लल्लूलालजी (1763 – 1835) : आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की दृष्टि में

लल्लूलालजी (1763 – 1835) : आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की दृष्टि में

#लल्लूलाल जी की रचनाएँ : #सिंहासन बत्तीसी (1801 ई.), #बेताल पच्चीसी (1801 ई.), #माधोनल (1801 ई.), #राजनीति (1802 ई.), #शकुंतला नाटक (1810 ई.), #प्रेमसागर (1810 ई., कृष्ण की लीलाओं और भागवत पुराण के दसवें अध्याय पर आधारित), #लतायफ़-ए-हिंदी (1810 ई.), #ब्रजभाषा व्याकरण (1811 ई.), #सभा विलास (1815 ई.), #माधव विलास (1817 ई.), #लालचंद्रिका (1818 ई., बिहारी सतसई की टीका)।

लल्लूलालजी : ये आगरे के रहनेवाले गुजराती ब्राह्मण थे। इनका जन्म संवत् 1820 में और मृत्यु संवत् 1882 में हुई। #संस्कृत के विशेष जानकार तो ये नहीं जान पड़ते, पर भाषा कविता का अभ्यास इन्हें था। उर्दू भी कुछ जानते थे। #संवत् 1860 में कलकत्ता के फोर्टविलियम कॉलेज के अध्यापक जान गिलक्राइस्ट के आदेश से इन्होंने खड़ी बोली गद्य में प्रेमसागरलिखा जिसमें भागवत दशमस्कंध की कथा वर्णन की गई है।

#इंशा के समान इन्होंने केवल ठेठ हिन्दी लिखने का संकल्प तो नहीं किया था पर विदेशी शब्दों के न आने देने की प्रतिज्ञा अवश्य लक्षित होती है। यदि ये उर्दू न जानते होते तो अरबी फारसी के शब्द बचाने में उतने कृतकार्य कभी न होते जितने हुए। बहुतेरे अरबी फारसी के शब्द बोलचाल की भाषा में इतने मिल गए थे कि उन्हें केवल संस्कृत हिन्दी जानने वाले के लिए पहचानना भी कठिन था। मुझे एक पंडितजी का स्मरण है जो लालशब्द तो बराबर बोलते थे, पर कलेजाऔर बैगनशब्दों को म्लेच्छ भाषा के समक्ष बचाते थे। लल्लूलालजी अनजान में कहीं कहीं ऐसे शब्द लिख गए हैं जो फारसी या तुरकी के हैं। जैसे बैरखशब्द तुरकी का बैरकहै, जिसका अर्थ झंडा है। प्रेमसागर में यह शब्द आया है देखिए :

शिवजी ने एक धवजा बाणासुर को दे के कहा इस बैरख को ले जाय।

पर ऐसे शब्द दो ही चार जगह आए हैं।

यद्यपि मुंशी सदासुखलाल ने भी अरबी फारसी के शब्दों का प्रयोग न कर संस्कृतमिश्रित साधु भाषा लिखने का प्रयत्न किया है, पर लल्लूलाल की भाषा से उसमें बहुत कुछ भेद दिखाई पड़ता है। मुंशीजी की भाषा साफ सुथरी खड़ी बोली है, पर #लल्लूलाल की भाषा कृष्णोपासक व्यासों की-सी ब्रजरंजित खड़ी बोली है। सम्मुख जाय‘, ‘सिर नाय‘, ‘सोई‘, ‘भई‘, ‘कीजै‘, ‘निरख‘, ‘लीजौऐसे शब्द बराबर प्रयुक्त हुए हैं। #अकबर के समय में गंग कवि ने जैसी खड़ी बोली लिखी थी वैसी ही खड़ी बोली लल्लूलाल ने भी लिखी। दोनों की भाषाओं में अंतर इतना ही है कि गंग ने इधर उधर फारसी अरबी के प्रचलित शब्द भी रखे हैं पर लल्लूलालजी ने ऐसे शब्द बचाए हैं। #भाषा की सजावट भी प्रेमसागर में पूरी है। विरामों पर तुकबंदी के अतिरिक्त वर्णन वाक्य भी बड़े बड़े आए हैं और अनुप्रास भी यत्र-तत्र हैं। मुहावरों का प्रयोग कम है। सारांश यह कि #लल्लूलालजी का काव्याभासगद्यभक्तों की कथावार्ता के काम का ही अधिकतर है, न नित्य व्यवहार के अनुकूल है, न संबद्ध विचारधारा के योग्य। प्रेमसागर से दो नमूने नीचे दिए जाते हैं :

श्रीशुकदेव मुनि बोले : महाराज! ग्रीष्म की अति अनीति देख, नृप पावस प्रचंड पशु पक्षी, जीव जंतुओं की दशा विचार चारों ओर से दल बादल साथ ले लड़ने को चढ़ आया। तिस समय घन जो गरजता था सोई तौ धौंसा बजता था और वर्ण वर्ण की घटा जो घिर आई थी सोई शूर वीर रावत थे, तिनके बीच बिजली की दमक शस्त्रा की सी चमकती थी, बगपाँत ठौर ठौर धवज-सी फहराय रही थी, दादुर, मोर, कड़खैतों की सी भाँति यश बखानते थे और बड़ी बड़ी बूँदों की झड़ी बाणों की सी झड़ी लगी थी।

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इतना कह महादेव जी गिरजा को साथ ले गंगा तीर पर जाय, नीर में न्हाय न्हिलाय, अति लाड़ प्यार से लगे पार्वतीजी को वस्त्र आभूषण पहिराने। निदान अति आनंद में मग्न हो डमरू बजाय बजाय तांडव नाच नाच, संगीतशास्त्र की रीति से गाय गाय लगे रिझाने।

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जिस काल ऊषा बारह वर्ष की हुई तो उसके मुखचंद्र की ज्योति देख पूर्णमासी का चंद्रमा छबिछीन हुआ, बालों की श्यामता के आगे अमावस्या की अंधेरी फीकी लगने लगी। उसकी चोटी सटकाई लख नागिन अपनी केंचुली छोड़ सटक गई। भौंह की बँकाई निरख धानुष धकधकाने लगा; ऑंखों की बड़ाई चंचलाई पेख मृग मीन खंजन खिसाय रहे।

#लल्लूलाल ने उर्दू, खड़ी बोली हिन्दी और ब्रजभाषा तीनों में गद्य की पुस्तकें लिखीं। ये संस्कृत नहीं जानते थे। ब्रजभाषा में लिखी हुई कथाओं और कहानियों को उर्दू और हिन्दी गद्य में लिखने के लिए इनसे कहा गया था जिसके अनुसार इन्होंने सिंहासनबत्तीसी, बैतालपचीसी, शकुंतला नाटक, माधोनल और प्रेमसागर लिखे। प्रेमसागर के पहले की चारों पुस्तकें बिल्कुल उर्दू में हैं। इनके अतिरिक्त संवत् 1869 में इन्होंने राजनीतिके नाम से हितोपदेश की कहानियाँ (जो पद्य में लिखी जा चुकी थीं) ब्रजभाषा गद्य में लिखी। माधवविलासऔर सभाविलासनाम से ब्रजभाषा पद्य के संग्रह ग्रंथ भी इन्होंने प्रकाशित किए थे। इनकी लालचंद्रिकानाम की बिहारी सतसई की टीका भी प्रसिद्ध है। इन्होंने अपना एक निज का प्रेस कलकत्तो में (पटलडाँगे) में खोला था जिसे ये संवत् 1881 में फोर्टविलियम कॉलेज की नौकरी से पेंशन लेने पर, आगरे लेते गए। आगरे में प्रेस जमाकर ये एक बार फिर कलकत्ते गए जहाँ इनकी मृत्यु हुई। अपने प्रेस का नाम इन्होंने संस्कृत प्रेसरखा था, जिसमें अपनी पुस्तकों के अतिरिक्त ये रामायण आदि पुरानी पोथियाँ भी छापा करते थे। इनके प्रेस की छपी पुस्तकों की लोग बहुत आदर करते थे।

(आधुनिक काल : प्रकरण 1 : गद्य का विकास : खड़ बोली का गद्य)

 

सूरति मिश्र इन्होंने संवत् 1767 में संस्कृत से कथा लेकर बैतालपचीसी लिखी, जिसको आगे चलकर लल्लूलाल ने खड़ी बोली हिंदुस्तानी में किया। (आधुनिक काल : प्रकरण 1 : गद्य का विकास : ब्रज गद्य)

फोर्ट विलियम कॉलेज के आश्रय में लल्लूलालजी गुजराती ने खड़ी बोली के गद्य में प्रेमसागरऔर सदल मिश्र ने नासिकेतोपाख्यानलिखा। अत: #खड़ी बोली गद्य को एक साथ आगे बढ़ानेवाले चार महानुभाव हुए हैं : मुंशी सदासुख लाल, सैयद इंशाअल्ला खाँ, लल्लूलाल और सदल मिश्र। ये चारों लेखक संवत् 1860 के आसपास हुए। (आधुनिक काल : प्रकरण 1 : गद्य का विकास : खड़ बोली का गद्य)

#’बैताल पचीसीकी भाषा बिल्कुल उर्दू है।

(आधुनिक काल : प्रकरण 2 : गद्य का आविर्भाव)

#लल्लूलाल में ब्रजभाषापन और सदल मिश्र में पूरबीपन था।

(आधुनिक गद्य साहित्य का प्रवर्तन : प्रथम उत्थान प्रकरण 1 : गद्य का परवर्तन : सामान्य परिचय)