घनानंद (आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में)

घनानंद (आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में)

शुद्ध ब्रजभाषा का जो चलतापन और सफाई इनकी (रसख़ान) और घनानंद की रचनाओं में है वह अन्यत्रा दुर्लभ है।—रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, भक्तिकाल, प्रकरण 5, पृ. 105

ये पिछले वर्ग के कवि प्रतिनिधि कवियों से केवल इस बात में भिन्न हैं कि इन्होंने क्रम से रसों, भावों, नायिकाओं और अलंकारों के लक्षण कहकर उनके अंतर्गत अपने पद्यों को नहीं रखा है। अधिकांश में ये भी श्रृंगारी कवि हैं और इन्होंने भी श्रृंगाररस के फुटकल पद्य कहे हैं। रचनाशैली में किसी प्रकार का भेद नहीं है। ऐसे कवियों में घनानंद सर्वश्रेष्ठ हुए हैं।… रसखान, घनानंद, आलम, ठाकुर आदि जितने प्रेमोन्मत्त कवि हुए हैं उनमें किसी ने लक्षणबद्ध रचना नहीं की है।—रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, रीतिकाल, प्रकरण 3, पृ. 178

प्रेम की तन्मयता की दृष्टि से आलम की गणना ‘रसखान’ और ‘घनानंद’ की कोटि में ही होनी चाहिए।—रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, रीतिकाल, प्रकरण 3, पृ. 182

ये (घनआनंद) साक्षात् रस मूर्ति और ब्रजभाषा काव्य के प्रधान स्तंभों में हैं।

इनकी सी विशुद्ध, सरस और शक्तिशालिनी ब्रजभाषा लिखने में और कोई कवि समर्थ नहीं हुआ। विशुद्ध ता के साथ प्रौढ़ता और माधुर्य भी अपूर्व ही है। विप्रलंभश्रृंगार ही अधिकतर इन्होंने लिखा है। ये वियोग श्रृंगार के प्रधान मुक्तक कवि हैं। ‘प्रेम की पीर’ ही को लेकर इनकी वाणी का प्रादुर्भाव हुआ। प्रेममार्ग का ऐसा प्रवीण और धीर पथिक तथा ज़बाँदानी का ऐसा दावा रखने वाला ब्रजभाषा का दूसरा कवि नहीं हुआ।

इनका जन्म संवत् 1746 के लगभग हुआ था और ये संवत् 1796 में नादिरशाही में मारे गए। ये जाति के कायस्थ और दिल्ली के बादशाह मुहम्मदशाह के मीर मुंशी थे। कहते हैं कि एक दिन दरबार में कुछ कुचक्रियों ने बादशाह से कहा कि मीर मुंशी साहब गाते बहुत अच्छा हैं। बादशाह से इन्होंने बहुत टालमटोल किया। इस पर लोगों ने कहा कि ये इस तरह न गाएँगे, यदि इनकी प्रेमिका सुजान नाम की वेश्या कहे तब गाएँगे। वेश्या बुलाई गई। इन्होंने उसकी ओर मुँह और बादशाह की ओर पीठ करके ऐसा गाना गाया कि सब लोग तन्मय हो गए। बादशाह इनके गाने पर जितना खुश हुआ उतना ही बेअदबी पर नाराज़। उसने इन्हें शहर से निकाल दिया। जब ये चलने लगे तब सुजान से भी साथ चलने को कहा पर वह न गई। इस पर इन्हें विराग उत्पन्न हो गया और ये वृंदावन जाकर निंबार्क संप्रदाय के वैष्णव हो गए और वहीं पूर्ण विरक्त भाव से रहने लगे। वृंदावन भूमि का प्रेम इनके इस कवित्त से झलकता है—

गुरनि बतायो, राधा मोहन हू गायो सदा,

सुखद सुहायो वृंदावन गाढ़े गहि रे।

अद्भुत अभूत महिमंडन, परे तें परे,

जीवन को लाहु हा हा क्यों न ताहि लहिरे

आनंद को घन छायो रहत निरंतर ही,

सरस सुदेस सो, पपीहापन बहि रे।

जमुना के तीर केलि कोलाहल भीर ऐसी,

पावन पुलिन पै पतित परि रहि रे

कहते हैं कि मरते समय इन्होंने अपने रक्त से यह कवित्त लिखा था—

बहुत दिनान को अवधि आसपास परे,

खरे अरबरन भरे हैं उठि जान को।

कहि कहि आवन छबीले मनभावन को,

गहि गहि राखति ही दै दै सनमान को

झूठी बतियानि को पत्यानि तें उदास ह्वै के,

अब ना घिरत घन आनंद निदान को।

अधर लगे हैं आनि करि कै पयान प्रान,

चाहत चलन ये सँदेसो लै सुजान को।

घनानंद की रचनाएं

सुजानसागर, विरहलीला, कोकसागर, रसकेलिवल्ली और कृपाकंद। इसके अतिरिक्त इनके कवित्त सवैयों के फुटकल संग्रह डेढ़ सौ से लेकर सवा चार सौ कवित्तों तक मिलते हैं, कृष्णभक्ति संबंधी इनका एक बहुत बड़ा ग्रंथ छत्रापुर के राजपुस्तकालय में है जिसमें प्रियाप्रसाद, ब्रजव्यवहार, वियोगवेली, कृपाकंदनिबंध, गिरिगाथा, भावनाप्रकाश, गोकुलविनोद, धामचमत्कार, कृष्णकौमुदी, नाममाधुरी, वृंदावनमुद्रा, प्रेमपत्रिका, रसबसंत इत्यादिअनेक विषय वर्णित हैं। इनकी ‘विरहलीला’ ब्रजभाषा में, पर फारसी के छंद में है।

अत: इनके संबंध में निम्नलिखित उक्ति बहुत ही संगत है ,

नेही महा, ब्रजभाषाप्रवीन और सुंदरताहु के भेद को जानै।

योग वियोग की रीति में कोविद, भावना भेद स्वरूप को ठानै

चाह के रंग में भीज्यो हियो, बिछुरे मिले प्रीतम सांति न मानै।

भाषाप्रवीन, सुछंद सदा रहै सो घन जू के कबित्ता बखानै।

इन्होंने अपनी कविताओं में बराबर ‘सुजान’ को संबोधन किया है जो श्रृंगार में नायक के लिए और भक्तिभाव में भगवान कृष्ण के लिए प्रयुक्त मानना चाहिए। कहते हैं कि इन्हें अपनी पूर्वप्रेयसी ‘सुजान’ का नाम इतना प्रिय था कि विरक्त होने पर भी इन्होंने उसे नहीं छोड़ा। यद्यपि अपने पिछले जीवन में घनानंद विरक्त भक्त के रूप में वृंदावन जा रहे, पर इनकी अधिकांश कविता भक्तिभाव की कोटि में नहीं आएगी, श्रृंगार की ही कही जाएगी। लौकिक प्रेम की दीक्षा पाकर ही ये पीछे भगवत्प्रेम में लीन हुए। कविता इनकी भावपक्ष प्रधान है। कोरे विभावपक्ष का चित्रण इनमें कम मिलता है। जहाँ रूप छटा का वर्णन इन्होंने किया भी है, वहाँ उसके प्रभाव का ही वर्णन मुख्य है। इनकी वाणी की प्रवृत्ति अंतर्वृत्ति निरूपण की ओर ही विशेष रहने के कारण बाह्यार्थ निरूपक रचना कम मिलती है। होली के उत्सव, मार्ग में नायक नायिका की भेंट, उनकी रमणीय चेष्टाओं आदि के वर्णन के रूप में ही वह पाई जाती है। संयोग का भी कहीं कहीं बाह्य वर्णन मिलता है, पर उसमें भी प्रधानता बाहरी व्यापारों की चेष्टाओं की नहीं है, हृदय के उल्लास और लीनता की ही है।

प्रेमदशा की व्यंजना ही इनका अपना क्षेत्र है। प्रेम की गूढ़ अंतर्दशा का उद्धाटनजैसा इनमें है वैसा हिन्दी के अन्य श्रृंगारी कवि में नहीं। इस दशा का पहला स्वरूप है हृदय या प्रेम का आधिापत्य और बुद्धि का अधीन पद, जैसा कि घनानंद ने कहा है—

‘रीझ सुजान सची पटरानी, बची बुधि बापुरी ह्वै करि दासी।’

प्रेमियों की मनोवृत्ति इस प्रकार की होती है कि वे प्रिय की कोई साधारण चेष्टा भी देखकर उसका अपनी ओर झुकाव मान लिया करते हैं और फूले फिरते हैं। इसका कैसा सुंदर आभास कवि ने नायिका के इस वचन द्वारा दिया है जो मन को संबोधन करके कहा गया है—

रुचि के वे राजा जान प्यारे हैं आनंदघन,

होत कहा हेरे, रंक! मानि लीनो मेल सो।

कवियों की इसी अंतर्दृष्टि की ओर लक्ष्य करके एक प्रसिद्ध मनस्तत्ववेत्ता ने कहा है कि भावों या मनोविकारों के स्वरूप परिचय के लिए कवियों की वाणी का अनुशीलन जितना उपयोगी है उतना मनोविज्ञानियों के निरूपण का नहीं।

प्रेम की अनिर्वचनीयता का आभास घनानंद ने विरोधाभासों के द्वारा दिया है। उनके विरोधमूलक वैचित्रय की प्रवृत्ति का कारण यही समझना चाहिए।

यद्यपि इन्होंने संयोग और वियोग दोनों पक्षों को लिया है, पर वियोग की अंतर्दशाओं की ओर दृष्टि अधिक है। इसी से इनके वियोग संबंधी पद्य प्रसिद्ध हैं। वियोगवर्णन भी अधिकतर अंतर्वृत्तिानिरूपक हैं, बाह्यार्थ निरूपक नहीं। घनानंद ने न तो बिहारी की तरह विरहताप को बाहरी माप से मापा है,  न बाहरी उछलकूद दिखाई है। जो कुछ हलचल है वह भीतर की है,  बाहर से यह वियोग प्रशांत और गंभीर है, न उसमें करवटें बदलना है, न सेज का आग की तरह तपना है, न उछल-उछल कर भागना है। उनकी ‘मौनमधि पुकार’ है।

यह निस्संकोच कहा जा सकता है कि भाषा पर जैसा अचूक अधिकार इनका था, वैसा और किसी कवि का नहीं। भाषा मानो इनके हृदय के साथ जुड़कर ऐसी वशवर्तिनी हो गई थी कि ये उसे अपनी अनूठी भावभंगी के साथ-साथ जिस रूप में चाहते थे, उस रूप में मोड़ सकते थे। उनके हृदय का योग पाकर भाषा की नूतन गतिविधि का अभ्यास हुआ और वह पहले से कहीं अधिक बलवती दिखाई पड़ी। जब आवश्यकता होती थी तब ये उसे बँधी प्रणाली पर से हटाकर अपनी नई प्रणाली पर ले जाते थे। भाषा की पूर्व अर्जित शक्ति से ही काम न चलाकर इन्होंने उसे अपनी ओर से नई शक्ति प्रदान की है। घनानंद जी उन विरले कवियों में हैं जो भाषा की व्यंजकता बढ़ाते हैं। अपनी भावनाओं के अनूठे रूपरंग की व्यंजना के लिए भाषा का ऐसा बेधड़क प्रयोग करनेवाला हिन्दी के पुराने कवियों में दूसरा नहीं हुआ। भाषा के लक्षक और व्यंजक बल की सीमा कहाँ तक है, इसकी पूरी परख इन्हीं को थी।

लक्षणा का विस्तृत मैदान खुला रहने पर भी हिन्दी कवियों ने उसके भीतर बहुत ही कम पैर बढ़ाया। एक घनानंद ही ऐसे कवि हुए हैं जिन्होंने इस क्षेत्र में अच्छी दौड़ लगाई। लाक्षणिक मूर्तिमत्ता और प्रयोगवैचित्रय की जो छटा इनमें दिखाई पड़ी, खेद है कि वह फिर पौने दो सौ वर्ष पीछे जाकर आधुनिककाल के उत्तारार्ध में, अर्थात् वर्तमानकाल की नूतन काव्यधारा में ही, ‘अभिव्यंजनावाद’ के प्रभाव से कुछ विदेशी रंग लिए प्रकट हुई। घनानंद का प्रयोग वैचित्र्य दिखाने के लिए कुछ पंक्तियाँ नीचे उद्धृत की जाती हैं—

(क) अरसानि गही वह बानि कछू, सरसानि सो आनि निहोरत है।

(ख) ह्वै है सोऊ घरी भाग उघरी अनंदघन सुरस बरसि, लाल! देखिहौ हरी हमें!

(‘खुले भाग्यवाली घड़ी’ में विशेषण-विपर्यय)।

(ग) उघरो जग, छाय रहे घन आनंद, चातक ज्यों तकिए अब तौ। (उघरो जग=संसार जो चारों ओर घेरे था, वह दृष्टि से हट गया)।

(घ) कहिए सु कहा, अब मौन भली, नहिं खोवते जौ हमें पावते जू। (हमें=हमारा हृदय) विरोधमूलक वैचित्रय भी जगह जगह बहुत सुंदर मिलता है, जैसे ,

(च) झूठ की सचाई छाक्यौ, त्यों हित कचाई पाक्यो, ताके गुनगन घनआनंद कहा गनौ।

(छ) उजरनि बसी है हमारी अंखियानि देखो, सुबस सुदेस जहाँ रावरे बसत हो।

(ज) गति सुनि हारी, देखि थकनि मैं चली जाति, थिर चर दसा कैसी ढकी उघरति है।

(झ) तेरे ज्यों न लेखो, मोहि मारत परेखो महा, जान घनआनंद पे खोयबो लहत हैं।

इन उद्ध रणों से कवि की चुभती हुई वचनवक्रता पूरी पूरी झलकती है। कहने की आवश्यकता नहीं कि कवि की उक्ति ने वक्र पथ हृदय के वेग के कारण पकड़ा है।

भाव का स्रोत जिस प्रकार टकराकर कहीं कहीं वक्रोक्ति के छींटे फेंकता है उसी प्रकार कहीं कहीं भाषा के स्निग्ध, सरल और चलते प्रवाह के रूप में भी प्रकट होता है। ऐसे स्थलों पर अत्यंत चलती और प्रांजल ब्रजभाषा की रमणीयता दिखाई पड़ती है ,

कान्ह परे बहुतायत में, इकलैन की वेदन जानौ कहा तुम?

हौ मनमोहन, मोहे कहूँ न, बिथा बिमनैन की मानौ कहा तुम?

बौरे बियोगिन्ह आप सुजान ह्वै, हाय कछू उर आनौ कहा तुम?

आरतिवंत पपीहन को घनआनंद जू! पहिचानो कहा तुम?

कारी कूर कोकिला कहाँ को बैर काढ़ति री,

कूकि-कूकि अबही करेजो किन कोरि रै।

पैंड़ परै पापी ये कलापी निसि द्यौस ज्यों ही,

चातक रे घातक ह्वै तुहू कान फोरि लै

आनंद के घन प्रान जीवन सुजान बिना,

जानि कै अकेली सब घेरो दल जोरि लै।

जौ लौं करै आवन विनोद बरसावन वे,

तौ लौं रे डरारे बजमारे घन घोरि लै

इस प्रकार की सरल रचनाओं में कहीं कहीं नादव्यंजना भी बड़ी अनूठी है। एक उदाहरण लीजिए ,

ए रे बीर पौन! तेरो सबै ओर गौन, वारि

तो सों और कौन मनै ढरकौं ही बानि दै।

जगत के प्रान, ओछे बड़े को समान, घन

आनंदनिधान सुखदान दुखियानि दै

जान उजियारे, गुनभारे अति मोहि प्यारे

अब ह्वै अमोही बैठे पीठि पहिचानि दै।

बिरहबिथा की मूरि ऑंखिन में राखौं पूरि,

धूरि तिन्ह पाँयन की हा हा! नैकु आनि दै

ऊपर के कवित्त के दूसरे चरण में आए हुए ‘आनंदनिधान सुखदान दुखियानि दै’ में मृदंग की ध्वनि का बड़ा ही सुंदर अनुकरण है।

उक्ति का अर्थगर्भत्व भी घनानंद का स्वतंत्र और स्वावलंबी होता है’ बिहारी के दोहों के समान साहित्य की रूढ़ियों (जैसे :  नायिकाभेद) पर आश्रित नहीं रहता। उक्तियों की सांगोपांग योजना या अन्विति इनकी निराली होती है। कुछ उदाहरण लीजिए—

पूरन प्रेम को मंत्र महा पन जा मधि सोधि सुधारि है लेख्यो।

ताही के चारु चरित्र विचित्रनि यों पचि कै रचि राखि बिसेख्यो

ऐसो हियो हित पत्र पवित्र जो आन कथा न कहूँ अवरेख्यो।

सो घनआनंद जान अजान लौं टूक कियो, पर बाँचि न देख्यो

आनाकानी आरसी निहारिबो करौगे कौलौं?

कहा मो चकित दसा त्यों न दीठि डोलिहै?

मौन हू सों देखिहौं कितेक पन पालिहौ जू,

कूकभरी मूकता बुलाय आप बोलिहै

जान घनआनंद यों मोहि तुम्हें पैज परी,

जानियैगो टेक टरें कौन धौं मलोलिहै।

रुई दिए रहौगे कहाँ लौं बहरायबे की?

कबहूँ तौ मेरियै पुकार कान खोलिहै

 

अंतर में बासी पै प्रवासी कैसो अंतर है,

मेरी न सुनत दैया! आपनीयौ ना कहौ।

लोचननि तारे ह्वै सुझायो सब, सूझौ नाँहिं,

बूझि न परति ऐसी सोचनि कहा दहौ

हौ तौ जानराय, जाने जाहु न, अजान यातें,

आनंद के घन छाया छाय उघरे रहौ।

मूरति मया की हा हा! सूरति दिखैये नेकु,

हमैं खोय या बिधि हो! कौन धौं लहालहौ।

मूरति सिंगार की उजारी छबि आछी भाँति,

दीठि लालसा के लोयननि लैलै ऑंजिहौं।

रतिरसना सवाद पाँवड़े पुनीतकारी पाय,

चूमि चूमि कै कपोलनि सों माँजिहौं

जान प्यारे प्रान अंग अंग रुचि रंगिन में,

बोरि सब अंगन अनंग दुख भाँजिहौं।

कब घनआनंद ढरौही बानि देखें,

सुधा हेत मनघट दरकनि सुठि राँजिहौं

(राँजना, फूटे बरतन में जोड़ या टाँका लगाना)।

निसि द्यौस खरी उर माँझ अरी छबि रंगभरी मुरि चाहनि की।

तकि मोरनि त्यों चख ढोरि रहैं, ढरिगो हिय ढोरनि बाहनिकी

चट दै कटि पै बट प्रान गए गति सों मति में अवगाहनि की।

घनआनंद जान लख्यो जब तें जक लागियै मोहि कराहनि की

इस अंतिम सवैये के प्रथम तीन चरणों में कवि ने बहुत सूक्ष्म कौशल दिखाया है। ‘मुरि चाहनि’ और ‘तकि मोरनि’ से यह व्यक्त किया गया है कि एक बार नायक ने नायिका की ओर मुड़कर देखा, फिर देखकर मुड़ गए और अपना रास्ता पकड़ा। देखकर जब वे मुड़े तब नायिका का मन उनकी ओर इस प्रकार ढल पड़ा जैसे पानी नारी में ढल जाता है। कटि में बल देकर प्यारे नायिका के मन में डूबने के भय से निकल गए।

घनानंद के ये दो सवैये बहुत प्रसिद्ध हैं—

परकारज देह को धारे फिरौ परजन्य! जथारथ ह्वै दरसौ।

निधि नीर सुधा के समान करौ, सबही बिधि सुंदरता सरसौ

घनआनंद जीवनदायक हो, कबौं मेरियौ पीर हिये परसौ।

कबहूँ वा बिसासी सुजान के ऑंगन में अंसुवान को लै बरसौ

अति सूधो सनेह को मारग है, जहँ नैकु सयानप बाँक नहीं।

तहँ साँचे चलै तजि आपनपौ, झिझकैं कपटी जो निसाँक नहीं

घनआनंद प्यारे सुजान सुनौ, इत एक तें दूसरो आँक नहीं।

तुम कौन सी पाटी पढ़े हौ लला, मन लेहु पै देहु छटाँक नहीं

(‘विरहलीला’ से)

सलोने स्याम प्यारे क्यों न आवौ।

कहाँ हौ जू, कहाँ हौ जू, कहाँ हौ।

रहौ किन प्रान प्यारे नैन आगैं।

सजन! हित मान कै ऐसी न कीजै।

—रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, रीतिकाल, प्रकरण 3, पृ. 185-189