#मैं अनंत पथ में लिखती जो

#मैं अनंत पथ में लिखती जो

🎇 महादेवी वर्मा

मैं अनंत पथ में लिखती जो

सस्मित सपनों की बातें,

उनको कभी न धो पाएंगी

अपने आंसू से रातें।

तारों में प्रतिबिंबित हो

मुस्काएंगी अनंत आंखें

होकर सीमाहीन, शून्य में

मंडराएंगी अभिलाषें।

उड़ उड़ कर जो धूल करेगी

मेघों का नभ में अभिषेक,

अमिट रहेगी उसके अंचल

में मेरी पीड़ा की रेख।

वीणा होगी मूक बजाने

वाला होगा अंतर्धान,

विस्मृत के चरणों पर आकर

लोटेंगे सौ-सौ निर्वाण।

जब असीम से हो जाएगा

मेरी लघु सीमा का मेल,

देखोगे तुम देव! अमरता

खेलेगी मिटने का खेल।

🎇 ‘नीहार’ से साभार