रसखान : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

रसखान : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

ये (रसख़ान) दिल्ली के एक पठान सरदार थे। इन्होंने प्रेमवाटिकामें अपने को शाही ख़ानदान का कहा है—

देखि गदर हित साहिबी, दिल्ली नगर मसान।

छिनहिं बादसा बंस की, ठसक छाँड़ि रसख़ान।।

संभव है पठान बादशाहों की कुल परंपरा से इनका संबंध रहा हो। ये बड़े भारी कृष्णभक्त और गोस्वामी विट्ठलनाथ जी के बड़े कृपापात्र शिष्य थे। दो सौ बावन वैष्णवों की वार्तामें इनका वृत्तांत आया है। उक्त वार्ता के अनुसार, ये पहले एक बनिए के लड़के पर आसक्त थे। एक दिन इन्होंने किसी को कहते हुए सुना कि भगवान से ऐसा प्रेम करना चाहिए जैसे रसख़ान का उस बनिए के लड़के पर है। इस बात से मर्माहत होकर ये श्रीनाथजी को ढूँढ़ते ढूँढ़ते गोकुल आए और वहाँ गोसाईं विट्ठलनाथ जी से दीक्षा ली। यही आख्यायिका एक दूसरे रूप में भी प्रसिद्ध है। कहते हैं जिस स्त्री पर ये आसक्त थे वह बहुत मानवती थी और इनका अनादर किया करती थी। एक दिन ये श्रीमद्भागवत का फ़ारसी तर्जुमा पढ़ रहे थे। उसमें गोपियों के अनन्य और अलौकिक प्रेम को पढ़ इन्हें ध्यान हुआ कि उसी में क्यों न मन लगाया जाय जिसपर इतनी गोपियाँ मरती थीं। इसी बात पर ये वृंदावन चले आए। प्रेमवाटिकाके इस दोहे का संकेत लोग इस घटना की ओर बताते हैं—

तोरि मानिनी तें हियो फोरि मोहनी मान।

प्रेमदेव की छबिहि लखि भए मियाँ रसख़ान।।

इन प्रवादों से कम-से-कम इतना अवश्य सूचित होता है कि आरंभ से ही ये बड़े प्रेमी जीव थे। वही प्रेम अत्यंत गूढ़ भगवद्भक्ति में परिणत हुआ। प्रेम के ऐसे सुंदर उद्गार इनके सवैयों में निकले कि जनसाधारण प्रेम या श्रृंगार संबंधी कवित्त सवैयों को ही रसख़ानकहने लगे। जैसे कोई रसख़ान सुनाओ।इनकी भाषा बहुत चलती सरल और शब्दाडंबर मुक्त होती थी। शुद्ध ब्रजभाषा का जो चलतापन और सफ़ाई इनकी और घनानंद की रचनाओं में है, वह अन्यत्रा दुर्लभ है। इनका रचनाकाल संवत् 1640 के उपरांत ही माना जा सकता है, क्योंकि गोसाईं विट्ठलनाथ जी का गोलोकवास संवत् 1643 में हुआ था। ‘प्रेमवाटिका’ का रचनाकाल संवत् 1671 है। अत: उनके शिष्य होने के उपरांत ही इनकी मधुर वाणी स्फुरित हुई होगी। इनकी कृति परिमाण में तो बहुत अधिक नहीं हैं, पर जो है वह प्रेमियों के मर्म को स्पर्श करनेवाली है। इनकी दो छोटी छोटी पुस्तकें अब तक प्रकाशित हुई हैं— ‘प्रेमवाटिका’ (दोहे) और ‘सुजान रसख़ान’ (कवित्त सवैया)। और कृष्णभक्तों के समान इन्होंने गीतकाव्यका आश्रय न लेकर कवित्त सवैयों में अपने सच्चे प्रेम की व्यंजना की है। ब्रजभूमि के सच्चे प्रेम से परिपूर्ण ये दो सवैये अत्यंत प्रसिद्ध हैं—

मानुष हों तो वही रसख़ान बसौं सँग गोकुल गाँव के ग्वारन।

जौ पसु हों तो कहा बसु मेरो चरौं नित नंद की धोनु मझारन।।

पाहन हों तो वही गिरि को जो कियो हरि छत्रा पुरंदर धारन।

जौ खग हों तो बसेरो करौं मिलि कालिंदी कूल कदंब की डारन।।

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या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहूँ पुर को तजि डारौं।

आठहु सिद्धि नवौ निधि के सुख नंद की गाय चराय बिसारौं।।

नैनन सों रसख़ान सबै ब्रज के बन बाग तड़ाग निहारौं।

केतक ही कलधौत के धाम करील के कुंजन ऊपर वारौं।।

अनुप्रास की सुंदर छटा होते हुए भी भाषा की चुस्ती और सफ़ाई कहीं नहीं जाने पाई है। बीच बीच में भावों की बड़ी सुंदर व्यंजना है। लीलापक्ष को लेकर इन्होंने बड़ी रंजनकारिणी रचनाएँ की हैं।

भगवान प्रेम के वशीभूत हैं, जहाँ प्रेम है वहीं प्रिय है, इस बात को रसख़ान यों कहते हैं—

ब्रह्म मैं ढँढयो पुरानन गानन, वेदरिचा सुनी चौगुने चायन।

देख्यो सुन्यो कबहूँ न कहूँ वह कैसे सरूप और कैसे सुभायन।।

टेरत हेरत हारि परयो रसख़ान बतायो न लोग लुगायन।

देख्यो दुरो वह कुंज कुटीर में बैठो पलोटत राधिाका पाँयन।।

कुछ और नमूने देखिए—

मोर पखा सिर ऊपर राखिहौ, गुंज की माल गले पहिरौंगी।

ओढ़ि पितांबर लै लकुटी बन गोधान ग्वालन संग फिरौंगी।।

भावतो सोई मेरो रसख़ान सो तेरे कहै सब स्वाँग करौंगी।

या मुरली मुरलीधार की अधारान धारी अधारा न धारौंगी।।

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सेस महेस गनेस दिनेस सुरेसहु जाहिं निरंतर गावैं।

जाहि अनादि अनंत अखंड अछेद अभेद सुवेद बतावैं

नारद से सुक व्यास रटैं पचि हारे तऊ पुनि पार न पावैं।

ताहि अहीर की छोहरियाँ छछिया भर छाछ पै नाच नचावैं

(प्रेमवाटिका से)

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जेहि बिनु जाने कछुहि नहिं जान्यों जात बिसेस।

सोइ प्रेम जेहि जान कै रहि न जात कछु सेस

प्रेमफाँस सो फँसि मरै सोई जियै सदाहि।

प्रेम मरम जाने बिना मरि कोउ जीवत नाहिं

—आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण 5— सगुण धारा कृष्णभक्ति शाखा

रसख़ान, घनानंद, आलम, ठाकुर आदि जितने प्रेमोन्मत्त कवि हुए हैं, उनमें किसी ने लक्षणबद्ध रचना नहीं की है।

—आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण 5—सगुण धारा कृष्णभक्ति शाखा

प्रेम की तन्मयता की दृष्टि से आलम की गणना रसख़ानऔर घनानंदकी कोटि में ही होनी चाहिए।

—आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण 5—सगुण धारा कृष्णभक्ति शाखा