मतिराम : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

मतिराम : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

मतिराम : ये रीतिकाल के मुख्य कवियों में हैं और चिंतामणि तथा भूषण के भाई परंपरा से प्रसिद्ध हैं। ये तिकवाँपुर (जिला, कानपुर) में संवत् 1674 के लगभग उत्पन्न हुए थे और बहुत दिनों तक जीवित रहे। ये बूँदी के महाराव भावसिंह के यहाँ बहुत काल तक रहे और उन्हीं के आश्रय में अपना ‘ललितललाम’ नामक अलंकार का ग्रंथ संवत् 1716 और 1745 के बीच किसी समय बनाया। इनका ‘छंदसार’ नामक पिंगल ग्रंथ महाराज शंभुनाथ सोलंकी को समर्पित हैइनका परम मनोहर ग्रंथ ‘रसराज’ किसी को समर्पित नहीं है। इनके अतिरिक्त इनके दो ग्रंथ और हैं, ‘साहित्यसार’ और ‘लक्षण श्रृंगार’। बिहारी सतसई के ढंग पर इन्होंने एक ‘मतिराम सतसई’ भी बनाई जो हिन्दी पुस्तकों की खोज में मिली है। इसके दोहे सरसता में बिहारी के दोहों के समान ही हैं।

मतिराम की रचना की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसकी सरलता अत्यंत स्वाभाविक है, न तो उसमें भावों की कृत्रिमता है, न भाषा की। भाषा शब्दाडंबर से सर्वथा मुक्त है। केवल अनुप्रास के चमत्कार के लिए अशक्त शब्दों की भर्ती कहीं नहीं है। जितने शब्द और वाक्य हैं, वे सब भावव्यंजना में ही प्रयुक्त हैं। रीतिग्रंथ वाले कवियों में इस प्रकार की स्वच्छ, चलती और स्वाभाविक भाषा कम कवियों में मिलती है, पर कहीं कहीं वह अनुप्रास के जाल में बेतरह जकड़ी पाई जाती है। सारांश यह कि मतिराम की सी रसस्निग्ध और प्रसादपूर्ण भाषा रीति का अनुसरण करनेवालों में बहुत ही कम मिलती है।

भाषा के ही समान मतिराम के न तो भाव कृत्रिम हैं और न उनके व्यंजक व्यापार और चेष्टाएँ। भावों को आसमान पर चढ़ाने और दूर की कौड़ी लाने के फेर में ये नहीं पड़े हैं। नायिका के विरहताप को लेकर बिहारी के समान मजाक इन्होंने नहीं किया है। इनके भावव्यंजक व्यापारों की श्रृंखला सीधी और सरल है, बिहारी के समान चक्करदार नहीं। वचनक्रता भी इन्हें बहुत पसंद न थी। जिस प्रकार, शब्दवैचित्रय को ये वास्तविक काव्य से पृथक् वस्तु मानते थे, उसी प्रकार खयाल की झूठी बारीकी को भी। इनका सच्चा कविहृदय था। ये यदि समय की प्रथा के अनुसार रीति की बँधी लीकों पर चलने के लिए विवश न होते, अपनी स्वाभाविक प्रेरणा के अनुसार चलने पाते, तो और भी स्वाभाविक और सच्ची भावविभूति दिखाते, इसमें कोई संदेह नहीं। भारतीय जीवन से छाँटकर लिए हुए इनके मर्मस्पर्शी चित्रों में जो भाव भरे हैं, वे समान रूप से सबकी अनुभूति के अंग हैं।

‘रसराज’ और ‘ललितललाम’ मतिराम के ये दो ग्रंथ बहुत प्रसिद्ध हैं, क्योंकि रस और अलंकार की शिक्षा में इनका उपयोग बराबर होता चला आया है। वास्तव में अपने विषय के ये अनुपम ग्रंथ हैं। उदाहरणों की रमणीयता से अनायास रसों और अलंकारों का अभ्यास होता चलता है। ‘रसराज’ का तो कहना ही क्या है। ‘ललितललाम’ में भी अलंकारों के उदाहरण बहुत सरस और स्पष्ट हैं। इसी सरसता और स्पष्टता के कारण ये दोनों ग्रंथ इतने सर्वप्रिय रहे हैं। रीतिकाल के प्रतिनिधि कवियों में पद्माकर को छोड़ और किसी कवि में मतिराम की सी चलती भाषा और सरल व्यंजना नहीं मिलती। बिहारी की प्रसिद्धि का कारण बहुत कुछ वाग्वैदग्ध्य है। दूसरी बात यह है कि उन्होंने केवल दोहे कहे हैं, इससे उनमें वह नादसौंदर्य नहीं आ सका है जो कवित्त सवैये की लय के द्वारा संघटित होता है।

मतिराम के कविता के कुछ उदाहरण नीचे दिए जाते हैं—

कुंदन को रँग फीको लगै, झलकै अति अंगनि चारु गोराई।

ऑंखिन में अलसानि चितौनि में मंजु विलासन की सरसाई।।

को बिनु मोल बिकात नहीं मतिराम लहे मुसकानि मिठाई।

ज्यों ज्यों निहारिए नेरे ह्वै नैननि त्यौं त्यौं खरी निकरै सी निकाई।।

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क्यों इन ऑंखिन सों निहसंक ह्वै मोहन को तन पानिप पीजै।

नेकु निहारे कलंक लगै यहि गाँव बसे कहु कैसे कै जीजै।।

होत रहै मन यों मतिराम कहूँ बन जाय बड़ो तप कीजै।

ह्वै बनमाल हिए लगिए अरु ह्वै मुरली अधारारस पीजै।।

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केलि कै राति अघाने नहीं दिन ही में लला पुनि घात लगाई।

प्यास लगी, कोउ पानी दै जाइयो, भीतर बैठि कै बात सुनाई।।

जेठी पठाई गई दुलही हँसि हेरि हरैं मतिराम बुलाई।

कान्ह के बोल पे कान न दीन्हीं सुगेह की देहरि पै धारि आई।।

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दोऊ अनंद सो ऑंगन माँझ बिराजै असाढ़ की साँझ सुहाई।

प्यारी के बूझत और तिया को अचानक नाम लियो रसिकाई।।

आई उनै मुँह में हँसी, कोहि तिया पुनि चाप सी भौंह चढ़ाई।

ऑंखिन तें गिरे ऑंसुन के बूँद, सुहास गयो उड़ि हंस की नाई।।

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सूबन को मेटि दिल्ली देस दलिबे को चमू,

सुभट समूह निसि वाकी उमहति है।

कहै मतिराम ताहि रोकिबे को संगर में,

काहू के न हिम्मत हिए में उलहति है।।

सत्रुसाल नंद के प्रताप की लपट सब,

गरब गनीम बरगीन को दहति है।

पति पातसाह की, इजति उमरावन की,

राखी रैया राव भावसिंह की रहति है।।

(रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, रीतिकाल : प्रकरण 2—रीतिग्रंथकार कवि)

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ब्रजभाषा में रीतिग्रंथ लिखनेवाले चिंतामणि, भूषण, मतिराम, दास इत्यादि अधिकतर कवि अवध के थे और ब्रजभाषा के सर्वमान्य कवि माने जाते हैं। दास जी ने तो स्पष्ट व्यवस्था ही दी है कि ‘ब्रजभाषा हेतु ब्रजवास ही न अनुमानौ।’

(रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण 4—सगुणधारा : रामभक्ति शाखा)

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ये (चिंतामणि त्रिपाठी) तिकवाँपुर (जिला-कानपुर) के रहनेवाले और चार भाई थे, चिंतामणि, भूषण, मतिराम और जटाशंकर। चारों कवि थे, जिनमें प्रथम तीन तो हिन्दी साहित्य में बहुत यशस्वी हुए। इनके पिता का नाम रत्नाकर त्रिपाठी था। कुछ दिन से यह विवाद उठाया गया है कि भूषण न तो चिंतामणि और मतिराम के भाई थे, न शिवाजी के दरबार में थे। पर इतनी प्रसिद्ध बात का जब तक पर्याप्त विरुद्ध प्रमाण न मिले तब तक वह अस्वीकार नहीं की जा सकती।

(रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, रीतिकाल : प्रकरण 2—रीतिग्रंथकार कवि)

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देव, दास, मतिराम आदि के साथ दूलह का भी नाम लिया जाता है।

(रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, रीतिकाल : प्रकरण 2—रीतिग्रंथकार कवि)

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ये ब्रजभाषा के मतिराम ऐसे कवियों के समकक्ष हैं और कहीं कहीं तो भाषा और भाव के माधुर्य में पद्माकर तक से टक्कर लेते हैं।

(रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, रीतिकाल : प्रकरण 2—रीतिग्रंथकार कवि)

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मतिरामजी के ‘रसराज’ के समान पद्माकरजी का ‘जगद्विनोद’ भी काव्यरसिकों और अभ्यासियों दोनों का कंठहार रहा है।

(रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, रीतिकाल : प्रकरण 2—रीतिग्रंथकार कवि)

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आचार्यत्व में इनका नाम मतिराम, श्रीपति और दास के साथ आता है।

(रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, रीतिकाल : प्रकरण 2—रीतिग्रंथकार कवि)

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