केशवदास (सं. 1612-1674 ) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

केशवदास (सं. 1612-1674 ) : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

केशवदास ये सनाढ्य ब्राह्मण कृष्णदत्ता के पौत्र और काशीनाथ के पुत्र थे। इनका जन्म संवत् 1612 में और मृत्यु 1674 के आसपास हुई। ओरछा नरेश महाराजा रामसिंह के भाई इंद्रजीत सिंह की सभा में ये रहते थे, जहाँ इनका बहुत मान था। इनके घराने में बराबर संस्कृत के अच्छे पंडित होते आए थे। इनके बड़े भाई बलभद्र मिश्र भाषा के अच्छे कवि थे। इस प्रकार की परिस्थिति में रहकर ये अपने समय के प्रधान साहित्यशास्त्रज्ञ कवि माने गए। इनके आविर्भाव काल से कुछ पहले ही रस, अलंकार आदि काव्यांगों के निरूपण की ओर कुछ कवियों का ध्यान जा चुका था। यह स्वाभाविक भी था, क्योंकि हिन्दी काव्यरचना प्रचुर मात्रा में हो चुकी थी। लक्ष्य ग्रंथों के उपरांत ही लक्षण ग्रंथों का निर्माण होता है। केशवदासजी संस्कृत के पंडित थे, अत: शास्त्रीय पद्धति से साहित्यचर्चा का प्रचार भाषा में पूर्ण रूप से करने की इच्छा इनके लिए स्वाभाविक थी।

केशवदास के पहले संवत् 1598 में कृपाराम थोड़ा रसनिरूपण कर चुके थे। इसी समय में चरखारी के मोहनलाल मिश्र ने श्रृंगारसागरनामक एक ग्रंथ श्रृंगाररस संबंधी लिखा। नरहरि कवि के साथ अकबरी दरबार में जानेवाले करनेस कवि ने कर्णाभरण‘, ‘श्रुतिभूषणऔर भूपभूषणनामक तीन ग्रंथ अलंकार संबंधी लिखे थे। पर अब तक किसी कवि ने संस्कृत साहित्यशास्त्र में निरूपित काव्यांगों का पूरा परिचय नहीं कराया था। यह काम केशवदासजी ने किया।

ये काव्य में अलंकार का स्थान प्रधान समझने वाले चमत्कारवादी कवि थे, जैसा कि इन्होंने स्वयं कहा है

जदपि सुजाति सुलच्छनी, सुबरन सरस सुवृत्त।

भूषन बिनु न बिराजई, कविता बनिता मित्ता।।

अपनी इसी मनोवृत्ति के अनुसार इन्होंने भामह, उद्भट और दंडी आदि प्राचीन आचार्यों का अनुसरण किया जो रस, रीति आदि सब कुछ अलंकार के अंतर्गत ही लेते थे; साहित्यशास्त्र को अधिक व्यवस्थित और समुन्नत रूप में लानेवाले मम्मट, आनंदवर्ध्दनाचार्य और विश्वनाथ का नहीं। अलंकार के सामान्य और विशेष दो भेद करके इन्होंने उसके अंतर्गत वर्णन की प्रणाली ही नहीं, वर्णन के विषय भी ले लिए हैं। अलंकारशब्द का प्रयोग इन्होंने व्यापक अर्थ में किया है। वास्तविक अलंकार इनके विशेष अलंकार ही हैं। अलंकारों के लक्षण इन्होंने दंडी के काव्यादर्शसे तथा बहुत सी बातें अमररचित काव्यकल्पलतावृत्तिऔर केशव मिश्र कृत अलंकारशेखरसे ली हैं।

पर केशव के 50 या 60 वर्ष पीछे हिन्दी में लक्षण ग्रंथों की जो परंपरा चली, वह केशव के मार्ग पर नहीं चली। काव्य के स्वरूप के संबंध में तो वह रस की प्रधानता माननेवाले काव्यप्रकाश और साहित्यदर्पण के पक्ष पर रही और अलंकारों के निरूपण में उसने अधिकतर चंद्रालोक और कुवलयानंद का अनुसरण किया। इसी से केशव के अलंकारलक्षण हिन्दी में प्रचलित अलंकार लक्षणों से नहीं मिलते। केशव ने अलंकारों पर कविप्रियाऔर रस पर रसिकप्रियालिखी।

इन ग्रंथों में केशव का अपना विवेचन कहीं नहीं दिखाई पड़ता। सारी सामग्री कई संस्कृत ग्रंथों से ली हुई मिलती है। नामों में अवश्य कहीं कहीं थोड़ा हेरफेर मिलता है जिससे गड़बड़ी के सिवा और कुछ नहीं हुआ है। उपमाके जो 22 भेद केशव ने रखे हैं, उनमें से 15 तो ज्यों के त्यों दंडी के हैं, 5 केवल नाम भर बदल दिए गए हैं। शेष रहे 2 भेद, संकीर्णोपमा और विपरीतोपमा। इनमें विपरीतोपमा को तो उपमा कहना ही व्यर्थ है। इसी प्रकार आक्षेपके जो 9 भेद केशव ने रखे हैं, उनमें 4 तो ज्यों के त्यों दंडी के हैं। पाँचवाँ मरणाक्षेपदंडी का मर्च्छाक्षेपही है। कविप्रिया का प्रेमालंकार दंडी के (विश्वनाथ के नहीं) प्रेयसका ही नामांतर है। उत्तरअलंकार के चारों भेद वास्तव में पहेलियाँ हैं। कुछ भेदों को दंडी से लेकर भी केशव ने उनका और का और ही अर्थ समझा है।

केशव के रचे सात ग्रंथ मिलते हैं कविप्रिया, रसिकप्रिया, रामचंद्रिका, वीरसिंहदेवचरित, विज्ञानगीता, रतनबावनी और जहाँगीरजसचंद्रिका।

केशव को कविहृदय नहीं मिला था। उनमें वह सहृदयता और भावुकता न थी जो एक कवि में होनी चाहिए। वे संस्कृत साहित्य से सामग्री लेकर अपने पांडित्य और रचनाकौशल की धाक जमाना चाहते थे, पर इस कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए भाषा पर जैसा अधिकार चाहिए, वैसा उन्हें प्राप्त न था। अपनी रचनाओं में उन्होंने संस्कृत काव्यों की उक्तियाँ लेकर भरी हैं। पर उन उक्तियों को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने में उनकी भाषा बहुत कम समर्थ हुई है। पदों और वाक्यों की न्यूनता, अशक्त, फालतू शब्दों के प्रयोग और संबंध के अभाव आदि के कारण भी अप्रांजल और ऊबड़ खाबड़ हो गई है और तात्पर्य भी स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं हो सका है। केशव की कविता जो कठिन कही जाती है, उसका प्रधान कारण उनकी यह त्रुटि है, उनकी मौलिक भावनाओं की गंभीरता या जटिलता नहीं। रामचंद्रिकामें प्रसन्नराघव‘, ‘हनुमन्नाटक‘, ‘अनर्घराघव‘, ‘कादंबरीऔर नैषधाकी बहुत सी उक्तियों का अनुवाद करके रख दिया गया है। कहीं कहीं अनुवाद अच्छा न होने के कारण उक्ति विकृत हो गई है, जैसे प्रसन्नराघव के प्रियतमपदैरंकितान्भूमिभागान्का अनुवाद प्यौ पदपंकज ऊपरकरके केशव ने उक्ति को एकदम बिगाड़ डाला है। हाँ, जिन उक्तियों में जटिलता नहीं है,समास शैली का आश्रय नहीं लिया गया है, उनके अनुवाद में कहीं कहीं बहुत अच्छी सफलता प्राप्त हुई है, जैसे भरत के प्रश्न और कैकेयी के उत्तर में

मातु, कहाँ नृप तात? गए सुरलोकहिं; क्यों? सुत शोक लए।जो कि हनुमन्नाटक के एक श्लोक का अनुवाद है।

केशव ने दो प्रबंधकाव्य लिखे, एक वीरसिंहदेवचरित  दूसरा रामचंद्रिका पहला तो काव्य ही नहीं कहा जा सकता। इसमें वीरसिंहदेव का चरित तो थोड़ा है, दान, लोभ आदि के संवाद भरे हैं। रामचंद्रिकाअवश्य एक प्रसिद्ध ग्रंथ है। पर यह समझ रखना चाहिए कि केशव उक्तिवैचित्र्य और शब्दक्रीड़ा के प्रेमी थे। जीवन के नाना गंभीर और मार्मिक पक्षों पर उनकी दृष्टि नहीं थी। अत: वे मुक्तक रचना के ही उपयुक्त थे, प्रबंध रचना के नहीं। प्रबंध पटुता उनमें कुछ भी न थी। प्रबंधकाव्य के लिए तीन बातें अनिवार्य हैं (1) संबंध निर्वाह, (2) कथा के गंभीर और मार्मिक स्थलों की पहचान और (3) दृश्यों की स्थानगत विशेषता।

संबंधनिर्वाह की क्षमता केशव में न थी। उनकी रामचंद्रिकाअलग अलग लिखे हुए वर्णनों का संग्रह सी जान पड़ती है। कथा का चलता प्रवाह न रख सकने के कारण ही उन्हें बोलनेवाले पात्रों के नाम नाटकों के अनुकरण पर पद्यों से अलग सूचित करने पड़े हैं। दूसरी बात भी केशव में कम पाई जाती है। रामायण की कथा का केशव के हृदय पर कोई विशेष प्रभाव रहा हो, यह बात नहीं पाई जाती। उन्हें एक बड़ा प्रबंधकाव्य भी लिखने की इच्छा हुई और उन्होंने उसके लिए राम की कथा ले ली। उस कथा के भीतर जो मार्मिक स्थल हैं, उनकी ओर केशव का ध्यान बहुत कम गया है। वे ऐसे स्थलों को या तो छोड़ गए हैं या यों ही इतिवृत्त मात्र कहकर चलता कर दिया है। राम आदि को वन की ओर जाते देख मार्ग में पड़नेवाले लोगों से कुछ कहलाया भी तो यह कि किधौं मुनिशाप हत, किधौं ब्रह्म दोष रत, किधौं कोऊ ठग हौ।ऐसा अलौकिक सौंदर्य और सौम्य आकृति सामने पाकर सहानुभूतिपूर्ण शुद्ध सात्विक भावों का उदय होता है, इसका अनुभव शायद एक दूसरे को संदेहकी दृष्टि से देखनेवाले नीतिकुशल दरबारियों के बीच रहकर केशव के लिए कठिन था।

दृश्यों की स्थानगत विशेषता केशव की रचनाओं में ढूँढ़ना तो व्यर्थ ही है। पहली बात तो यह है कि केशव के लिए प्राकृतिक दृश्यों में कोई आकर्षण नहीं था। वे उनकी देशगत विशेषताओं का निरीक्षण करने क्यों जाते? दूसरी बात यह है कि केशव के बहुत पहले से ही इसकी पंरपरा एक प्रकार से उठ चुकी थी। कालिदास के दृश्यवर्णनों में देशगत विशेषताओं का जो रंग पाया जाता है, वह भवभूति तक तो कुछ रहा, उसके पीछे नहीं। फिर तो वर्णन रूढ़ हो गए। चारों ओर फैली हुई प्रकृति के नाना रूपों के साथ केशव के हृदय का सामंजस्य कुछ भी न था। अपनी इस मनोवृत्ति का आभास उन्होंने यह कहकर कि

देखे मुख भावै, अनदेखेई कमल चंद,

ताते मुख मुखै, सखी, कमलौ न चंद री।

साफ़ दे दिया है। ऐसे व्यक्ति से प्राकृत दृश्यों के सच्चे वर्णन की भला क्या आशा की जा सकती है? पंचवटी और प्रवर्षण गिरि ऐसे रमणीय स्थलों में शब्दसाम्य के आधार पर श्लेष के एक भद्दे खेलवाड़ के अतिरिक्त और कुछ न मिलेगा। केवल शब्दसाम्य के सहारे जो उपमान लाए गए हैं के किसी रमणीय दृश्य से उत्पन्न सौंदर्य की अनुभूति के सर्वथा विरुद्ध या बेमेल हैं जैसे प्रलयकाल, पांडव, सुग्रीव, शेषनाग। सादृश्य या साधार्म्य की दृष्टि से दृश्यवर्णन में जो उपमाएँ, उत्प्रेक्षाएँ आदि लाई गई हैं, वे भी सौंदर्य की भावना में वृद्धि करने के स्थान पर कुतूहल मात्र उत्पन्न करती हैं। जैसे श्वेत कमल के छत्तो पर बैठे हुए भौंरे पर यह उक्ति

केशव केशवराय मनौ कमलासन के सिर ऊपरे सोहै।

पर कहीं कहीं रमणीय और उपयुक्त उपमान भी मिलते हैं; जैसेनजनकपुर के सूर्योदय वर्णन में, जिसमें कापालिक कालको छोड़कर और सब उपमान रमणीय हैं।

सारांश यह कि प्रबंधकाव्य रचना के योग्य न तो केशव में अनुभूति ही थी, न शक्ति। परंपरा से चले आते हुए कुछ नियत विषयों के (जैसे युद्ध,  सेना की तैयारी, उपवन, राजदरबार के ठाटबाट तथा श्रृंगार और वीररस) फुटकल वर्णन ही अलंकारों की भरमार के साथ वे करना जानते थे। इसी से बहुत से वर्णन, यों ही बिना अवसर का विचार किए, वे भरते गए हैं। वे वर्णन वर्णन के लिए करते थे, न कि प्रसंग या अवसर की अपेक्षा से। कहीं कहीं तो उन्होंने उचित अनुचित की भी परवाह नहीं की है, जैसे भरत की चित्रकूट यात्रा के प्रसंग में सेना की तैयारी और तड़क भड़क का वर्णन। अनेक प्रकार के रूखे सूखे उपदेश भी बीच बीच में रखना वे नहीं भूलते थे। दानमहिमा, लोभनिंदा के लिए तो वे प्राय: जगह निकाल लिया करते थे। उपदेशों का समावेश दो-एक जगह तो पात्र का बिना विचार किए अत्यंत अनुचित और भद्दे रूप में किया गया है, जैसे वन जाते समय राम का अपनी माता कौशल्या को पातिव्रत का उपदेश।

रामचंद्रिका के लंबे चौड़े वर्णनों को देखने से स्पष्ट लक्षित होता है कि केशव की दृष्टि जीवन के गंभीर और मार्मिक पक्ष पर न थी। उनका मन राजसी ठाट-बाट, तैयारी, नगरों की सजावट, चहल पहल आदि के वर्णन में ही विशेषत: लगता है।

केशव की रचना को सबसे अधिक विकृत और अरुचिकर करनेवाली वस्तु है, आलंकारिक चमत्कार की प्रवृत्ति जिसके कारण न तो भावों की प्रकृत व्यंजना के लिए जगह बचती है, न सच्चे हृदयग्राही वस्तुवर्णन के लिए। पददोष, वाक्यदोष आदि तो बिना प्रयास जगह जगह मिल सकते हैं। कहीं कहीं उपमान भी बहुत हीन और बेमेल हैं; जैसे राम की वियोग दशा के वर्णन में यह वाक्य

बासर की संपति उलूक ज्यों न चितवत।

रामचंद्रिका में केशव को सबसे अधिक सफलता हुई है संवादों में। इन संवादों में पात्रों के अनुकूल क्रोध, उत्साह आदि की व्यंजना भी सुंदर है (जैसे लक्ष्मण, राम, परशुराम संवाद तथा लवकुश के प्रसंग के संवाद) तथा वाक्पटुता और राजनीति के दाँवपेंच का आभास भी प्रभावपूर्ण है। उनका रावण-अंगद-संवाद तुलसी के संवाद से कहीं अधिक उपयुक्त और सुंदर है। रामचंद्रिका और कविप्रिया दोनों का रचनाकाल कवि ने 1658 दिया है; केवल मास में अंतर है।

रसिकप्रिया (संवत् 1648) की रचना प्रौढ़ है। उदाहरणों में चतुराई और कल्पना से काम लिया गया है और पदविन्यास भी अच्छे हैं। इन उदाहरणों में वाग्वैदग्ध्य के साथ साथ सरसता भी बहुत कुछ पाई जाती है। विज्ञानगीता संस्कृत के प्रबोधचंद्रोदय नाटक के ढंग की पुस्तक है। रतनबावनी में इंद्रजीत के बड़े भाई रत्नसिंह की वीरता का छप्पयों में अच्छा वर्णन है। यह वीररस का अच्छा काव्य है।

केशव की रचना में सूर, तुलसी आदि की सी सरसता और तन्मयता चाहे न हो, पर काव्यांगों का विस्तृत परिचय कराकर उन्होंने आगे के लिए मार्ग खोला। कहते हैं, वे रसिक जीव थे। एक दिन बुङ्ढे होने पर किसी कुएँ पर बैठे थे। वहाँ स्त्रियों ने बाबा कहकर संबोधन किया। इस पर इनके मुँह से यह दोहा निकला

केसव केसनि अस करी बैरिहु जस न कराहिं।

चंद्रबदनि मृगलोचनी बाबा कहि कहि जाहिं।।

केशवदास की रचना के कुछ उदाहरण नीचे दिए जाते हैं

जौ हौं कहौं रहिए तौ प्रभुता प्रगट होति,

चलन कहौं तौ हितहानि नाहिं सहनो

भावै सो करहु तौ उदासभाव प्राननाथ!

साथ लै चलहु कैसे लोकलाज बहनो

केशवदास की सौं तुम सुनहु, छबीले लाल,

चलेही बनत जौ पै नाहीं राज रहनो।

जैसियै सिखाऔ सीख तुमहीं सुजान प्रिय,

तुमहिं चलत मोहिं जैसो कछु कहनो

—————

चंचल न हूजै नाथ, अंचल न खैंचौ हाथ,

सोवै नेक सारिकाऊ, सुक तौ सोवायो जू।

मंद करौ दीप दुति चंद्रमुख देखियत,

दारिकै दुराय आऊँ द्वार तौ दिखायो जू

मृगज मराल बाल बाहिरै बिडारि देउँ,

भायो तुम्हैं केसव सो मोहूँ मन भायो जू।

छल के निवास ऐसे वचन विलास सुनि,

सौ गुनो सुरत हू तें स्याम सुख पायो जू

—————

कैटभ सो नरकासुर सो पल में मधु सो मुर सो जिन मारयो।

लोक चतुर्दश रक्षक केसव पूरन वेद पुरान विचारयो

श्री कमला कुच कुंकुम मंडन पंडित देव अदेव निहारयो।

सो कर माँगन को बलि पै करतारहु ने करतार पसारयो

(रामचंद्रिका से)

अरुण गात अति प्रात पद्मिनी प्राननाथ भय।

मानहु केशवदास कोकनद कोक प्रेममय

परिपूरन सिंदूर पूर कैधौं मंगल घट।

किधौं शक्र को छत्रा मढयो मानिक मयूख पट

कै सोनितकलित कपाल यह किल कापालिक काल को।

यह ललित लाल कैधौं लसत दिग भामिनि के भाल को

 

विधि के समान है बिमानीकृत राजहंस,

विविधा विबुधायुत मेरु सो अचल है।

दीपति दिपति अति सातौ दीप देखियत,

दूसरो दिलीप सो सुदक्षिणा को बल है।

सागर उजागर सो बहु बाहिनी को पति,

छनदान प्रिय कैधौं सूरज अमल है।

सब विधि समरथ राजै राजा दशरथ,

भागीरथ पथ गामी गंगा कैसो जल है

—————

मूलन ही की जहाँ अधोगति केशव गाइय।

होम हुतासन धूम नगर एकै मलिनाइय।

दुर्गति दुर्गन हीं, जो कुटिलगति सरितन ही में।

श्रीफल कौ अभिलाष प्रगट कविकुल के जी में

—————

कुंतल ललित नील, भ्रुकुटी धानुष, नैन

कुमुद कटाच्छ बान सबल सदाई है।

सुग्रीव सहित तार अंगदादि भूषनन,

मध्यदेश केशरी सु जग गति भाई है

विग्रहानुकूल सब लच्छ लच्छ ऋच्छ बल,

ऋच्छराज मुखी मुख केसौदास गाई है।

रामचंद्र जू की चमू, राजश्री विभीषन की

रावन की मीचु दर कूच चलि आई है

—————

पढ़ौ विरंचि मौन वेद, जीव सोर छंडि रे।

कुबेर बेर कै कही, न जच्छ भीर मंडि रे

दिनेस जाइ दूरि बैठु नारदादि संगही।

न बोलु चंद मंदबुद्धि,  इंद्र की सभा नहीं

—————

केशवदासजी ने काव्य के सब अंग का निरूपण शास्त्रीय पद्धति पर किया। इसमें संदेह नहीं कि काव्यरीति का सम्यक् समावेश पहले पहल आचार्य केशव ने ही किया। पर हिन्दी में रीतिग्रंथों की अविरल और अखंडित परंपरा का प्रवाह केशव की कविप्रियाके प्राय: 50 वर्ष पीछे चला और वह भी एक भिन्न आदर्श को लेकर, केशव के आदर्श को लेकर नहीं।

वे (केशव) काव्य में अलंकारों का स्थान प्रधान समझने वाले चमत्कारवादी कवि थे। उनकी इस मनोवृत्ति के कारण हिन्दी साहित्य के इतिहास में एक विचित्र संयोग घटित हुआ। संस्कृत साहित्य के विकासक्रम की एक संक्षिप्त उद्धरणी हो गई। साहित्य की मीमांसा क्रमश: बढ़ते बढ़ते जिस स्थिति पर पहुँच गई थी, उस स्थिति से सामग्री न लेकर केशव ने उसके पूर्व की स्थिति से सामग्री ली। उन्होंने हिन्दी पाठकों को काव्यांगनिरूपण की उस पूर्व दशा का परिचय कराया जो भामह और उद्भट के समय में थी; उस उत्तर दशा का नहीं जो आनंदवर्धानाचार्य, मम्मट और विश्वनाथ द्वारा विकसित हुई। भामह और उद्भट के समय से अलंकार और अलंकार्य का स्पष्ट भेद नहीं हुआ था; रस, रीति, अलंकार आदि सबके लिए अलंकारशब्द का व्यवहार होता था। यही बात हम केशव की कविप्रियामें भी पाते हैं। उसमें अलंकारके सामान्यऔर विशेषदो भेद करके सामान्यके अंतर्गत वर्ण्य-विषय और विशेषके अंतर्गत वास्तविक अलंकार रखे गए हैं।

पर केशवदास के उपरांत तत्काल रीतिग्रंथों की परंपरा चली नहीं। कविप्रिया के 50 वर्ष पीछे उसकी अखंड परंपरा का आरंभ हुआ। यह परंपरा केशव के दिखाए हुए पुराने आचार्यों (भामह, उद्भट आदि) के मार्ग पर न चलकर परवर्ती आचार्यों के परिष्कृत मार्ग पर चली जिसमें अलंकार अलंकार्य का भेद हो गया था। हिन्दी के अलंकारग्रंथ अधिकतर चंद्रालोकऔर कुवलयानंदके अनुसार निर्मित हुए। कुछ ग्रंथों में काव्यप्रकाशऔर साहित्यदर्पणका भी आधार पाया जाता है। काव्य के स्वरूप और अंगों के संबंध में हिन्दी के रीतिकार कवियों ने संस्कृत के इन परवर्ती ग्रंथों का मत ग्रहण किया। इस प्रकार दैवयोग से संस्कृत साहित्यशास्त्र के इतिहास की संक्षिप्त उद्धरणी हिन्दी में हो गई।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, रीतिकाल (सं. 1700-1900) : प्रकरण 1सामान्य परिचय

केशवदास ने रूपक के तीन भेद दंडी से लिए, अद्भुत रूपक, विरुद्ध रूपक और रूपक रूपक। इनमें से प्रथम का लक्षण भी स्वरूप व्यक्त नहीं करता और उदाहरण भी अधिकताद्रूप्य रूपक का हो गया है। विरुद्ध रूपक भी दंडी से नहीं मिलता और रूपकातिशयोक्ति हो गया है। रूपक दंडी के अनुसार वहाँ होता है, जहाँ प्रस्तुत पर एक अप्रस्तुत का आरोप करके फिर दूसरे अप्रस्तुत का भी आरोप कर दिया जाता है। केशव के न तो लक्षण से यह बात प्रकट होती है, न उदाहरण से। उदाहरण में दंडी के उदाहरण का ऊपरी ढाँचा भर झलकता है, पर असल बात का पता नहीं है। इससे स्पष्ट है कि बिना ठीक तात्पर्य समझे ही लक्षण और उदाहरण हिन्दी में दे दिए गए हैं।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, रीतिकाल (सं. 1700-1900) : प्रकरण 1सामान्य परिचय

श्रीपति ने काव्य के सब अंगों का निरूपण विशद रीति से किया है। दोषों का विचार पिछले ग्रंथों से अधिक विस्तार के साथ किया है और दोषों के उदाहरणों में केशवदास के बहुत से पद्य रखे हैं। इससे इनका साहित्यिक विषयों का सम्यक् और स्पष्ट बोध तथा विचार स्वातंत्र्य प्रकट है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, रीतिकाल (सं. 1700-1900) : प्रकरण 1सामान्य परिचय

हिन्दी कवियों में श्रीपति ने दोषों के उदाहरण में केशवदास के पद रखे हैं।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, रीतिकाल (सं. 1700-1900) : प्रकरण 2रीतिग्रंथकार कवि

केशवदासजी को इन्होंने (बीरबल ने) एक बार छह लाख रुपये दिए थे और केशवदास की पैरवी से ओरछा नरेश पर एक करोड़ का जुरमाना मुआफ़ करा दिया था।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण 6सगुणधारा : फुटकल रचनाएं)

ये (बलभद्र मिश्र) ओरछा के सनाढय ब्राह्मण पं. काशीनाथ के पुत्र और प्रसिद्ध कवि केशवदास के बड़े भाई थे।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल : प्रकरण 6सगुणधारा : फुटकल रचनाएं)

केशवदास की तरह छंदों का तमाशा नहीं दिखाया है (गोकुलनाथ, गोपीनाथ और मणिदेव ने)। छंदों का चुनाव भी बहुत उत्तम हुआ है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, रीतिकाल (सं. 1700-1900) : प्रकरण 1सामान्य परिचय