आलम (1583-1623 ई.) : आचार्य रामचंद्र की दृष्टि में

आलम (1583-1623 ई.) : आचार्य रामचंद्र की दृष्टि में

आलम (1583-1623 ई.) रीतिकाल के रीतिमुक्त धारा के कवि थे। ”ये प्रेमोन्मत्त कवि थे और अपनी तरंग के अनुसार रचना करते थे। इसी से इनकी रचना में हृदयतत्व की प्रधानता है। ‘प्रेम की पीर’ या ‘इश्क़ का दर्द’ इनके एक-एक वाक्य में भरा पाया जाता है। उत्प्रेक्षाएँ भी इन्होंने बड़ी अनूठी और बहुत अधिक कही हैं।…श्रृंगार रस की ऐसी उन्मादमयी उक्तियां इनकी रचना में मिलती हैं कि पढ़ने और सुनने वाले लीन हो जाते हैं। यह तन्मयता सच्ची उमंग में ही संभव है।…भाषा भी इस कवि की परिमार्जित और सुव्यवस्थित है…प्रेम की तन्मयता की दृष्टि से आलम की गणना ‘रसख़ान’ और ‘घनानंद’ की कोटि में होनी चाहिए।” (आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, प्रकरण-3, रीतिकाल के अन्य कवि)

आलम की प्रमुख रचनाएँ : श्याम सनेही, आलम के कवित्त, सुदामा चरित्र, आलमकेलि।