भिखारादास : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

भिखारादास : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

दास (भिखारी दास) : ये प्रतापगढ़ (अवध) के पास टयोंगा गाँव के रहने वाले श्रीवास्तव कायस्थ थे। इन्होंने अपना वंशपरिचय पूरा दिया है। इनके पिता कृपालदास, पितामह वीरभानु, प्रपितामह राय रामदास और वृद्ध प्रपितामह राय नरोत्ताम दास थे। दासजी के पुत्र अवधेश लाल और पौत्र गौरीशंकर थे जिनके अपुत्र मर जाने से वंशपरंपरा खंडित हो गई। दासजी के इतने ग्रंथों का पता लग चुका है :

रससारांश (संवत् 1799), छंदार्णव पिंगल (संवत् 1799), काव्यनिर्णय (संवत् 1803), श्रृंगारनिर्णय (संवत् 1807), नामप्रकाश कोश (संवत् 1795), विष्णुपुराण भाषा (दोहे चौपाई में), छंद प्रकाश, शतरंजशतिका, अमरप्रकाश (संस्कृत अमरकोष भाषा पद्य में)।

#’काव्यनिर्णय’ में दासजी ने प्रतापगढ़ के सोमवंशी राजा पृथ्वीसिंह के भाई बाबू हिंदूपतिसिंह को अपना आश्रयदाता लिखा है। राजा पृथ्वीपति संवत् 1791 में गद्दी पर बैठे थे और 1807 में दिल्ली के वजीर सफदरजंग द्वारा छल से मारे गए थे। ऐसा जान पड़ता है कि संवत् 1807 के बाद इन्होंने कोई ग्रंथ नहीं लिखा। अत: इनका कविताकाल संवत् 1785 से लेकर संवत् 1807 तक माना जा सकता है।

#काव्यांगों के निरूपण में दासजी को सर्वप्रधान स्थान दिया जाता है क्योंकि इन्होंने छंद, रस, अलंकार, रीति, गुण, दोष शब्दशक्ति आदि सब विषयों का औरों से विस्तृत प्रतिपादन किया है। ….. श्रीपति से इन्होंने बहुत कुछ लिया है। #इनकी विषयप्रतिपादन शैली उत्तम है और आलोचनशक्ति भी इनमें कुछ पाई जाती है; जैसे हिन्दी काव्यक्षेत्र में इन्हें परकीया के प्रेम की प्रचुरता दिखाई पड़ी, जो रस की दृष्टि से रसाभास के अंतर्गत आता है। बहुत से स्थलों पर तो राधकृष्ण का नाम आने से देवकाव्य का आरोप हो जाता है और दोष का कुछ परिहार हो जाता है, पर सर्वत्र ऐसा नहीं होता। इससे दासजी ने स्वकीया का लक्षण ही कुछ अधिक व्यापक करना चाहा और कहा :

श्रीमाननि के भौन में भोग्य भामिनी और।

तिनहूँ को सुकियाह में गनैं सुकवि सिरमौर

पर यह कोई बड़े महत्व की उद्भावना नहीं कही जा सकती है। जो लोग दासजी के दस और हावों के नाम लेने पर चौंके हैं उन्हें जानना चाहिए कि #‘साहित्यदर्पण’ में नायिकाओं के स्वभावज अलंकार 18 कहे गए हैं, लीला, विलास, विच्छित्तिा, विव्वोक, किलकिंचित, मोट्टायित्ता, कुट्टमित्ता, विभ्रम, ललित, विहृत, मद, तपन, मौग्धय, विक्षेप, कुतूहल, हसित, चकित और केलि। इनमें से अंतिम आठ को लेकर यदि दासजी ने भाषा में प्रचलित दस हावों में जोड़ दिया तो क्या नई बात की? यह चौंकना तब तक बना रहेगा जब तक हिन्दी में संस्कृत के मुख्य सिद्धांत ग्रंथों के सब विषयों का यथावत् समावेश न हो जाएगा और साहित्यशास्त्र का सम्यक् अध्ययन न होगा।

अत: दासजी के आचार्यत्व के संबंध में भी हमारा यही कथन है जो देव आदि के विषय में। #यद्यपि इस क्षेत्र में औरों को देखते दासजी ने अधिक काम किया है, पर सच्चे आचार्य का पूरा रूप इन्हें भी प्राप्त नहीं हो सका है। परिस्थिति से ये भी लाचार थे। इनके लक्षण भी व्याख्या के बिना अपर्याप्त और कहीं कहीं भ्रामक हैं और उदाहरण भी कुछ स्थलों पर अशुद्ध हैं। जैसे उपादान लक्षणा लीजिए। इसका लक्षण भी गड़बड़ है और उसी के अनुरूप उदाहरण भी अशुद्ध है। अत: #दासजी भी औरों के समान वस्तुत: कवि के रूप में ही हमारे सामने आते हैं।

दासजी ने साहित्यिक और परिमार्जित भाषा का व्यवहार किया है। श्रृंगार ही उस समय का मुख्य विषय रहा है। अत: इन्होंने भी उसका वर्णन विस्तार देव की तरह बढ़ाया है। #देव ने भिन्न भिन्न देशों और जातियों की स्त्रियों के वर्णन के लिए जाति विलास लिखा, जिसमें नाइन, धेबिन, सब आ गईं, पर दास जी ने रसाभाव के डर से या मर्यादा के ध्यान से इनको आलंबन के रूप में न रखकर दूती के रूप में रखा है। #इनके ‘रससारांश’ में नाइन, नटिन, धेबिन, कुम्हारिन, बरइन, सब प्रकार की दूतियाँ मौजूद हैं। इनमें देव की अपेक्षा अधिक रसविवेक था। #इनका श्रृंगारनिर्णय अपने ढंग का अनूठा काव्य है। उदाहरण मनोहर और सरस है। भाषा में शब्दाडंबर नहीं है। न ये शब्द चमत्कार पर टूटे हैं, न दूर की सूझ के लिए व्याकुल हुए हैं। #इनकी रचना कलापक्ष में संयत और भावपक्ष में रंजनकारिणी है। विशुद्ध काव्य के अतिरिक्त इन्होंने नीति की सूक्तियाँ भी बहुत सी कही हैं जिनमें उक्तिवैचित्र्य अपेक्षित होता है। देव की सी ऊँची आकांक्षा या कल्पना जिस प्रकार इनमें कम पाई जाती है उसी प्रकार उनकी सी असफलता भी कहीं नहीं मिलती। #

जिस बात को ये जिस ढंग से, चाहे वह ढंग बहुत विलक्षण न हो, कहना चाहते थे उस बात को उस ढंग से कहने की पूरी सामर्थ्य इनमें थी। दासजी ऊँचे दरजे के कवि थे। इनकी कविता के कुछ नमूने लीजिए :

वाही घरी तें न सान रहै, न गुमान रहै, न रहै सुघराई।

दास न लाज को साज रहै न रहै तनकौ घरकाज की घाई

ह्याँ दिखसाध निवारे रहौ तब ही लौ भटू सब भाँति भलाई।

देखत कान्हैं न चेत रहै, नहिं चित्त रहै, न रहै चतुराई

 

#नैनन को तरसैए कहाँ लौं, कहाँ लौ हियो बिरहागि मै तैए।

एक घरी न कहूँ कल पैए, कहाँ लगि प्रानन को कलपैए?

#आवै यही अब जी में बिचार सखी चलि सौति हुँ, कै घर जैए।

मान घटै ते कहा घटि है जु पै प्रानपियारे को देखन पैए

 

ऊधे! तहाँई चलौ लै हमें जहँ कूबरि कान्ह बसैं एक ठौरी।

देखिए दास अघाय अघाय तिहारे प्रसाद मनोहर जोरी

कूबरी सों कछु पाइए मंत्र, लगाइए कान्ह सों प्रीति की डोरी।

कूबरिभक्ति बढ़ाइए बंदि, चढ़ाइए चंदन बंदन रोरी

 

कढ़ि कै निसंक पैठि जाति झुंड झुंडन में,

लोगन को देखि दास आनंद पगति है।

दौरि दौरि जहीं तहीं लाल करि डारति है,

अंक लगि कंठ लगिबे को उमगति है

चमक झमक वारी, ठमक जमक वारी,

रमक तमक वारी जाहिर जगति है।

राम! असि रावरे की रन में नरन में,

निलज बनिता सी होरी खेलन लगति है

 

अब तो बिहारी के वे बानक गए री, तेरी

तन दूति केसर को नैन कसमीर भो।

श्रौन तुव बानी स्वाति बूँदन के चातक भे,

साँसन को भरिबो दु्रपदजा को चीर भो

हिय को हरष मरु धरनि को नीर भो, री!

जियरो मनोभव सरन को तुनीर भो।

एरी! बेगि करि कैं मिलापु थिर थापु, न तौ

आपु अब चहत अतनु को सरीर भो

 

अंखियाँ हमारी दईमारी सुधि बुधि हारीं,

मोहूँ तें जु न्यारी दास रहै सब काल में।

कौन गहै ज्ञानै, काहि सौंपत सयाने, कौन

लोक ओक जानै, ये नहीं हैं निज हाल में

प्रेम पगि रही, महामोह में उमगि रहीं,

ठीक ठगि रहीं, लगि रहीं बनमाल में।

लाज को अंचै कै, कुलधरम पचै कै, वृथा

बंधन सँचै कै भई मगन गोपाल में

(हिंदी साहित्य का इतिहास : रीतिकाल : प्रकरण-2 : रीतिग्रंथकार कवि)

ब्रजभाषा में रीतिग्रंथ लिखनेवाले चिंतामणि, भूषण, मतिराम, दास (भिखारीदास) इत्यादि अधिकतर कवि अवध के थे और ब्रजभाषा के सर्वमान्य कवि माने जाते हैं। #दास जी ने तो स्पष्ट व्यवस्था ही दी है कि ‘ब्रजभाषा हेतु ब्रजवास ही न अनुमानौ’।

(हिंदी साहित्य का इतिहास : भक्तिकाल : प्रकरण-4 : सगुणधरा : रामभक्ति शाखा)

दासजी (भिखारीदास) ने कहा है :

#तुलसी गंग दुवौ भए सुकविन के सरदार।

(हिंदी साहित्य का इतिहास : भक्तिकाल : प्रकरण-4 : सगुणधरा : रामभक्ति शाखा)

#काव्यांगों का विस्तृत समावेश दास जी ने अपने ‘काव्यनिर्णय’ में किया है। अलंकारों को जिस प्रकार उन्होंने बहुत से छोटे छोटे प्रकरणों में बाँटकर रखा है उससे भ्रम हो सकता है कि शायद किसी आधर पर उन्होंने अलंकारों का वर्गीकरण किया है। पर वास्तव में उन्होंने किसी प्रकार के वर्गीकरण का प्रयत्न नहीं किया है। दासजी की एक नई योजना अवश्य ध्यान देने योग्य है। संस्कृत काव्य में अंत्यानुप्रास या तुक का चलन नहीं था, इससे संस्कृत के साहित्यग्रंथों में उसका विचार नहीं हुआ है। पर हिन्दी काव्य में वह बराबर आरंभ से ही मिलता है। अत: दासजी ने अपनी पुस्तक में उसका विचार करके बड़ा ही आवश्यक कार्य किया।…..दासजी के ‘अतिशयोक्ति’ के पाँच नए दिखाई पड़नेवाले भेदों में से चार तो भेदों के भिन्न भिन्न योग हैं। पाँचवाँ ‘संभावनातिशयोक्ति’ तो संबंधतिशयोक्ति ही है।

(हिंदी साहित्य का इतिहास : रीतिकाल : प्रकरण-1 : सामान्य परिचय)

दासजी ने अपने ‘काव्यनिर्णय’ में काव्यभाषा पर भी कुछ दृष्टिपात किया। मिश्रित भाषा के समर्थन में वे कहते हैं :

ब्रजभाषा भाषा रुचिर कहैं सुमति सब कोइ

मिल संस्कृत पारस्यौ पै अति प्रगट जु होइ

ब्रज मागधी मिलै अमर, नाग यवन भाखानि

सहज पारसी हू मिलै, षट विधि कहत बखानि

उक्त दोहों में ‘मागधी’ शब्द से पूरबी भाषा का अभिप्राय है। अवधी अर्द्धमागधी से निकली मानी जाती है और पूरबी हिन्दी के अंतर्गत है। ज़बाँदानी के लिए ब्रज का निवास आवश्यक नहीं है, आप्त कवियों की वाणी भी प्रमाण है, इस बात को दासजी ने स्पष्ट कहा है :

सूर, केशव, मंडन, बिहारी, कालिदास, ब्रह्म,

चिंतामणि, मतिराम, भूषन सु जानिए

लीलावर, सेनापति, निपट नेवाज, निधि,

नीलकंठ, मिश्र सुखदेव, देव मानिए

आलम, रहीम, रसखान, सुंदरादिक,

अनेकन सुमति भए कहाँ लौ बखानिए

#ब्रजभाषा हेत ब्रजवास ही न अनुमानौ,

ऐसे-ऐसे कविन की बानी हू सों जानिए

मिली-जुली भाषा के प्रमाण में दासजी कहते हैं कि तुलसी और गंग तक ने, जो कवियों के शिरोमणि हुए हैं, ऐसी भाषा का व्यवहार किया है :

#तुलसी गंग दुवौ भए, सुकविन के सरदार।

इनके काव्यन में मिली, भाषा विविध प्रकार

इस सीधे सादे दोहे का जो यह अर्थ लें कि तुलसी और गंग इसीलिए कवियों के सरदार हुए कि उनके काव्यों में विविध प्रकार की भाषा मिली है, उनकी समझ को क्या कहा जाय?

दासजी ने काव्यभाषा के स्वरूप का जो निर्णय किया वह कोई 100 वर्षों की काव्यपरंपरा के पर्यालोचन के उपरांत। अत: उनका स्वरूप निरूपण तो बहुत ठीक है। उन्होंने काव्यभाषा ब्रजभाषा ही कही है जिसमें और भाषाओं के शब्दों का भी मेल हो सकता है। पर भाषा संबंधी और अधिक मीमांसा न होने के कारण कवियों ने अपने को अन्य बोलियों के शब्दों तक ही परिमित नहीं रखा; उनके कारक चिह्नों और क्रिया के रूपों का भी वे मनमाना व्यवहार बराबर करते रहे। ऐसा वे केवल सौंदर्य की दृष्टि से करते थे, किसी सिद्धांत के अनुसार नहीं। ‘करना’ के भूतकाल के लिए वे छंद की आवश्यकता के अनुसार ‘कियो’, ‘कीनो’, ‘करयो’, ‘करियो’, ‘कीन’ यहाँ तक कि ‘किय’ तक रखने लगे। इसका परिणाम यह हुआ कि भाषा को वह स्थिरता न प्राप्त हो सकी जो किसी साहित्यिक भाषा के लिए आवश्यक है। रूपों के स्थिर न होने से यदि कोई विदेशी काव्य की ब्रजभाषा का अध्ययन करना चाहे तो उसे कितनी कठिनता होगी।

(हिंदी साहित्य का इतिहास : रीतिकाल : प्रकरण-1 : सामान्य परिचय)

#दासजी (भिखारीदासजी) तो इनके (श्रीपति के) बहुत अधिक ऋणी हैं। उन्होंने इनकी बहुत सी बातें ज्यों की त्यों अपने र’काव्यनिर्णय’ में चुपचाप रख ली हैं।

(हिंदी साहित्य का इतिहास : रीतिकाल : प्रकरण-2 : रीतिग्रंथकार कवि)

यह (सोमनाथकृत रसपीयूषनिधि, सं. 1714) दास जी के ‘काव्यनिर्णय’ से बड़ा ग्रंथ है। काव्यांगनिरूपण में ये (सोमनाथ) श्रीपति और दास के समान ही हैं।

(हिंदी साहित्य का इतिहास : रीतिकाल : प्रकरण-2 : रीतिग्रंथकार कवि)

देव, दास, मतिराम आदि के साथ दूलह का भी नाम लिया जाता है।

(हिंदी साहित्य का इतिहास : रीतिकाल : प्रकरण-2 : रीतिग्रंथकार कवि)

आचार्यत्व में इनका (प्रतापसाहि का) नाम मतिराम, श्रीपति और दास के साथ आता है और एक दृष्टि से इन्होंने उनके चलाए हुए कार्य को पूर्णता को पहुँचाया था।

(हिंदी साहित्य का इतिहास : रीतिकाल : प्रकरण-2 : रीतिग्रंथकार कवि)