महाराज जसवंत सिंह (MAHARAJ JASWANT SINGH): आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

 

महाराज जसवंत सिंह (MAHARAJ JASWANT SINGH): आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

ये (महाराज जसवंत सिंह) मारवाड़ के प्रसिद्ध महाराज थे जो अपने समय के सबसे प्रतापी हिंदू नरेश थे और जिनका भय औरंगजेब को बराबर बना रहता था। इनका जन्म संवत् 1683 में हुआ। वे शाहजहाँ के समय में ही कई लड़ाइयों पर जा चुके थे। महाराज गजसिंह के ये दूसरे पुत्र थे और उनकी मृत्यु के उपरांत संवत् 1695 में गद्दी पर बैठे। इनके बड़े भाई अमरसिंह अपने उद्धत स्वभाव के कारण पिता द्वारा अधिकारच्युत कर दिए गए थे। महाराज जसवंत सिंह बड़े अच्छे साहित्यमर्मज्ञ और तत्वज्ञानसंपन्न पुरुष थे। उनके समय में राज्य भर में विद्या की बड़ी चर्चा रही और अच्छे अच्छे कवियों और विद्वानों का बराबर समागम होता रहा। महाराज ने स्वयं तो अनेक ग्रंथ लिखे ही, अनेक विद्वानों और कवियों से न जाने कितने ग्रंथ लिखवाए। औरंगजेब ने इन्हें कुछ दिनों के लिए गुजरात का सूबेदार बनाया था। वहाँ से शाइस्ता खाँ के साथ ये छत्रापति शिवाजी के विरुद्ध दक्षिण भेजे गए थे। कहते हैं कि चढ़ाई में शाइस्ताखाँ की जो दुर्गति हुई वह बहुत कुछ इन्हीं के इशारे से। अंत में ये अफ़ग़ानों को सर करने के लिए काबुल भेजे गए जहाँ संवत् 1745 में इनका परलोकवास हुआ।

ये हिन्दी साहित्य के प्रधान आचार्यों में माने जाते हैं और इनका भाषाभूषण ग्रंथ अलंकारों पर एक बहुत ही प्रचलित पाठ्यग्रंथ रहा है। इस ग्रंथ को इन्होंने वास्तव में आचार्य के रूप में लिखा है, कवि के रूप में नहीं। प्राक्कथन में इस बात का उल्लेख हो चुका है कि रीतिकाल के भीतर जितने लक्षण ग्रंथ लिखने वाले हुए वे वास्तव में कवि थे और उन्होंने कविता करने के उद्देश्य से ही वे ग्रंथ लिखे थे, न कि विषय प्रतिपादन की दृष्टि से। पर महाराज जसवंत सिंह जी इस नियम के अपवाद थे। वे आचार्य की हैसियत से हिन्दी साहित्य क्षेत्र में आए, कवि की हैसियत से नहीं। उन्होंने अपना भाषाभूषणबिल्कुल चंद्रलोककी छाया पर बनाया और उसी की संक्षिप्त प्रणाली का अनुसरण किया। जिस प्रकार चंद्रालोक में प्राय: एक ही श्लोक के भीतर लक्षण और उदाहरण दोनों का सन्निवेश है उसी प्रकार भाषाभूषणमें भी प्राय: एक ही दोहे में लक्षण और उदाहरण दोनों रखे गए हैं। इससे विद्यार्थियों को अलंकार कंठ करने में बड़ा सुबीता हो गया और भाषाभूषणहिन्दी काव्य रीति के अभ्यासियों के बीच वैसा ही सर्वप्रिय हुआ जैसा कि संस्कृत के विद्यार्थियों के बीच चंद्रालोक। भाषाभूषण बहुत छोटा सा ग्रंथ है।

भाषाभूषण के अतिरिक्त जो और ग्रंथ इन्होंने लिखा है वे तत्वज्ञान संबंधी हैं; जैसे अपरोक्षसिद्धांत, अनुभवप्रकाश, आनंदविलास, सिद्धांतबोध, सिद्धांतसार, प्रबोधचंद्रोदय नाटकये सब ग्रंथ भी पद्य में ही हैं, जिनसे पद्य रचना की पूरी निपुणता प्रकट होती है। पर साहित्य से जहाँ तक संबंध है, ये आचार्य या शिक्षक के रूप में ही हमारे सामने आते हैं। अलंकारनिपुणता की इनकी पद्धति का परिचय कराने के लिए भाषाभूषणके दो दोहे नीचे दिए जाते हैं

अत्युक्ति, अलंकार अत्युक्ति यह बरनत अतिसय रूप।

जाचक तेरे दान तें भए कल्पतरु भूप

पर्यस्तापह्नुति, पर्यस्त जु गुन एक को और विषय आरोप।

होइ सुधाधर नाहिं यह वदन सुधाधर ओप

ये दोहे चंद्रालोक के इन श्लोकों की स्पष्ट छाया हैं,

अत्युक्तिरद्भुतातथ्य शौर्यौ दार्यादि वर्णनम्।

त्वयि दातारि राजेंद्र याचका: कल्पशाखिन:।

पर्य्यास्तापह्नुतिर्यत्रा धर्ममात्रां निषिधयते।

नायं सुधांशु: किं तर्हि सुधांशु: प्रेयसीमुखम्

भाषाभूषण पर पीछे तीन टीकाएँ रची गईं, अलंकार रत्नाकरनाम की टीका जिसे बंशीधार ने संवत् 1792 में बनाया, दूसरी टीका प्रतापसाहि की और तीसरी गुलाब कवि की भूषणचंद्रिका

हिंदी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, रीतिकाल, प्रकरण 2, रीतिग्रंथकार कवि

महाराज जसवंत सिंह ने अपने भाषाभूषणकी रचना चंद्रालोकके आधार पर की, पर उसके अलंकार की अनिवार्यता वाले सिद्धांत का समावेश नहीं किया।

रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, रीतिकाल, प्रकरण 1, सामान्य परिचय