पश्चिम और कबीर/Pashchim aur Kabir by Dr. Rajender Prasad Singh

 

  • पश्चिम और कबीर/Pashchim aur Kabir by Dr. Rajender Prasad Singh

मनीष रंजन साहब ने अपने फेसबुक वॉल पर डॉ राजेंद्र प्रसाद जी का ‘पश्चिम और कबीर’ आलेख लगाया है।
उनकेे सौजन्य से ‘हिंदी साहित्य विमर्श’ में यह आलेख साभार प्रस्तुत है :

पश्चिम के देशों में कबीर को जानने की आग सबसे पहले इटैलियन भाषा में लगी। इटली के मार्को डेला टोम्बा ( 1726 – 1803 ) ने कबीर के ज्ञानसागर को इटैलियन भाषा में अनुवाद किया। वह साल 1758 था।

मार्को डेला टोम्बा के अधिकांश जीवन बिहार के बेतिया और पटना में बीते तथा आखिरकार भागलपुर में मृत्यु हुई।

फिर यह आग इंग्लैंड और फ्रांस तक फैल गई और जर्मनी भी अछूता नहीं रहा।

जहाँ एक ओर कैप्टन डब्ल्यू. प्राइस ( 1780 – 1830 ) ने बीजक में पाया जाने वाला गोरखनाथ से कबीर के वार्तालाप को अपनी पुस्तक ” हिंदू एंड हिंदुस्तानी सिलेक्शन्स ” में संकलित किया, वहीं दूसरी ओर जनरल हैरियट ने ” ए मेम्वार आॅन दि कबीरपंथी ” में कबीर की कुछ कविताओं का अनुवाद फ्रेंच में प्रस्तुत किया।

जनरल हैरियट ( 1780- 1839 ) ब्रिटिश सेना के आॅफिसर थे। दिल्ली की लड़ाई ( 1803 ) में वे अपना एक पैर गँवा बैठे थे। फिर भी उन्होंने 1832 में कबीर को फ्रेंच में अनूदित किए।

मगर कबीर पर पहला वैज्ञानिक अनुशीलन करने का श्रेय एच. एच. विल्सन को है। विल्सन ( 1786- 1860 ) अंग्रेज प्राच्यविद् तथा मूल रूप से सर्जन थे। कोलब्रुक की अनुशंसा पर वे 1811 में एशियाटिक सोसाइटी आॅफ बंगाल के सचिव हुए। उनका अध्ययन पहली बार हिंदू सेक्ट्स के नाम से एशियाटिक रिसर्चेज में 1828 तथा 1832 में छपा।

वह उन्नीसवीं सदी का पूर्वाद्ध का दौर था। गार्सां द तासी तब फ्रेंच भाषा में हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास लिख रहे थे। वे फ्रांस में पूरबी भाषाओं के प्रोफेसर थे। तासी ने कबीर पर लिखने के लिए पश्चिम के जिन अध्येताओं से आधार – सामग्री ली, उनमें वहीं टोम्बा, प्राइस, हैरियट और विल्सन प्रमुख थे।

गार्सां द तासी ने अपनी पुस्तक ” इस्त्वार द ल लितरेत्यूर ऐंदूई ऐ ऐंदूस्तानी ” ( प्रथम भाग 1839, दूसरा भाग 1847 ) में कबीर पर तुलसीदास से डेढ़ गुना अधिक लिखा। यह आचार्य रामचंद्र शुक्ल से उलट है।

सिक्खों के पवित्र आदिग्रंथ ( 1604 ) को याद कीजिए, जिसमें हिंदी के संत कवियों में से सर्वाधिक कविताएँ कबीर की संकलित हैं और तुलसीदास बाहर हैं।

कबीर चूँकि आदिग्रंथ के महत्वपूर्ण कवि हैं। सो इस ग्रंथ के बहाने भी कबीर के अनेक अनुवाद हुए, मिसाल के तौर पर अर्नेस्ट ट्रंप ( 1877 ) और मैक्स आर्थर मेकलिफ ( 1909 ) के अनुवाद।

जर्मनी भी अछूता नहीं रहा। अर्नेस्ट ट्रंप ( 1828 – 1885 ) प्राच्यविद्या के जर्मन प्रोफेसर थे। वे कबीर की कुछ कविताओं को 1877 में अनूदित किए। यह वहीं समय है, जब भारत में दयानंद सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश ( 1875 ) की रचना की।

सत्यार्थ प्रकाश में दयानंद सरस्वती ने कबीर के बारे में जो लिखा, वह विचलित कर देने वाला है। लिखा कि कबीर कई पंडितों के पास फिरा, परंतु किसी ने नहीं पढ़ाया। तब ऊट-पटांग भाषा बनाकर जुलाहे आदि नीच लोगों को समझाने लगा। तंबूरे लेकर गाता था; भजन बनाता था। विशेष पंडित, शास्त्र, वेदों की निंदा करता था। कुछ मूर्ख लोग उसके जाल में फँस गए। जब मर गया, तब लोगों ने उसे सिद्ध बना लिया।

यही भारतीय नवजागरण की कबीर के बारे में मानसिकता थी, जो उनके वचनों को भारत में अनुसंधान – कार्य से रोक रही थी। … और ईसाई अनुसंधानों को गालियाँ बक रही थी।

कानपुर में क्रिश्चियन काॅलेज के प्राचार्य रेवरेंड जी. एच. वेस्टकाट ने जब ” कबीर एंड दि कबीर पंथ ” ( 1907 ) की रचना की, तब उन पर आरोप लगा कि वे कबीर पंथ का ईसाईकरण कर रहे हैं और कबीर पंथ पर सेंट जोन की रचनाओं का प्रभाव प्रमाणित कर रहे हैं।

आरोप पश्चिम के अनेक विद्वानों पर लगे। विलियम हंटर पर भी लगा कि उन्होंने कबीर को 15 वीं सदी का ” भारतीय लूथर ” क्यों कहा? मोर्को डेला टोम्बा पर भी आरोप है कि उन्होंने ” मुक्ति ” का अनुवाद Gloria Permanente ईसाई धर्म के प्रभाव में किया है। आरोप मेकालिफ पर भी है कि वे धर्म के साथ छेड़छाड़ किए। भला ” माया ” का अनुवाद ” Worldly Love ” कैसे होगा? ऐसे अनेक।

कोई शक नहीं कि काल, परिवेश और संस्कार लेखन – कार्य को प्रभावित करते हैं और किया भी। बावजूद इसके पश्चिम में कबीर पर जितना कार्य हुआ, संभवतः हिंदी के किसी अन्य कवि पर नहीं हुआ।

भारत के जिस दौर में श्यामसुंदर दास विश्वविद्यालय हित में ” कबीर – ग्रंथावली ” ( 1928 ) का संपादन कर रहे थे, उस दौर में एफ. ई. के ने लंदन विश्वविद्यालय में कबीर पर थीसिस लिखी थी। यही संशोधित थीसिस 1931 में ” कबीर एंड हिज फाॅलोअर्स ” के नाम से प्रकाशित हुई।

कबीर को भारतीय लूथर यदि कोई विदेशी ने कहा तो यह भी जानिए कि कबीर को राष्ट्रकवि भी एक विदेशी ने ही कहा है।

गुई सोरमन ने अपनी अंग्रेजी पुस्तक ” दि जीनियस आॅफ इंडिया ” ( 2001) में कबीर को राष्ट्रकवि कहा है। पहले यह किताब फ्रेंच में आई थी और सोरमन फ्रांस के हैं।

कबीर को राष्ट्रकवि के खिताब से नवाजा जाना आलोचना के क्षेत्र में बड़ी घटना है। राष्ट्रनिर्माण का हर ताना – बाना कबीर – काव्य में मौजूद है। वाकई कबीर बड़े राष्ट्रनिर्माता थे।

सुभाष चंद्र कुशवाहा की पुस्तक ” कबीर हैं कि मरते नहीं ” ( 2020 ) अनामिका प्रकाशन, प्रयागराज से छपी है।

सुभाष चंद्र कुशवाहा मूल रूप से साइंस फैकल्टी से आते हैं। मगर उनका इतिहास – बोध और साहित्य – बोध विस्मयकारी हैं। उनकी पुस्तक चौरी चौरा और अवध का किसान विद्रोह इतिहास के क्षेत्र में मील का पत्थर है।

कहानी की दुनिया और कविता की दुनिया दोनों में उन्होंने अपनी मुकम्मल पहचान बनाई है। मगर हिंदी आलोचना के क्षेत्र में ” कबीर हैं कि मरते नहीं ” ( 2020 ) उनकी पहली किताब है।

किताब में सुभाष चंद्र कुशवाहा ने कबीर से जुड़ी अनेक गुत्थियों को सुलझाने का प्रयास किया है – मिसाल के तौर पर कबीर का जन्म और मृत्यु वर्ष की गुत्थी, कबीर के माँ – बाप और धर्म की गुत्थी, उनके गुरु की गुत्थी आदि …..अनेक।

मगर पुस्तक का बिल्कुल नया आयाम यह है कि उन्होंने 19 सदी के विदेशी अखबारों में छपे लेख और समाचारों का सिलसिलेवार विवरण प्रस्तुत किया है। ऐसा विवरण अभी तक किसी आलोचक ने नहीं प्रस्तुत किया है।

सुभाष चंद्र कुशवाहा ने लिखा है कि 1841 से कबीर के बारे में ब्रिटिश अखबारों में लेख और समाचार छपने लगे थे। उन्होंने इस संदर्भ में ब्राडफोर्ड आॅर्ब्जवर ( 9 सितंबर 1841) को उद्धृत किया है, जिसमें ए लंगलोज का लंबा लेख है और लंगलोज ने इस लेख में कबीर को भारत का महान समाज सुधारक और 15 वीं सदी का नायक कहा है।

फिर तो आलोचक ने 19 वीं सदी के उत्तरार्द्ध और 20 वीं सदी के पूर्वार्द्ध के अनेक ब्रिटिश अखबारों के अनेक पन्नों को प्रस्तुत किया है। कोई दो दर्जन अखबारों का हवाला है, जिनमें कबीर से संबंधित लेख हैं, खबरें हैं।

एलेन्स इंडियन मेल ( 2 नवंबर 1848 ), अर्मघ गार्डियन ( 1 जनवरी 1853 ), मार्निग एडवर्टाइजर ( 10 मार्च 1865 ), दि स्काॅटमैन ( 5 जुलाई 1872 ), बरमिंघम डेली पोस्ट ( 15 अगस्त 1879 ), डंडी एडवर्टाइजर ( 30 नवंबर 1881), दि होमवर्ड मेल (23 जनवरी1882 ), लंदन डेली न्यूज ( 24 मार्च 1883 ), यार्कशायर गज़ट ( 17 जून 1893 ) और दि पाॅल माॅल गजट ( 18 अक्तूबर 1894 ) से लेकर शेफिल्ड डेली टेलीग्राफ ( 3 अप्रैल 1915 ), ग्लोब ( 24 अप्रैल 1915 ), दि लीड मरक्यूरी ( 20 मार्च 1930 ) तथा लीवरपूल इको ( 14 अप्रैल 1942 ) तक दो दर्जन पश्चिम के अखबारों का हवाला है। पश्चिम के वे अखबार जिनमें कबीर मौजूद हैं।

कहीं कबीर की कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद है, कहीं उन पर लेख है, कहीं कबीर पंथ की जानकारी है, कहीं डब्ल्यू. डब्ल्यू. हंटर की पुस्तक की समीक्षा है, कहीं रुडयार्ड किपलिंग लिखित कबीर का गीत प्रसंग है और कहीं रवीन्द्र नाथ टैगोर द्वारा अंग्रेजी में अनूदित कबीर की कविताओं की खबरें हैं।

उम्मीद है कि नए साल 2021 में भारत कबीर को नए परिप्रेक्ष्य में स्वागत करेगा।