखाने लगे। जहाँ बचे हुए हिंदू राजाओं की सभाओं में ही कविजन थोड़ा बहुत उत्साहित या पुरस्कृत किए जाते थे वहाँ अब बादशाह के दरबार में भी उनका सम्मान होने लगा। कवियों के सम्मान के साथ साथ कविता का सम्मान भी यहाँ तक बढ़ा कि अब्दुर्रहीम खानखाना ऐसे उच्चपदस्थ सरदार क्या बादशाह तक ब्रजभाषा की ऐसी कविता करने लगे :

जाको जस है जगत में, जगत सराहै जाहि।

ताको जीवन सफल है, कहत अकब्बर साहि।।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण 6— सगुणधारा : टकल रचनाएं)

ये (गंग) अकबर के दरबारी कवि थे और रहीम खानखाना इन्हें बहुत मानते थे।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण 6— सगुणधारा : टकल रचनाएं)

कहते हैं कि रहीम खानखाना ने इन्हें एक छप्पय पर छत्ताीस लाख रुपये दे डाले थे। वह छप्पय यह है,

चकित भँवर रहि गयो गमन नहिं करत कमलवन।

अहि फन मनि नहिं लेत, तेज नहिं बहत पवन घन

हंस मानसर तज्यो चक्क चक्की न मिलै अति।

बहु सुंदरि पद्मिनी पुरुष न चहै, न करै रति

खलभलित सेस कवि गंग भन, अमित तेज रविरथ खस्यो।

खानान खान बैरम सुवन जबहिं क्रोध करि तंग कस्यो।।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण 6— सगुणधारा : टकल रचनाएं)

इनका (यशोदानंदन का) एक छोटासा ग्रंथ बरवै नायिका भेदही मिलता है जो निस्संदेह अनूठा है और रहीम वाले से अच्छा नहीं तो उसकी टक्कर का है।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, रीतिकाल : प्रकरण 2— सगुणधारा : रीतिग्रंथकार कवि)