नाभादास : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

नाभादास : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

नाभादास जी अग्रदास जी के शिष्य, बड़े भक्त और साधुसेवी थे। संवत् 1657 के लगभग वर्तमान थे और गोस्वामी तुलसीदास जी की मृत्यु के बहुत पीछे तक जीवित रहे। इनका प्रसिद्ध ग्रंथ भक्तमाल संवत् 1642 के पीछे बना और संवत् 1769 में प्रियादास जी ने उसकी टीका लिखी। इस ग्रंथ में 200 भक्तों के चमत्कारपूर्ण चरित्र 316 छप्पयों में लिखे गए हैं। इन चरित्रों में पूर्ण जीवनवृत्त नहीं है, केवल भक्ति की महिमासूचक बातें दी गई हैं। इनका उद्देश्य भक्तों के प्रति जनता में पूज्यबुद्धि का प्रचार जान पड़ता है। यह उद्देश्य बहुत अंशों में सिद्ध भी हुआ। आज उत्तरी भारत के गाँव गाँव में साधुवेषधारी पुरुषों को शास्त्रज्ञ विद्वानों और पंडितों से कहीं बढ़कर जो सम्मान और पूजा प्राप्त है, वह बहुत कुछ भक्तों की करामातों और चमत्कारपूर्ण वृत्तांतों के सम्यक् प्रचार से।

नाभा जी को कुछ लोग डोम बताते हैं, कुछ क्षत्रिय। ऐसा प्रसिद्ध है कि वे एक बार गोस्वामी तुलसीदास जी से मिलने काशी गए। पर उस समय गोस्वामी जी ध्यान में थे, इससे न मिल सके। नाभा जी उसी दिन वृंदावन चले गए। ध्यान भंग होने पर गोस्वामी जी को बड़ा खेद हुआ और वे तुरंत नाभा जी से मिलने वृंदावन चल दिए। नाभा जी के यहाँ वैष्णवों का भंडारा था जिसमें गोस्वामी जी बिना बुलाए जा पहुँचे। गोस्वामी जी यह समझकर कि नाभा जी ने मुझे अभिमानी न समझा हो, सबसे दूर एक किनारे बुरी जगह बैठ गए। नाभा जी ने जान बूझकर उनकी ओर ध्यान न दिया। परसने के समय कोई पात्र न मिलता था जिसमें गोस्वामी जी को खीर दी जाती। यह देखकर गोस्वामी जी एक साधु का जूता उठा लाए और बोले, ‘इससे सुंदर पात्र मेरे लिए और क्या होगा?’ इस पर नाभा जी ने उठकर उन्हें गले लगा लिया और गद्गद हो गए। ऐसा कहा जाता है कि तुलसी संबंधी अपने प्रसिद्ध छप्पय के अंत में पहले नाभा जी ने कुछ चिढ़कर यह चरण रखा था ‘कलि कुटिल जीव तुलसी भए, वाल्मीकि अवतार धारि।’ यह वृत्तांत कहाँ तक ठीक है, नहीं कहा जा सकता, क्योंकि गोस्वामी जी खानपान का विचार रखने वाले स्मार्त वैष्णव थे। तुलसीदास जी के संबंध में नाभा जी का प्रसिद्ध छप्पय यह है

त्रेता काव्य निबंध करी सत कोटि रमायन।

इक अच्छर उच्चरे ब्रह्महत्यादि परायन

अब भक्तन सुख दैन बहुरि लीला बिस्तारी।

रामचरनरसमत्ता रहत अहनिसि व्रतधारी

संसार अपार के पार को सुगम रूप नौका लियो।

कलि कुटिल जीव निस्तारहित वाल्मीकि तुलसी भयो

अपने गुरु अग्रदास के समान इन्होंने भी रामभक्ति संबंधी कविता की है। ब्रजभाषा पर इनका अच्छा अधिकार था और पद्य रचना में अच्छी निपुणता थी। रामचरित संबंधी इनके पदों का एक छोटा सा संग्रह अभी थोड़े दिन हुए प्राप्त हुआ है।

इन पुस्तकों के अतिरिक्त इन्होंने दो ‘अष्टयाम’ भी बनाए एक ब्रजभाषा गद्य में, दूसरा रामचरितमानस की शैली पर दोहा चौपाइयों में। दोनों के उदाहरण नीचे दिए जाते हैं

गद्य

तब श्री महाराजकुमार प्रथम श्री वशिष्ठ महाराज के चरन छुइ प्रनाम करत भए। फिरि अपर वृद्ध समाज तिनको प्रनाम करत भए। फिरि श्री राजाधिराज जू को जोहार करिके श्री महेंद्रनाथ दशरथ जू के निकट बैठत भए।

पद्य

अवधपुरी की शोभा जैसी । कहि नहिं सकहिं शेष श्रुति तैसी

रचित कोट कलधौत सुहावन । बिबिधा रंग मति अति मन भावन

चहुँ दिसि विपिन प्रमोदअनूपा । चतुरवीस जोजन रस रूपा

सुदिसि नगर सरजूसरिपावनि । मनिमय तीरथ परम सुहावनि

बिगसे जलज भृंग रस भूले । गुंजत जल समूह दोउ कूले

परिखा प्रति चहुँदिसि लसति, कंचन कोट प्रकास।

बिबिधा भाँति नग जगमगत, प्रति गोपुर पुर पास

(हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल प्रकरण-4 सगुणधारा रामभक्ति शाखा)

इन्होंने (नाभादास जी) भी संवत् 1660 के आसपास ‘अष्टयाम’ नामक एक पुस्तक ब्रजभाषा में लिखी जिसमें भगवान राम की दिनचर्या का वर्णन है। भाषा इस ढंग की है ,

तब श्री महाराज कुमार प्रथम वसिष्ठ महाराज के चरण छुइ प्रनाम करत भए। फिर ऊपर वृद्ध समाज तिनको प्रनाम करत भए। फिर श्री राजाधिराज जू को जोहार करिकै श्री महेंद्रनाथ दशरथ जू निकट बैठते भए।

(आधुनिककाल प्रकरण-1 गद्य का विकास ब्रजभाषा गद्य)

गोस्वामी जी के मित्रों और स्नेहियों में नवाब अब्दुर्रहीम खानखाना, महाराज मानसिंह, नाभाजी और मधुसूदन सरस्वती आदि कहे जाते हैं। (हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल प्रकरण-4 सगुण भक्तिधारा रामभक्ति शाखा)

अग्रदासजी के शिष्य भक्तमाल के रचयिता प्रसिद्ध नाभादासजी थे। (हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल प्रकरण-4 सगुण भक्तिधारा रामभक्तिशाखा)

नाभा जी के भक्तमाल में इन (नंददास) पर जो छप्पय है उसमें जीवन के संबंध में इतना ही है

चंद्रहास अग्रज सुहृद परम प्रेम पथ में पगे।

(हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल प्रकरण-4 सगुण भक्तिधारा रामभक्तिशाखा)

मीराबाई का नाम भारत के प्रधान भक्तों में है और इनका गुणगान नाभाजी, ध्रुवदास, व्यास जी, मलूकदास आदि सब भक्तों ने किया है। (हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल प्रकरण-5 सगुणधारा कृष्णभक्ति शाखा)

नाभा जी के भक्तमाल के अनुकरण पर इन्होंने (ध्रुवदासजी ने) ‘भक्तनामावली’ लिखी है जिसमें अपने समय तक के भक्तों का उल्लेख किया है। (हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल प्रकरण-5 सगुणधारा कृष्णभक्ति शाखा)