लाला पं. भगवानदीन : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

लाला पं. भगवानदीन : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

लाला भगवानदीनजी के जीवन का प्रारंभिक काल उस बुंदेलखंड में व्यतीत हुआ था जहाँ देश की परंपरागत पुरानी संस्कृति अभी बहुत कुछ बनी हुई है। उनकी रहन सहन बहुत सादी और उनका हृदय सरल और कोमल था। उन्होंने हिन्दी के पुराने काव्यों का नियमित रूप में अध्ययन किया था इससे वे ऐसे लोगों से कुढ़ते थे जो परंपरागत हिन्दी साहित्य की कुछ भी जानकारी प्राप्त किए बिना केवल थोड़ी सी अंग्रेजी शिक्षा के बल पर हिन्दी कविताएँ लिखने लग जाते थे। बुंदेलखंड में शिक्षित वर्ग के बीच और सर्वसाधारण में भी हिन्दी कविता का सामान्य रूप में प्रचार चला आ रहा है। ऋतुओं के अनुसार जो त्योहार और उत्सव रखे गए हैं, उनके आगमन पर वहाँ लोगों में अब भी प्राय: वही उमंग दिखाई देती है। विदेशी संस्कारों के कारण वह मारी नहीं गई है। लाला साहब वही उमंगभरा हृदय लेकर छतरपुर से काशी आ रहे। हिन्दी शब्दसागर के संपादकों में एक वे भी थे। पीछे हिंदू विश्वविद्यालय में हिन्दी के अध्यापक हुए। हिन्दी साहित्य की व्यवस्थित रूप से शिक्षा देने के लिए काशी में उन्होंने एक साहित्य विद्यालय खोला जो उन्हीं के नाम से अब तक बहुत अच्छे ढंग पर चला जा रहा है। कविता में वे अपना उपनाम दीनरखते थे।

लालाजी का जन्म संवत् 1924 (अगस्त 1866) में और मृत्यु 1987 (जुलाई,1930) में हुई।

पहले वे ब्रजभाषा में पुराने ढंग की कविता करते थे, पीछे लक्ष्मीके संपादक हो जाने पर खड़ी बोली की कविताएँ लिखने लगे। खड़ी बोली में उन्होंने वीरों के चरित्र लेकर बोलचाल की कड़कड़ाती भाषा में जोशीली रचना की है। खड़ी बोली की कविताओं का तर्ज उन्होंने प्राय: मुंशियाना ही रखा था। बह्र या छंद भी उर्दू के रखते थे और भाषा में चलते अरबी या फारसी शब्द भी लाते थे। इस ढंग से उनके तीन काव्य निकले हैंवीर क्षत्राणी‘, ‘वीर बालकऔर वीर पंचरत्न लालाजी पुराने हिन्दी काव्य और साहित्य के अच्छे मर्मज्ञ थे। बहुत से प्राचीन काव्यों की नए ढंग की टीकाएँ करके उन्होंने अध्ययन के अभिलाषियों का बड़ा उपकार किया है।

रामचंद्रिका, कविप्रिया, दोहावली, कवितावली, बिहारी सतसई आदि की इनकी टीकाओं ने विद्यार्थियों के लिए अच्छा मार्ग खोल दिया। भक्ति और श्रृंगार की पुराने ढंग की कविताओं में उक्ति चमत्कार वे अच्छा लाते थे।

उनकी कविताओं के दोनों तरह के नमूने नीचे देखिए

सुनि मुनि कौसिक तें साप को हवाल सब,

बाढ़ी चित करुना की अजब उमंग है।

पदरज डारि करे पाप सब छारि,

करि नवल सुनारि दियो धामहू उतंग है।

दीनभनै ताहि लखि जात पतिलोक,

ओर उपमा अभूत को सुझानों नयो ढंग है।

कौतुकनिधान राम रज की बनाय रज्जु,

पद तें उड़ाई ऋषिपतिनी पतंग है।

 

वीरों की सुमाताओं का यश जो नहीं गाता।

वह व्यर्थ सुकवि होने का अभिमान जनाता

जो वीरसुयश गाने में है ढील दिखाता।

वह देश के वीरत्व का है मान घटाता

सब वीर किया करते हैं सम्मान कलम का।

वीरों का सुयशगान है अभिमान कलम का।

इनकी फुटकल कविताओं का संग्रह नवीन बीनया नदीमे-दीनमें है।

(हिंदी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आधुनिककाल, प्रकरण 3 काव्यखंड : नई धारा : द्वितीय उत्थान)

आधुनिक विषय को लेकर कविता करनेवाले कई कवि जैसे स्वर्गीय नाथुराम शंकर शर्मा, लाला भगवानदीन पुरानी परिपाटी की बड़ी सुंदर कविता करते थे। (हिंदी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आधुनिक काल, प्रकरण 1काव्यखंड : पुरानी धारा, अन्य कवि)

सनेहसागर(बख्शी हंसराजकृत) का संपादन श्रीयुत् लाला भगवानदीनजी बड़े अच्छे ढंग से कर चुके हैं। (हिंदी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, रीतिकाल, प्रकरण 2रीति ग्रंथकार कवि)

ठाकुर की कविताओं का एक अच्छा संग्रह ठाकुर ठसक‘ के नाम से श्रीयुत् लाला भगवानदीन जी ने निकाला है। (हिंदी साहित्य का इतिहासआचार्य रामचंद्र शुक्लरीतिकालप्रकरण 3अन्य कवि)

देव और बिहारी(पं. कृष्ण बिहारी मिश्र) के उत्तर में लाला भगवानदीनजी ने बिहारी और देवनाम की पुस्तक निकाली जिसमें उन्होंने मिश्रबंधुओं के भद्दे आक्षेपों का उचित शब्दों में जवाब देकर पं. कृष्णबिहारीजी की बातों पर भी पूरा विचार किया। अच्छा हुआ कि छोटे बड़ेके इस भद्दे झगड़े की ओर अधिक लोग आकर्षित नहीं हुए। (हिंदी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आधुनिक काल, प्रकरण 4गद्य का प्रसार : समालोचना)