नूर मुहम्मद (NOOR MUHAMMAD) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

 

नूर मुहम्मद (NOOR MUHAMMAD): आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

ये दिल्ली के बादशाह मुहम्मद शाह के समय में थे और सबरहदनामक स्थान के रहने वाले थे जो जौनपुर, आज़मगढ़ की सरहद पर है। पीछे सबरहद से ये अपनी ससुराल भादों (जिला-आजमगढ़) चले गए। इनके श्वसुर शमसुद्दीन का और कोई वारिस न था इससे वे ससुराल ही में रहने लगे। नूर मुहम्मद के भाई मुहम्मद शाह सबरहद ही में रहे। नूर मुहम्मद के दो पुत्र हुए गुलाम हुसैन और नसीरुद्दीन। नसीरुद्दीन की वंश परंपरा में शेख फिदा हुसैन अभी वर्तमान हैं जो सबरहद और कभी कभी भादों में भी रहा करते हैं। अवस्था इनकी 80 वर्ष की है।

नूर मुहम्मद फारसी के अच्छे आलिम थे और इनका हिन्दी काव्यभाषा का भी ज्ञान और सब सूफी कवियों से अधिक था। फारसी में इन्होंने एक दीवान के अतिरिक्त रौजतुल हकायक इत्यादि बहुत सी किताबें लिखी थीं जो असावधानी के कारण नष्ट हो गईं। इन्होंने 1157 हिजरी (संवत् 1801) में इंद्रावतीनामक एक सुंदर आख्यान काव्य लिखा जिसमें कालिंजर के राजकुमार राजकुँवर और आगमपुर की राजकुमारी इंद्रावती की प्रेम कहानी है। कवि ने प्रथानुसार उस समय के शासक मुहम्मदशाह की प्रशंसा इस प्रकार की है

करौं मुहम्मदशाह बखानू । है सूरज देहली सुलतानू

धरमपंथ जग बीच चलावा । निबर न सबरे सों दुख पावा

बहुतै सलातीन जग केरे। आइ सहास बने हैं चेरे

सब काहू परदाया धारई । धरम सहित सुलतानी करई

कवि ने अपनी कहानी की भूमिका इस प्रकार बाँधी है

मन दृग सों इक राति मझारा । सूझि परा मोहिं सब संसारा

देखेउँ एक नीक फुलवारी । देखेउँ तहाँ पुरुष औ नारी

दोउ मुख सोभा बरनि न जाई । चंद सुरुज उतरे भुइँ आई

तपी एक देखेउतेहि ठाऊँ । पूछेउँ तासौं तिन्हकर नाऊँ

कहा अहै राजा औ रानी । इंद्रावति औ कुँवर गियानी

आगमपुर इंद्रावती, कुँवर कलिंजर रास

प्रेम हुँते दोउन्ह कहँ, दीन्हा अलख मिलाय

कवि ने जायसी के पहले के कवियों के अनुसार पाँच पाँच चौपाइयों के उपरांत दोहे का क्रम रखा है। इसी ग्रंथ (इंद्रावती) को सूफी पद्धति का अंतिम ग्रंथ मानना चाहिए।

इनका एक और ग्रंथ फारसी अक्षरों में लिखा मिला है, जिसका नाम है अनुराग बाँसुरी यह पुस्तक कई दृष्टियों से विलक्षण है। पहली बात तो इसकी भाषा है जो सूफी रचनाओं से बहुत अधिक संस्कृत गर्भित है। दूसरी बात है हिन्दी भाषा के प्रति मुसलमानों का भाव। इंद्रावतीकी रचना करने पर शायद नूर मुहम्मद को समय समय पर यह उपालंभ सुनने को मिलता था कि तुम मुसलमान होकर हिन्दी भाषा में रचना करने क्यों गए। इसी से अनुराग बाँसुरीके आरंभ में उन्हें यह सफाई देने की जरूरत पड़ी

जानत है वह सिरजनहारा । जो किछु है मन मरम हमारा।।

हिंदू मग पर पाँव न राखेउँ । का जौ बहुतै हिन्दी भाखेउ।।

मन इस्लाम मिरिकलैं माँजेउँ । दीन जेंवरी करकस भाँजेउँ।।

जहँ रसूल अल्लाह पियारा । उम्मत को मुक्तावनहारा।।

तहाँ दूसरो कैसे भावै । जच्छ असुर सुर काज न आवै।।

इसका तात्पर्य यह कि संवत् 1800 तक आते आते मुसलमान हिन्दी से किनारा खींचने लगे थे। हिन्दी हिंदुओं के लिए छोड़कर अपने लिखने पढ़ने की भाषा वे विदेशी अर्थात् फारसी ही रखना चाहते थे। जिसे उर्दूकहते हैं, उसका उस समय तक साहित्य में कोई स्थान न था, इसका स्पष्ट आभास नूर मुहम्मद के इस कथन से मिलता है

कामयाब कह कौन जगावा । फिर हिन्दी भाखै पर आवा।।

छाँड़ि पारसी कंद नवातैं । अरुझाना हिन्दी रस बातैं।।

अनुराग बाँसुरीका रचनाकाल 1178 हिजरी अर्थात् 1821 है। कवि ने इसकी रचना अधिक पांडित्यपूर्ण रखने का प्रयत्न किया है और विषय भी इसका तत्वज्ञान संबंधी है। शरीर, जीवात्मा और मनोवृत्तियों को लेकर पूरा अध्यवसित रूपक (एलेगरी) खड़ा करके कहानी बाँधी है। और सब सूफी कवियों की कहानियों के बीच में दूसरा पक्ष व्यंजित होता है पर यह सारी कहानी और सारे पात्र ही रूपक हैं। एक विशेषता और है। चौपाइयों के बीच बीच में इन्होंने दोहे न लिखकर बरवै रखे हैं। प्रयोग भी ऐसे संस्कृत शब्दों के हैं जो और सूफी कवियों में नहीं आए हैं। काव्यभाषा के अधिक निकट होने के कारण भाषा में कहीं कहीं ब्रजभाषा के शब्द और प्रयोग भी पाए जाते हैं। रचना का थोड़ा सा नमूना नीचे दिया जाता है

नगर एक मूरतिपुर नाऊँ । राजा जीव रहै तेहि ठाऊँ।।

का बरनौं वह नगर सुहावन । नगर सुहावन सब मन भावन।।

इहै सरीर सुहावन मूरतिपुर । इहै जीव राजा, जिव जाहु न दूर।।

तनुज एक राजा के रहा । अंत:करन नाम सब कहा।।

सौम्यसील सुकुमार सयाना । सो सावित्री स्वांत समाना।।

सरल सरनि जौ सो पग धारै । नगर लोग सूधौ पग परै।।

वक्र पंथ जो राखै पाऊ । वहै अधव सब होइ बटाऊ।।

रहे सँघाती ताके पत्तान ठावँ।

एक संकल्प, विकल्प सो दूसर नावँ।।

बुद्धि चित्त दुइ सखा सरेखै। जगत बीच गुन अवगुन देखै।।

अंत:करन पास नित आवैं। दरसन देखि महासुख पावैं।।

अहंकार तेहि तीसर सखा निरंत्रा।

रहेउ चारि के अंतर नैसुक अंत्रा।।

अंत:करन सदन एक रानी । महामोहनी नाम सयानी।।

बरनि न पारौं सुंदरताई । सकल सुंदरी देखि लजाई।।

सर्व मंगला देखि असीसै । चाहै लोचन मध्य बईसै।।

कुंतल झारत फाँदा डारै । लख चितवन सों चपला मारै।।

अपने मंजु रूप वह दारा । रूपगर्विता जगत मँझारा।।

प्रीतम प्रेम पाइ वह नारी । प्रेमगर्विता भई पियारी।।

सदा न रूप रहत है अंत नसाइ।

प्रेम, रूप के नासहिं तें घटि जाइ।।

नूर मुहम्मद को हिन्दी भाषा में कविता करने के कारण जगह जगह इसका सबूत देना पड़ा है कि वे इस्लाम के पक्के अनुयायी थे। अत: वे अपने इस ग्रंथ की प्रशंसा इस ढंग से करते हैं

यह बाँसुरी सुनै सो कोई । हिरदय स्रोत खुला जेहि होई।।

निसरत नाद बारुनी साथा । सुनि सुधि चेत रहै केहि हाथा।।

सुनतै जौ यह सबद मनोहर । होत अचेत कृष्ण मुरलीधार।।

यह मुहम्मदी जन की बोली । जामैं कंद नबातैं घोली।।

बहुत देवता को चित हरै । बहु मूरति औंधी होइ परै।।

बहुत देवहरा ढाहि गिरावै । संखनाद की रीति मिटावै।।

जहँ इसलामी मुख सों निसरी बात।

तहाँ सकल सुख मंगल, कष्ट नसात।।

सूफी आख्यान काव्यों की अखंडित परंपरा की यहीं समाप्ति मानी जा सकती है। इस परंपरा में मुसलमान कवि ही हुए हैं। केवल एक हिंदू मिला है। सूफी मत के अनुयायी सूरदास नामक एक पंजाबी हिंदू ने शाहजहाँ के समय में नल दमयंती कथानाम की एक कहानी लिखी थी, पर इसकी रचना अत्यंत निकृष्ट है।

साहित्य की कोई अखंड परंपरा समाप्त होने पर भी कुछ दिन तक उस परंपरा की कुछ रचनाएँ इधर उधर होती रहती हैं। इस ढंग की पिछली रचनाओं में चतुर्मुकुट की कथाऔर यूसुफ जुलेखाउल्लेख योग्य हैं। (आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, रीतिकाल, प्रकरण 2—ग्रंथकार कवि)