#युग-प्रवर्तिका श्रीमती महादेवी वर्मा के प्रति*

#युग-प्रवर्तिका श्रीमती महादेवी वर्मा के प्रति*
#सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

दिए व्यंग्य के उत्तर रचनाओं से रचकर,
विदुषी रहीं विदूषक के समक्ष तुम तत्पर।
हिंदी के विशाल मंदिर की वीणा-पाणी,
स्फूर्ति-चेतना-रचना की प्रतिमा कल्याणी।
निकला जब ‘निहार’ पड़ी चंचलता फीकी,
खुली ‘रश्मि’ से मुख की श्री युग की युवती की।
प्रति उर सुरभित हुआ, ‘नीरजा’, से निरभ्रनभ, शत-शत स्तुतियों से गूंजा ‘यह सौरभ सौरभ’।
‘सांध्य गीत’ गाए समर्थ कवियों ने सुस्वर,
वीणा पर, वेणु पर, यंत्र पर। और यंत्र पर
‘यामा’ ‘दीपशिखा’ के विशिखों के ज्यों मारे,
अपल-चित्र हो गए लोग, ‘चलचित्र’ तुम्हारे।
चला रहे हैं सहज ‘श्रृंखला की कड़ियों’ से,
सजो, रंगो लेखनी-तूलिका की छड़ियों से।

*रचनाकाल : 1943 ईस्वी। देशदूत (साप्ताहिक, प्रयाग, 7 फरवरी, 1943 में प्रकाशित)