#अष्टछाप के कवि

#अष्टछाप के कवि

अष्टछाप के कवियों को याद रखने का सूत्र : कुसूपकृगोछीचन।

हिन्दी साहित्य में कृष्णभक्ति काव्य की प्रेरणा देने का श्रेय पुष्टिमार्ग के संस्थापक और प्रवर्तक श्री वल्लभाचार्य (1478 ई.-1530 ई,) को जाता है। इनके द्वारा पुष्टिमार्ग में दीक्षित होकर आठ कवियों की मंडली ने अत्यन्त महत्वपूर्ण साहित्य की रचना की थी। गोस्वामी बिट्ठलनाथ ने अपने पिता श्रीवल्लभाचार्य के 84 शिष्यों में से चार और अपने 252 शिष्यों में से चार को लेकर सन् 1565 ई. के लगभग ‘अष्टछाप’ की स्थापना की । अष्टछाप को अष्टसखा भी कहा जाता है।

वल्लभाचार्य के चार शिष्य

  • कुम्भनदास (1468-1582 ई.)
  • सूरदास (1478-1583 ई.)
  • परमानंददास और (1491-1583 ई.)
  • कृष्णदास (1495-1575 ई.)

गोस्वामी बिट्ठलनाथ के चार शिष्य

  • गोविन्दस्वामी (1505-1585)
  • छीतस्वामी (1515-1585 ई.)
  • चतुर्भुजदास (1530-1585 ई.)
  • नंददास (1533-1586)

ये आठों भक्त कवि श्रीनाथजी के मन्दिर की नित्य लीला में भगवान श्रीकृष्ण के सखा के रूप में सदैव उनके साथ रहते थे। इस रूप में इन्हे ‘अष्टसखा’ के नाम भी से जाना जाता है। ये सभी श्रेष्ठ कलाकार, संगीतज्ञ एवं कीर्तनकार थे।

गोस्वामी बिट्ठलनाथ ने अष्ट भक्त कवियों पर अपने आशीर्वाद की छाप लगायी, अतः इनका नाम ‘अष्टछाप’ पड़ा।

 

1. #कुंभनदास (1468-1582 ई.) श्री बल्लाभाचार्य के शिष्य थे और जाति के गौरवा क्षत्रिय थे। इनके केवल फुटकर पद पाये जाते हैं। संतन को कहा सीकरी सों काम। आवत जात पन्हैया टूटू बिसरि गयो  हरिनाम।

2. #सूरदास (1478-1583 ई.) श्री बल्लाभाचार्य के शिष्य थे और जाति के सारस्वत ब्राह्मण थे। सूरदास पुष्टिमार्ग के नायक (जहाज़) कहे जाते हैं। ये वात्सल्य रस एवं श्रृंगार रस के अप्रतिम चितेरे माने जाते हैं। इनकी महत्वपूर्ण रचना ‘सूरसागर’ मानी जाती है।

3. #परमानंददास (1491-1583 ई.) श्री बल्लाभाचार्य के शिष्य और जाति के कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे। परमानंददास के पदों का संग्रह ‘परमानन्द-सागर’ है। परमानंद जी के पद, वल्लभ संप्रदाय कीर्तन पद संग्रह, दानलीला, उद्धवलीला, ध्रुवचरित्र, संस्कृत रत्नमाला इनकी अन्य रचनाएँ हैं।

कहा करो बैकुंठी जाए जाय

 जँंह नहिं नंद, जहाँ न जसोदा, नहीं जँह गोपी ग्वालन गाय।

4. #कृष्णदास (1495-1575 ई.) श्रीबल्लाभाचार्य के शिष्य और जाति के कुनवी कायस्थ थे। इनकी रचनाएं ‘भ्रमरगीत’ एवं ‘प्रेमतत्व निरूपण’ हैं।

5. #गोविंदस्वामी (1505-1585 ई.) श्री विट्ठलनाथ के शिष्य और जाति के सनाढ्य ब्राह्मण थे। इनका कोई ग्रन्थ नहीं मिलता। करि सिंगार बसन भूषण सजि फूलन रची रची पाग बनावति।

6. #छीतस्वामी (515-1585 ई.) श्री विट्ठलनाथ के शिष्य और जाति के मथुरिया चौबे थे। इनका कोई ग्रन्थ नहीं मिलता है।  अहो विदधना, तो पै अँचरा पसार माँगो। जनम-जनम दीजो मोहि याही ब्रजबसिबो।

7. #चतुर्भुजदास (1530-1585 ई.) श्री विट्ठलनाथ के शिष्य और जाति के गौरवा क्षत्रिय थे। इनकी रचनाएं ‘द्वादश-यश’, ‘भक्ति-प्रताप’ आदि हैं। जसोदा, कहा कहाँ हौं बात। तुम्हरे सुत के करतब मो पै कहत  कहे नहिं जात। 

8. #नंददास (1533-1586 ई.) श्री विट्ठलनाथ के शिष्य और जाति के सनाढ्य ब्राह्मण थे। काव्य-सौष्ठव एवं भाषा की दृष्टि से नंददास महत्वपूर्ण हैं। ये पाँच मंजरियों के रचयिता हैं। इनकी महत्वपूर्ण रचनाओं में अनेकार्थी मंजरी (पर्याय कोशग्रंथ), नाममाला (कोशग्रंथ), मानमंजरी (पर्याय कोशग्रंथ), रसमंजरी (नायिका-भेद), रूपमंजरी ( प्रबन्ध आख्यानक काव्य, रूपमंजरी और कृष्ण का प्रेम-वर्णन), बिरहमंजरी (भावात्मक काव्य), प्रेम बारहखडी, श्यामसगाई (कृष्ण की सगाई का वर्णन), सुदामा चरित्र (सख्य भक्ति का वर्णन, श्रीमद्बागवत से कथा ली गई है), रुक्मिणी मंगल (विवाह-काव्य), भँवरगीत (कृष्ण-भक्ति का प्रतिपादक काव्य, निर्गण पर सगुण की विजय), रासपंचाध्यायी (कृष्ण और गोपी के रास लीला का वर्णन, रोला छन्द में रचित), सिद्धांत पंचाध्यायी (कृष्ण की रासलीला का वर्णन), भाषा दशम स्कंंध  (श्रीमद्भागवत से कथा लेकर दोहा-चौपाई में लिखा गया है), गोवर्धनलीला, नंददास पदावली (बारह प्रकरणों में काव्य संकलित) हैं।                         वियोगी हरि ने रासपंचाध्यायी को हिंदी का गीतगोविंद कहां है।

ताही छिन उडुराज उदित रस-राास सहायक। कुंकुम मंडित बदन प्रिया जनु नागरि नायक। (रासपंचाध्यायी)

विशेष :

  1. कुंभनदास और चतुर्भुजदास रिश्ते में पिता-पुत्र थे।
  2. ‘अष्टछाप’ के भक्त कवियों में सबसे ज्येष्ठ कुम्भनदास थे और सबसे कनिष्ठ नंददास थे।
  3. काव्य-सौष्ठव की दृष्टि से सूरदास का सर्वप्रथम स्थान है और द्वितीय स्थान नंददास का है।

 

#अष्टछाप के कवि (कालक्रमानुसार)

  • कुम्भनदास (1468-1582 ई.)
  • सूरदास (1478-1583 ई.)
  • परमानंददास और (1491-1583 ई.)
  • कृष्णदास (1495-1575 ई.)
  • गोविन्दस्वामी (1505-1585 ई.)
  • छीतस्वामी (1515-1585 ई.)
  • चतुर्भुजदास (1530-1585 ई.)
  • नंददास (1533-1586 ई.)