पं. अयोध्यासिंहजी उपाधयाय ‘हरिऔध’ : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

 

पं. अयोध्यासिंहजी उपाधयाय हरिऔध : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

कवि के रूप में

पं. अयोध्यासिंहजी उपाधयाय (हरिऔध) : भारतेंदु के पीछे और द्वितीय उत्थान के पहले ही हिन्दी के लब्धाप्रतिष्ठ कवि पं. अयोध्यासिंह उपाधयाय (हरिऔध) नए विषयों की ओर चल पड़े थे। खड़ी बोली के लिए उन्होंने पहले उर्दू के छंदों और ठेठ बोली को ही उपयुक्त समझा, क्योंकि उर्दू के छंदों में खड़ी बोली अच्छी तरह मँज चुकी थी। संवत् 1957 के पहले ही वे बहुत सी फुटकल रचनाएँ इस उर्दू ढंग पर कर चुके थे। नागरीप्रचारिणी सभा के गृह प्रवेशोत्सव के समय संवत् 1957 में उन्होंने जो कविता पढ़ी थी, उसके ये चरण मुझे अब तक याद हैं,

चार डग हमने भरे तो क्या किया।

है पड़ा मैदान कोसों का अभी

मौलवी ऐसा न होगा एक भी।

खूब उर्दू जो न होवे जानता

इसके उपरांत तो वे बराबर इसी ढंग की कविता करते रहे। जब पं. महावीर प्रसाद द्विवेदीजी के प्रभाव से खड़ी बोली ने संस्कृत छंदों और संस्कृत की समस्त पदावली का सहारा लिया, तब उपाधयायजी, जो गद्य में अपनी भाषासंबंधिनी पटुता उसे दो हदों पर पहुँचा कर दिखा चुके थे, उस शैली की ओर भी बढ़े और संवत् 1971 में उन्होंने अपना प्रियप्रवासनामक बहुत बड़ा काव्य प्रकाशित किया।

नवशिक्षितों के संसर्ग से उपाधयायजी ने लोक संग्रह का भाव अधिक ग्रहण किया है। उक्त काव्य में श्रीकृष्ण ब्रज के रक्षक नेता के रूप में अंकित किए गए हैं। खड़ी बोली में इतना बड़ा काव्य अभी तक नहीं निकला है। बड़ी भारी विशेषता इस काव्य की यह है कि यह सारा संस्कृत के वर्णवृत्तों में है जिसमें अधिक परिमाण में रचना करना कठिन काम है। उपाधयायजी का संस्कृत पदविन्यास अनेक उपसर्गों से लदा तथा मंजु‘, ‘मंजुल‘, ‘पेशलआदि से बीच बीच में जटिल अर्थात् चुना हुआ होता है। द्विवेदीजी और उनके अनुयायी कवि वर्ग की रचनाओं से उपाधयायजी की रचना इस बात में साफ़ अलग दिखाई पड़ती है। उपाधयायजी कोमलकांत पदावली को कविता का सब कुछ नहीं तो बहुत कुछ समझते हैं। यद्यपि द्विवेदीजी अपने अनुयायियों के सहित जब इस संस्कृत वृत्त के मार्ग पर बहुत दूर तक चल चुके थे, तब उपाधयायजी उसपर आए, पर वे बिल्कुल अपने ढंग पर चले। किसी प्रकार की रचना को हद पर, चाहे उस हद तक जाना अधिकतर लोगों को इष्ट न हो,  पहुँचाकर दिखाने की प्रवृत्ति के अनुसार उपाधयायजी ने अपने इस काव्य में कई जगह संस्कृत शब्दों की ऐसी लंबी लड़ी बाँधी है कि हिन्दी को है‘, ‘था‘, ‘किया‘, ‘दियाऐसी दो एक क्रियाओं के भीतर ही सिमट कर रह जाना पड़ा है। पर सर्वत्र यह बात नहीं है। अधिकतर पदों में बड़े ढंग से हिन्दी अपनी चाल पर चली चलती दिखाई पड़ती है।

यह काव्य अधिकतर भावव्यंजनात्मक और वर्णनात्मक है। कृष्ण के चले जाने पर ब्रज की दशा का वर्णन बहुत अच्छा है। विरह वेदना से क्षुब्ध वचनावली प्रेम की अनेक अंतर्दशाओं की व्यंजना करती हुई बहुत दूर तक चली चलती है। जैसा कि इसके नाम से प्रकट हैइसकी कथावस्तु एक महाकाव्य क्या अच्छे प्रबंधकाव्य के लिए भी अपर्याप्त है। अत: प्रबंधकाव्य के सब अवयव इसमें कहाँ आ सकतेकिसी के वियोग में कैसी कैसी बातें मन में उठती हैं और क्या कहकर लोग रोते हैंइसका जहाँ तक विस्तार हो सका हैकिया गया है। परंपरापालन के लिए जो दृश्यवर्णन हैं वे किसी बगीचे में लगे हुए पेड़ पौधों के नाम गिनने के समान हैं। इसी से शायद करील का नाम छूट गया।

दो प्रकार के नमूने उद्धृत करके हम आगे बढ़ते हैं,

रूपोद्यान प्रफुल्लप्राय कलिका राकेंदुबिंबानना।

तन्वंगी कलहासिनी सुरसिका क्रीड़ाकलापुत्ताली

शोभावारिधि की अमूल्य मणि सी लावण्यलीलामयी।

श्रीराधा मृदुभाषिणी मृगदृगी माधुर्यसन्मूर्ति थी

 

धीरे धीरे दिन गत हुआ; पद्मिनीनाथ डूबे।

आयी दोष, फिर गत हुई, दूसरा वार आया

यों ही बीती बिपुल घटिका औ कई वार बीते।

आया कोई न मधुपुर से औ न गोपाल आए।

इस काव्य के उपरांत उपाधयायजी का ध्यान फिर बोलचाल की ओर गया। इस बार उनका मुहावरों पर अधिक जोर रहा। बोलचाल की भाषा में अनेक फुटकल विषयों पर उन्होंने कविताएँ रची जिनकी प्रत्येक पंक्ति में कोई न कोई मुहावरा अवश्य खपाया गया। ऐसी कविताओं का संग्रह चोखे चौपदे‘ (संवत् 1981) में निकला। पद्यप्रसून (1982) में भाषा दोनों प्रकार की है, बोलचाल की भी और साहित्यिक भी। मुहावरों के नमूने के लिए चोखेचौपदेका एक पद्य दिया जा रहा है,

क्यों पले पीस कर किसी को तू?

है बहुत पालिसी बुरी तेरी

हम रहे चाहते पटाना ही;

पेट तुझसे पटी नहीं मेरी

भाषा के दोनों नमूने ऊपर हैं। यही द्विकलात्मक कला उपाधयायजी की बड़ी विशेषता है। इससे शब्दभंडार पर इनका विस्तृत अधिकार प्रकट होता है। इनका एक और बड़ा काव्य है, वैदेही वनवासजिसे ये बहुत दिनों से लिखते चले आ रहे थे, अब छप रहा है।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल, प्रकरण 3—काव्यखंड : नई धारा : द्वितीय उत्थान)

यद्यपि उपाध्यायजी इस समय खड़ी बोली के और आधुनिक विषयों के ही कवि प्रसिद्ध हैं, पर प्रारंभकाल में वे भी पुराने ढंग की श्रृंगारी कविता बहुत सुंदर ओर सरस करते थे। इनके निवासस्थान निज़ामाबाद में सिख संप्रदाय के महंत सुमेरसिंहजी हिंदी काव्य के बड़े प्रेमी थे। उनके यहां प्रायः कवि समाज एकत्र हुआ करता था, जिसमें उपाध्यायजी भी अपनी पूर्तियां पढ़ा करते थे। इनका ‘हरिऔध’ नाम उसी समय का है। इनकी पुराने ढंग की कविताएं रसकलश में संग्रहित हैं जिसमें इन्होंने नायिकाओं के कुछ नए ढंग के भेद रखने का प्रयत्न किया है। ये भेद रससिद्धांत के अनुसार ठीक नहीं उतरते।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 1—काव्यखंड : पुरानी धारा : अन्य कवि)

नाटककार के रूप में

हिन्दी के विख्यात कवि पं. अयोध्यासिंह उपाधयाय की प्रवृत्ति इस द्वितीय उत्थान के आरंभ में नाटक लिखने की ओर भी हुई थी और उन्होंने रुक्मिणीपरिणयऔर प्रद्युम्नविजय व्यायोगनाम के दो नाटक लिखे थे। ये दोनों नाटक उपाधयायजी ने हाथ आजमाने के लिए लिखे थे। आगे उन्होंने इस ओर कोई प्रयत्न नहीं किया।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 4—गद्य का प्रसार : मौलिक नाटक)

उपन्यासकार के रूप में

प्रसिद्ध  कवि और गद्य लेखक पं. अयोध्यासिंह उपाधयाय ने भी दो उपन्यास ठेठ हिन्दी में लिखे —ठेठ हिन्दी का ठाठ‘ (संवत् 1956) और अधाखिला फूल‘ (संवत् 1964) पर ये दोनों पुस्तकें भाषा के नमूने की दृष्टि से लिखी गईं, औपन्यासिक कौशल की दृष्टि से नहीं। उनकी सबसे पहले लिखी पुस्तक वेनिस का बाँकामें जैसे भाषा संस्कृतपन की सीमा पर पहुँची हुई थी वैसे ही इन दोनों में ठेठपन की हद दिखाई देती है। इन तीनों पुस्तकों को सामने रखने पर पहला ख्याल यही पैदा होता है कि उपाधयायजी क्लिष्ट, संस्कृतप्राय भाषा भी लिख सकते हैं और सरल ठेठ हिन्दी भी। अधिकतर इसी भाषावैचित्रय पर ख्याल जमकर रह जाता है।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 4—गद्य का प्रसार : छोटी कहानियां)

समीक्षक के रूप में

अयोध्यासिंह उपाधयाय की कबीर समीक्षा उनके द्वारा संग्रहीत कबीर वचनावलीके साथ और डॉ. पीतांबरदत्ता बड़थ्वाल की कबीर ग्रंथावलीके साथ भूमिका रूप में सन्निविष्ट है।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल : प्रकरण 5—गद्य की वर्तमान गति : समालोचना)