शारंगधर (SHARANGDHAR) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

शारंगधर : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

शारंगधर का आयुर्वेद का ग्रंथ तो प्रसिद्ध ही है। ये अच्छे कवि और सूत्रकार भी थे। इन्होंने ‘शारंगधर पद्धति’ के नाम से एक सुभाषित संग्रह भी बनाया है और अपना परिचय भी दिया है। रणथंभौर के सुप्रसिद्ध वीर महाराज हम्मीरदेव के प्रधान सभासदों में राघवदेव थे। उनके भोपाल, दामोदर और देवदास ये तीन पुत्र हुए। दामोदर के तीन पुत्र हुए शारंगधर, लक्ष्मीधर और कृष्ण। हम्मीरदेव संवत् 1357 में अलाउद्दीन की चढ़ाई में मारे गए थे। अत: शारंगधर के ग्रंथों का समय उक्त संवत् के कुछ पीछे अर्थात् विक्रम की चौदहवीं शताब्दी के अंतिम चरण में मानना चाहिए।

शारंगधर पद्धति’ में बहुत-से शाबर मंत्र और भाषा-चित्र-काव्य दिए हैं जिनमं बीच-बीच में देशभाषा के वाक्य आए हैं। उदाहरण के लिए श्रीमल्लदेव राजा की प्रशंसा में कहा हुआ यह श्लोक देखिए—

नूनं बादलं छाइ खेह पसरी नि:श्राण शब्द: खर:।

शत्रुं पाड़ि लुटालि तोड़ हनिसौं एवं भणन्त्युद्भटा:

झूठे गर्वभरा मघालि सहसा रे कंत मेरे कहे।

कंठे पाग निवेश जाह शरणं श्रीमल्लदेवं विभुम्

परंपरा से प्रसिद्ध है कि शारंगधर ने हम्मीर रासो नामक एक वीरगाथा काव्य की भी भाषा में रचना की थी। यह काव्य आजकल नहीं मिलता उसके अनुकरण पर बहुत पीछे का लिखा हुआ एक ग्रंथ ‘हम्मीररासो’ नाम का मिलता है। ‘प्राकृत-पिंगलसूत्र’ उलटते-पलटते मुझे हम्मीर की चढ़ाई, वीरता आदि के कई पद्य छंदों के उदाहरणों में मिले। मुझे पूरा निश्चय है कि ये पद्य असली ‘हम्मीररासो’ के ही हैं। अत: ऐसे कुछ पद्य नीचे दिए जाते हैं—

ढोला मारिय ढिल्लि महँ मुच्छिउ मेच्छ सरीर।

पुर जज्जल्ला मंतिवर चलिअ वीर हम्मीर

चलिअ वीर हम्मीर पाअभर मेइणि कंपइ।

दिगमग णह अंधार धूलि सुररह आच्छाइहि

दिगमग णह अंधार आण खुरसाणुक उल्ला।

दरमरि दमसि विपक्ख मारु ढिल्ली मह ढोल्ला

(दिल्ली में ढोल बजाया गया, म्लेच्छों के शरीर मूर्च्र्छित हुए। आगे मंत्रिवर जज्जल को करके वीर हम्मीर चले। चरणों के भार से पृथ्वी काँपती है। दिशाओं के मार्गों और आकाश में अंधेरा हो गया है, धूल सूर्य के रथ को आच्छादित करती है। ओल में खुरासनी ले आए। विपक्षियों को दलमल कर दबाया, दिल्ली में ढोल बजाया।)

पिंघउ दिड़ सन्नाह, बाह उप्परि पक्खर दइ।

बंधु समदि रण धाँसेउ साहि हम्मीर बअण लइ

अड्डुउ णहपह भमउँ, खग्ग रिपु सीसहि झल्लउँ।

पक्खर पक्खर ठेल्लि पेल्लि पब्बअ अप्फालउँ

हम्मीर कज्ज जज्जल भणइ कोहाणल मह मइ जलउँ।

सुलितान सीस करवाल दइ तज्जि कलेवर दिअ चलउँ

(दृढ़ सन्नाह पहले, वाहनों के ऊपर पक्खरें डालीं। बंधुबांधवों से विदा लेकर रण में धँसा हम्मीर साहि का वचन लेकर। तारों को नभपथ में फिराऊँ, तलवार शत्रु के सिर पर जड़न्नँ, पाखर से पाखर ठेल-पेल कर पर्वतों को हिला डालूँ। जज्जल कहता है कि हम्मीर के कार्य के लिए मैं क्रोध से जल रहा हूँ। सुलतान के सिर पर खड्ग देकर शरीर छोड़कर मैं स्वर्ग को जाऊँ।)

पअभर दरमरु धारणि तरणि रह धुल्लिअ झंपिअ।

कमठ पिट्ठ टरपरिअ, मेरु मंदर सिर कंपिअ

कोहे चलिअ हम्मीर बीर गअजुह संजुत्तो।

किअउ कट्ठ, हा कंद! मुच्छि मेच्छिअ के पुत्तो

(चरणों के भार से पृथ्वी दलमल उठी। सूर्य का रथ धूल से ढँक गया। कमठ की पीठ तड़फड़ा उठी; मेरुमंदर की चोटियाँ कंपित हुईं। गजयूथ के साथ वीर हम्मीर क्रुद्ध होकर चले। म्लेच्छों के पुत्र हा कष्ट! करके रो उठे और मूर्च्छित हो गए।)