प्रतापनारायण मिश्र (संवत् 1913-1951) : रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

प्रतापनारायण मिश्र (संवत् 1913-1951) : रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

इनके (प्रतापनारायण मिश्र क) पिता उन्नाव से आकर कानपुर में बस गए थे, जहाँ प्रतापनारायण जी का जन्म संवत् 1913 और मृत्यु संवत् 1951 में हुई। ये इतने मनमौजी थे कि आधुनिक सभ्यता और शिष्टता की कम परवाह करते थे। कभी लावनीबाजों में जाकर शामिल हो जाते थे, कभी मेलों और तमाशों में बंद इक्के पर बैठ जाते दिखाई पड़ते थे।

    प्रतापनारायण मिश्र यद्यपि लेखनकला में भारतेंदु को ही आदर्श मानते थे, पर उनकी शैली में भारतेंदु की शैली से बहुत कुछ विभिन्नता भी लक्षित होती है। प्रतापनारायण जी में विनोदप्रियता विशेष थी, इससे उनकी वाणी में व्यंग्यपूर्ण वक्रता की मात्रा प्राय: रहती है। इसके लिए वे पूरबीपन की परवाह न करके अपने बैसवारे की ग्राम्य कहावतें और शब्द भी बेधड़क रख दिया करते थे। कैसा ही विषय हो, पर उसमें विनोद और मनोरंजन की सामग्री ढूँढ लेते थे। अपना ‘ब्राह्मण’ पत्र उन्होंने विविध विषयों पर गद्यप्रबंध लिखने के लिए ही निकाला था। लेख हर तरह के निकलते थे। देशदशा, समाजसुधार, नागरी हिन्दी प्रचार, साधारण मनोरंजन आदि सब विषयों पर मिश्रजी की लेखनी चलती थी। शीर्षकों के नामों से ही विषयों की अनेकरूपता का पता चलेगा; जैसे ‘घूरे क लत्ता बीनै, कनातन क डौल बाँधौ’, ‘समझदार की मौत है’, ‘बात’, ‘मनोयोग’, ‘वृद्ध ‘, ‘भौं’। यद्यपि उनकी प्रवृत्ति हास्यविनोद की ओर ही अधिक रहती थी, पर जब कभी कुछ गंभीर विषयों पर वे लिखते थे तब संयत और साधु भाषा का व्यवहार करते थे। दोनों प्रकार की लिखावटों के नमूने नीचे दिए जाते हैं ,

समझदार की मौत है

सच है ‘सब तें भले हैं मूढ़ जिन्हें न व्यापै जगत गति’। मजे से पराई जमा गपक बैठना, … खुशामदियों से गप मारा करना, जो कोई तिथित्योहार आ पड़ा तो गंगा में बदन धाो आना, … गंगापुत्र को चार पैसे देकर सेंतमेत में धरममूरत, धरमऔतार का खिताब पाना; संसार परमार्थ दोनों तो बन गए, अब काहे की है है और काहे की खैखै? आफत तो बेचारे जिंदादिलों की है जिन्हें न यों कल न वों कल; जब स्वदेशी भाषाका पूर्ण प्रचार था तब के विद्वान कहते ‘गीर्वाणवाणीषु, विशालबुद्धि स्तथान्यभाषा रसलोलुपोहम्’।अब आज अन्य भाषा वरंच अन्य भाषाओं का करकट (उर्दू) छाती का पीपल हो रही है, अब यह चिंता खाए लेती है कि कैसे इस चुड़ैल से पीछा छूटै।

मनोयोग

शरीर के द्वारा जितने काम किए जाते हैं, उन सब में मन का लगाव अवश्य रहता है। जिनमें मन प्रसन्न रहता है वही उत्तमता के साथ होते हैं और जो उसकी इच्छा अनुकूल नहीं होते वह वास्तव में चाहे अच्छे कार्य भी हों किंतु भले प्रकार पूर्ण रीति से संपादित नहीं होते, न उनका कर्ता ही यथोचित आनंद लाभ करता है। इसी से लोगों ने कहा है कि मन शरीररूपी नगर का राजा है, और स्वभाव उसका चंचल है। यदि स्वच्छंद रहे तो बहुधा कुत्सित ही मार्ग में धावमान रहता है। यदि रोका न जाय तो कुछ काल में आलस्य और अकृत्य का व्यसन उत्पन्न करके जीवन को व्यर्थ एवं अनर्थपूर्ण कर देता है।

    प्रतापनारायण जी ने फुटकल गद्यप्रबंधों के अतिरिक्त कई नाटक भी लिखे। ‘कलिकौतुक रूपक’ में पाखंडियों और दुराचारियों का चित्र खींचकर उनसे सावधान रहने का संकेत किया गया है। ‘संगीत शाकुंतल’ लावनी के ढंग पर गाने योग्य खड़ी बोली में पद्यबद्ध शकुंतला नाटक है। भारतेंदु के अनुकरण पर मिश्रजी ने ‘भारतदुर्दशा’ नाम का नाटक भी लिखा था। ‘हठी हम्मीर’ रणथंभौर पर अलाउद्दीन की चढ़ाई का वृत्त लेकर लिखा गया है। ‘गोसंकट नाटक’ और ‘कलिप्रभाव’ नाटक के अतिरिक्त ‘जुआरी खुआरी’ नामक उनका एक प्रहसन भी है।

—रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल, प्रकरण 2 : गद्य का प्रवर्तन : प्रथम उत्थान

मिश्रजी समस्यापूर्ति और पुराने ढंग की श्रृंगारी कविता बहुत अच्छी करते थे। कानपुर के रसिकसमाज में बड़े उत्साह से पूर्तियां सुनाया करते थे। देखिए पपीहा जब पूछिहै पीव कहाँ की कैसी अच्छी पूर्ति उन्होंने की थी—

बनि बैठी है मान की मूरति सी, मुख खोलत बोलै न नाही न हां।

तुमही मनुहारी कै हारि परे, सखियान की कौन चलाई तहाँ।

बरषा है प्रतापजू धीर धरौ, अबलौं मनको समुझायो जहाँ।

यह ब्यारिहारी तबै बदलेगी कछू पपिहा जब पूछिहै पीव कहाँ।

प्रतापनारायण जी कैसे मनमौजी आदमी थे, यह कहा जा चुका है। लावनीबाज़ों के बीच बैठकर वे लावनियाँ बना बनाकर भी गाया करते थे।

—रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल, प्रकरण 1 : काव्यखंड: पुरानी धारा : अन्य कवि

भारतेंदुजी स्वयं पद्यात्मक निबंधों की ओर प्रवृत्त नहीं हुए पर उनके भक्त और अनुयायी पं. प्रतापनारायण मिश्र इस ओर बढ़े। उन्होंने देशदशा पर आँसू बहाने के अतिरिक्त ‘बुढ़ापा’, ‘गोरक्षा’ ऐसे विषय भी कविता के लिए चुने। ऐसी कविताओं में कुछ तो विचारणीय बातें हैं, कुछ भावव्यंजना और विचित्र विनोद। उनके कुछ इतिवृत्तात्मक पद्य भी हैं जिनमें शिक्षितों के बीच प्रचलित बातें साधारण भाषण के रूप में कही गई हैं। उदाहरण के लिए ‘क्रंदन‘ की ये पंक्तियाँ देखिए—

तबहि लख्यौ जहँ रह्यो एक दिन कंचन बरसत।

तहँ चौथाई जन रूखी रोटिहुँ को तरसत

जहाँ कृषी वाणिज्य शिल्पसेवा सब माहीं।

देसिन के हित कछू तत्व कहुँ कैसहुँ नाहीं

कहिय कहाँ लगि नृपति दबे हैं जहँ ऋन भारन।

तहँ तिनकी धानकथा कौन जे गृही सधारन

मिश्रजी की विशेषता वास्तव में उनकी हास्यविनोदपूर्ण रचनाओं में ही दिखाई पड़ती है। ‘हरगंगा’, ‘तृप्यंताम्’ ‘बुढ़ापा’, इत्यादि कविताएँ बड़ी विनोदपूर्ण और मनोरंजक हैं। ‘हिन्दी, हिंदू, हिंदुस्तान’ वाली ‘हिन्दी की हिमायत’ भी बहुत प्रसिद्ध हुई।

—रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल, प्रकरण 2 : काव्यखंड: नई धारा : प्रथम उत्थान

उनके (बालकृष्ण भट्ट कि) लिखने का ढंग पं. प्रतापनारायण के ढंग से मिलता-जुलता है। मिश्रजी के समान भट्टजी भी स्थान स्थान पर कहावतों का प्रयोग करते थे।….. प्रतापनारायण के हास्यविनोद से भट्टजी के हास्यविनोद में यह विशेषता है कि वह कुछ चिड़चिड़ाहट लिए रहता था। पदविन्यास भी कभी उसका बहुत ही चोखा और अनूठा होता था।…. पं. प्रतापनारायण मिश्र और बालकृष्ण भट्ट ने हिन्दी गद्य साहित्य में वही काम किया है जो अंग्रेजी गद्य साहित्य में एडीसन और स्टील ने किया था।.… बाबू हरिश्चंद्र, पं. प्रतापनारायण आदि कवियों और लेखकों की दृष्टि और हृदय की पहुँच मानवक्षेत्र तक ही थी; प्रकृति के अपर क्षेत्रों तक नहीं।….. पं. प्रतापनारायण मिश्र भी ‘हिन्दी, हिंदू, हिंदुस्तानी’ का राग अलापते फिरते थे।

—रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल, प्रकरण 2 : गद्य का प्रवर्तन : प्रथम उत्थान

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भाषा का स्वरूप स्थिर हो जाने पर जब साहित्य की रचना कुछ परिमाण में हो लेती है तभी शैलियों का भेद, लेखकों की व्यक्तिगत विशेषताएँ आदि लक्षित होती हैं। भारतेंदु के प्रभाव से उनके अल्प जीवनकाल के बीच ही लेखकों का एक खासा मंडल तैयार हो गया जिसके भीतर पं. प्रतापनारायण मिश्र, उपाधयाय बदरीनारायण चौधारी, ठाकुर जगमोहन सिंह, पं. बालकृष्ण भट्ट मुख्य रूप से गिने जा सकते हैं। इन लेखकों की शैलियों में व्यक्तिगत विभिन्नता स्पष्ट लक्षित हुई।….पं. प्रतापनारायण मिश्र की प्रकृति विनोदशील थी। अत: उनकी भाषा बहुत स्वच्छंद गति से बोलचाल की चपलता और भावभंगिमा लिए चलती है। हास्य विनोद की उमंग में वह कभी कभी मर्यादा का अतिक्रमण करती, पूरबी कहावतों और मुहावरों की बौछार भी छोड़ती चलती है।

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विलक्षण बात यह है कि आधुनिक गद्य साहित्य की परंपरा का प्रवर्तन नाटकों से हुआ। ….. पं. प्रतापनाराण और बदरीनारायण चौधारी ने भी उन्हीं का (भारतेंदु का) अनुसरण किया।

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भारतेंदुजी, प्रतापनारायण मिश्र, बदरीनारायण चौधारी उद्योग करके अभिनय का प्रबंध किया करते थे और कभी कभी स्वयं भी पार्ट लेते थे।…..प्रतापनारायण मिश्र का अपने पिता से अभिनय के लिए मूँछ मुड़ाने की आज्ञा माँगना प्रसिद्ध  ही है।

—रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल, प्रकरण 1 : आधुनिक गद्यसाहित्य परंपरा का प्रवर्तन : सामान्य परिचय

‘ब्राह्मण’ (कानपुर, 1940, प्रतापनारायण मिश्र), ‘हिन्दीप्रदीप’ और ‘आनंदकादंबिनी’ साहित्यिक पत्र थे जिनमें बहुत सुंदर मौलिक गद्य प्रबंध और कविताएँ निकला करती थीं। इन पत्र पत्रिकाओं को बराबर आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। ‘हिन्दी प्रदीप’ को कई बार बंद होना पड़ा था। ‘ब्राह्मण’ संपादक पं. प्रतापनारायण मिश्र को ग्राहकों से चंदा माँगते माँगते थककर कभी कभी पत्र में इस प्रकार याचना करनी पड़ती थी ,

आठ मास बीते, जजमान! अब तौ करौ दच्छिना दान

—रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल, प्रकरण 1 : आधुनिक गद्यसाहित्य परंपरा का प्रवर्तन : सामान्य परिचय

कालाकाँकर के मनस्वी और देशभक्त राजा रामपाल सिंहजी अपनी मातृभाषा की सेवा के लिए खड़े हुए और संवत् 1940 में उन्होंने ‘हिंदोस्थान’ नामक पत्र इंगलैंड से निकाला जिसमें हिन्दी और अंग्रेजी दोनों रहती थीं। भारतेंदु के गोलोकवास के पीछे संवत् 1942 में यह हिन्दी दैनिक के रूप में निकला और बहुत दिनों तक चलता रहा। इसके संपादकों में देशपूज्य पं. मदनमोहन मालवीय, पं. प्रतापनारायण मिश्र, बाबू बालमुकुंद गुप्त ऐसे लोग रह चुके हैं।

—रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल, प्रकरण 1 : आधुनिक गद्यसाहित्य परंपरा का प्रवर्तन : सामान्य परिचय

हरिश्चंद्र के जीवनकाल में ही लेखकों और कवियों का एक खासा मंडल चारों ओर तैयार हो गया। उपाधयाय पं. बदरीनारायण चौधारी, पं. प्रतापनारायण मिश्र, बाबू तोताराम, ठाकुर जगमोहन सिंह, लाला श्रीनिवासदास, पं. बालकृष्ण भट्ट, पं. केशवराम भट्ट, पं. अंबिकादत्त व्यास, पं. राधाचरण गोस्वामी इत्यादि कई प्रौढ़ और प्रतिभाशाली लेखकों ने हिन्दी साहित्य के इस नूतन विकास में योग दिया था। भारतेंदु का अस्त तो संवत् 1941 में ही हो गया पर उनका यह मंडल बहुत दिनों तक साहित्य निर्माण करता रहा। …..जो मौलिकता इन लेखकों में थी वह द्वितीय उत्थान के लेखकों में न दिखाई पड़ी।

—रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल, प्रकरण 2 : गद्य का प्रवर्तन : प्रथम उत्थान

भारत का हित वे (फ्रेडरिक पिंकाट) सच्चे हृदय से चाहते थे। राजा लक्ष्मणसिंह, भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रतापनारायण मिश्र, कार्तिकप्रसाद खत्री इत्यादि हिन्दी लेखकों से उनका बराबर हिन्दी में पत्रव्यवहार रहता था।

—रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आधुनिक काल, प्रकरण 2 : गद्य साहित्य का आविर्भाव