#सदल मिश्र (1767-1848 ई.) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

#सदल मिश्र (1767-1848 ई.) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

#सदल मिश्र की #रचनाएँ :  #नासिकेतोपाख्यान या #चन्द्रवली (1803 ई., यजुर्वेद के आधार पर कठोपनिषद में वर्णित नचिकेत की कथा का खड़ी बोली में अनुवाद), #रामचरित्र (1805 ई., सात काण्ड, आध्यात्म रामायण का अनुवाद), #हिंदी पर्शियन वॉकेबुलरी (1809 ई.)

#सदल मिश्र बिहार के रहनेवाले थे। #फोर्टविलियम कॉलेज में काम करते थे। जिस प्रकार उक्त कॉलेज के अधिकारियों की प्रेरणा से लल्लूलाल ने खड़ी बोली गद्य की पुस्तक तैयार की उसी प्रकार इन्होंने भी। इनका नासिकेतोपाख्यान भी उसी समय लिखा गया जिस समय प्रेमसागर। पर दोनों की भाषा में बहुत अंतर है। #लल्लूलाल के समान इनकी भाषा में न तो ब्रजभाषा के रूपों की वैसी भरमार है और न परंपरागत काव्य भाषा की पदावली का स्थान स्थान पर समावेश। इन्होंने व्यवहारोपयोगी भाषा लिखने का प्रयत्न किया है और जहाँ तक हो सकता है खड़ी बोली का ही व्यवहार किया है। पर इनकी भाषा भी साफ सुथरी नहीं। ब्रजभाषा के भी कुछ रूप हैं और पूरबी बोली के शब्द तो स्थान स्थान पर मिलते हैं। फूलन्ह के बिछौने‘, ‘चहुँदिस‘, ‘सुनि‘, ‘सोनन्ह के थंभआदि प्रयोग ब्रजभाषा के हैं, ‘इहाँ‘, ‘मतारी‘, ‘बरते थे‘, ‘जुड़ाई‘, ‘बाजने‘, ‘लगा‘, ‘जौनआदि पूरबी शब्द हैं। भाषा के नमूने के लिए नासिकेतोपाख्यानसे थोड़ा सा अवतरण नीचे दिया जाता है :

इस प्रकार के नासिकेत मुनि यम की पुरी सहित नरक का वर्णन कर फिर जौन जौन कर्म किए से जो भोग होता है सो सब ऋषियों को सुनाने लगे कि गौ, ब्राह्मण, माता पिता, मित्र, बालक, स्त्री, स्वामी, वृद्ध गुरु इनका जो बधा करते हैं वो झूठी साक्षी भरते, झूठ ही कर्म में दिन रात लगे रहते हैं, अपनी भार्य्या को त्याग दूसरे की स्त्री को ब्याहते, औरों की पीड़ा देख प्रसन्न होते हैं और जो अपने धर्म से हीन पाप ही में गड़े रहते हैं वो माता-पिता की हित की बात को नहीं सुनते, सबसे बैर करते हैं, ऐसे जो पापी जन हैं सो महा डेरावने दक्षिण द्वार से जा नरकों में पड़ते हैं।

गद्य की एक साथ परंपरा चलाने वाले उपर्युक्त चार लेखकों में से #आधुनिक हिन्दी का पूरा पूरा आभास मुंशी सदासुखलाल और सदल मिश्र की भाषा में ही मिलता है। व्यवहारोपयोगी इन्हीं की भाषा ठहरती है। (हिंदी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, आधुनिक काल : प्रकरण 1 : गद्य का विकाल : खड़ी बोली का गद्य)

फोर्ट विलियम कॉलेज के आश्रय में लल्लूलालजी गुजराती ने खड़ी बोली के गद्य में ‘प्रेमसागर’ और सदल मिश्र ने ‘नासिकेतोपाख्यान’ लिखा। अत: खड़ी बोली गद्य को एक साथ आगे बढ़ानेवाले चार महानुभाव हुए हैं : #मुंशी सदासुख लाल, #सैयद इंशाअल्ला खाँ, #लल्लूलाल और #सदल मिश्र। ये चारों लेखक संवत् 1860 के आसपास हुए। (हिंदी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, आधुनिक काल : प्रकरण 1 : गद्य का विकाल : खड़ी बोली का गद्य)

#मुंशी सदासुख की भाषा साधु होते हुए भी पंडिताऊपन लिए थी, #लल्लूलाल में ब्रजभाषापन और #सदल मिश्र में पूरबीपन था। (हिंदी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, आधुनिक गद्य साहित्य का प्रवर्तन : प्रथम उत्थान प्रकरण 1 : गद्य का परवर्तन : सामान्य परिचय)