विद्यापति : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

विद्यापति : आचार्य रामचंद्र शुक्ल की दृष्टि में

यद्यपि पचास-साठ वर्ष पीछे विद्यापति (संवत् 1460 में वर्तमान) ने बीच-बीच में देशभाषा के भी कुछ पद्य रखकर अपभ्रंश में दो छोटी-छोटी पुस्तकें लिखीं, पर उस समय तक अपभ्रंश का स्थान देशभाषा ले चुकी थी। प्रसिद्ध भाषा तत्वविद् सर जार्ज ग्रियर्सन जब विद्यापति के पदों का संग्रह कर रहे थे, उस समय उन्हें पता लगा था कि ‘कीर्तिलता’ और ‘कीर्तिपताका’ नाम की प्रशस्ति संबंधी दो पुस्तकें भी उनकी लिखी हैं। पर उस समय इनमें से किसी का पता न चला। थोड़े दिन हुए, महामहोपाध्याय पं. हरप्रसाद शास्त्री नेपाल गए थे। वहाँ राजकीय पुस्तकालय में ‘कीर्तिलता’ की एक प्रति मिली जिसकी नक़ल उन्होंने ली।

इस पुस्तक में तिरहुत के राजा कीर्तिसिंह की वीरता, उदारता, गुणग्राहकता आदि का वर्णन, बीच में कुछ देशभाषा के पद्य रखते हुए, अपभ्रंश भाषा के दोहा, चौपाई, छप्पय, छंद गाथा आदि छंदों में किया गया है। इस अपभ्रंश की विशेषता यह है कि यह पूरबी अपभ्रंश है। इसमें क्रियाओं आदि के बहुत-से रूप पूरबी हैं। नमूने के लिए एक उदाहरण लीजिए—

रज्ज लुद्ध असलान बुद्धि बिक्कम बले हारल।

पास बइसि बिसवासि राय गयनेसर मारल

मारंत राय रणरोल पडु, मेइनि हा हा सद्द हुअ।

सुरराय नयर नाअर-रमणि बाम नयन पप्फुरिअ धुअ

दूसरी विशेषता विद्यापति के अपभ्रंश की यह है कि प्राय: देशभाषा कुछ अधिक लिए हुए है और उसमें तत्सम, संस्कृत शब्दों का वैसा बहिष्कार नहीं है। तात्पर्य यह है कि वह प्राकृत की रूढ़ियों से उतनी अधिक बँधी नहीं है। उसमें जैसे इस प्रकार का टकसाली अपभ्रंश है—

पुरिसत्तोण पुरिसओ, नहिं पुरिसओ जम्म मत्तोन।

जलदानेन हु जलओ, न हु जलओ पुंजिओ धूमो

वैसे ही इस प्रकार की देशभाषा या बोली भी है

कतहुँ तुरुक बरकर । बाट जाए ते बेगार धार

धारि आनय बाभन बरुआ । मथा चढ़ावइ गायक चुरुआ

हिंदू बोले दूरहि निकार । छोटउ तुरुका भभकी मार।

काव्य भाषा प्राकृत की रूढ़ियों से कितनी बँधी हुई चलती रही। बोलचाल तक के तत्सम संस्कृत शब्दों का पूरा बहिष्कार उसमें पाया जाता है। ‘उपकार’, ‘नगर’, ‘विद्या’, ‘वचन’ ऐसे प्रचलित शब्द भी ‘उअआर’, ‘नअर’, ‘बिज्जा’, ‘बअण’ बनाकर ही रखे जाते थे। ‘जासु, ‘तासु’ ऐसे रूप बोलचाल से उठ जाने पर भी पोथियों में बराबर चलते रहे। विशेषण विशेष्य के बीच विभक्तियों का समानाधिकरण अपभ्रंश काल में कृदंत विशेषणों से बहुत कुछ उठ चुका था, पर प्राकृत की परंपरा के अनुसार अपभ्रंश की कविताओं में कृदंत विशेषणों में मिलता है, जैसे ‘जुब्बण गयुं न झूरि’ गए को यौवन को न झूर गए यौवन को न पछता। जब ऐसे उदाहरणों के साथ हम ऐसे उदाहरण भी पाते हैं जिनमें विभक्तियों का ऐसा समानाधिकरण नहीं है तब यह निश्चय हो जाता है कि उसका सन्निवेश पुरानी परंपरा का पालन मात्र है। इस परंपरा पालन का निश्चय शब्दों की परीक्षा से अच्छी तरह हो जाता है। जब हम अपभ्रंश के शब्दों में ‘मिट्ठ’ और ‘मीठी’ दोनों रूपों का प्रयोग पाते हैं तब उस काल में ‘मीठी’ शब्द के प्रचलित होने में क्या संदेह हो सकता है?

ध्यान देने पर यह बात भी लक्षित होगी कि ज्यों-ज्यों काव्यभाषा देशभाषा की ओर अधिक प्रवृत्त होती गई त्यों-त्यों तत्सम संस्कृत शब्द रखने में संकोच भी घटता गया। शारंगधर के पद्यों और कीर्तिलता में इसका प्रमाण मिलता है।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, आदिकाल, प्रकरण 2, अपभ्रंश काव्य)

जिसकी रचना के कारण ये ‘मैथिलकोकिल’ कहलाए वह इनकी पदावली है। इन्होंने अपने समय की प्रचलित मैथिली भाषा का व्यवहार किया है। विद्यापति को बंगभाषा वाले अपनी ओर खींचते हैं। सर जार्ज ग्रियर्सन ने भी बिहारी और मैथिली को ‘मागधी’ से निकली होने के कारण हिन्दी से अलग माना है। पर केवल भाषाशास्त्र की दृष्टि से कुछ प्रत्ययों के आधार पर ही साहित्य सामग्री का विभाग नहीं किया जा सकता। कोई भाषा कितनी दूर तक समझी जाती है, इसका विचार भी तो आवश्यक होता है। किसी भाषा का समझा जाना अधिकतर उसकी शब्दावली (वोकेब्युलरी) पर अवलंबित होता है। यदि ऐसा न होता तो उर्दू और हिन्दी का एक ही साहित्य माना जाता।

खड़ी बोली, बांगड़ू, ब्रज, राजस्थानी, कन्नौजी, बैसवारी, अवधी इत्यादि में रूपों और प्रत्ययों का परस्पर इतना भेद होते हुए भी सब हिन्दी के अंतर्गत मानी जाती हैं। इनके बोलने वाले एक-दूसरे की बोली समझते हैं। बनारस, गाजीपुर, गोरखपुर, बलिया आदि जिलों में ‘आयल-आइल’, ‘गयल-गइल’, ‘हमरा-तोहरा’ आदि बोले जाने पर भी वहाँ की भाषा हिन्दी के सिवा दूसरी नहीं कही जाती। कारण है शब्दावली की एकता। अत: जिस प्रकार हिन्दी साहित्य ‘बीसलदेवरासो’ पर अपना अधिकार रखता है, उसी प्रकार विद्यापति की पदावली पर भी।

विद्यापति के पद अधिकतर श्रृंगार के ही हैं, जिनमें नायिका और नायक राधा-कृष्ण हैं। इन पदों की रचना जयदेव के गीतकाव्य के अनुकरण पर ही शायद की गई हो। इनका माधुर्य अद्भुत है। विद्यापति शैव थे। उन्होंने इन पदों की रचना श्रृंगार काव्य की दृष्टि से की है, भक्त के रूप में नहीं। विद्यापति को कृष्णभक्तों की परंपरा में न समझना चाहिए।

आध्यात्मिक रंग के चश्मे आजकल बहुत सस्ते हो गए हैं। उन्हें चढ़ाकर जैसे कुछ लोगों ने ‘गीतगोविंद’ के पदों को आध्यात्मिक संकेत बताया है, वैसे ही विद्यापति के इन पदों को भी। सूर आदि कृष्णभक्तों के श्रृंगारी पदों की भी ऐसे लोग आध्यात्मिक व्याख्या चाहते हैं। पता नहीं बाललीला के पदों का वे क्या करेंगे। इस संबंध में यह अच्छी तरह समझ रखना चाहिए कि लीलाओं का कीर्तन कृष्णभक्ति का एक प्रधान अंग है। जिस रूप में लीलाएँ वर्णित हैं उसी रूप में उनका ग्रहण हुआ है और उसी रूप में वे गोलोक में नित्य मानी गई हैं, जहाँ वृन्दावन, यमुना, निकुंज, कंदब, सखा, गोपिकाएँ इत्यादि सब नित्य रूप में हैं। इन लीलाओं का दूसरा अर्थ निकालने की आवश्यकता नहीं।

विद्यापति संवत् 1460 में तिरहुत के राजा शिवसिंह के यहाँ वर्तमान थे। उनके दो पद नीचे दिए जाते हैं—

सरस बसंत समय भल पावलि, दछिन पवन बह धीरे।

सपनहु रूप वचन इक भाषिय, मुख से दूरि करु चीरे

तोहर बदन सम चाँद होअथि नाहिं, कैयो जतन बिह केला।

कै बेरि काटि बनावल नव कै, तैयो तुलित नहिं भेला

लोचन तूअ कमल नहिं भै सक, से जग के नहिं जाने।

से फिरि जाय लुकैलन्ह जल महँ, पंकज निज अपमाने

भन विद्यापति सुनु बर जोवति, ई सम लछमि समाने।

राजा ‘सिवसिंह’ रूप नरायन, ‘लखिमा देइ’ प्रति भाने

कालि कहल पिय साँझहि रे, जाइबि मइ मारू देस।

मोए अभागिलि नहिं जानल रे, सँग जइतवँ जोगिनी बेस

हिरदय बड़ दारुन रे, पिया बिनु बिहरि न जाइ।

एक सयन सखि सूतल रे, अछल बलभ निसि भोर

न जानल कत खन तजि गेल रे, बिछुरल चकवा जोर।

सूनि सेज पिय सालइ रे, पिय बिनु घर मोए आजि

बिनति करहु सुसहेलिन रे, मोहि देहि अगिहर साजि।

विद्यापति कवि गावल रे, आवि मिलत पिय तोर।

‘लखिमा देइ’ बर नागर रे, राय सिवसिंह नहिं भोर

मोटे हिसाब से वीरगाथा काल महाराज हम्मीर के समय तक ही समझना चाहिए। उसके उपरांत मुसलमानों का साम्राज्य भारत में स्थिर हो गया और हिंदू राजाओं को न तो आपस में लड़ने का उतना उत्साह रहा, न मुसलमानों से। जनता की चित्तवृत्ति बदलने लगी और विचारधारा दूसरी ओर चली। मुसलमानों के न जमने तक तो उन्हें हटाकर अपने धर्म की रक्षा का वीर प्रयत्न होता रहा, पर मुसलमानों के जम जाने पर अपने धर्म के उस व्यापक और हृदयग्राह्य रूप के प्रचार की ओर ध्यान हुआ, जो सारी जनता को आकर्षित रखे और धर्म से विचलित न होने दे।

इस प्रकार स्थिति के साथ-ही-साथ भावों तथा विचारों में भी परिवर्तन हो गया। पर इससे यह न समझना चाहिए कि हम्मीर के पीछे किसी वीरकाव्य की रचना ही नहीं हुई। समय-समय पर इस प्रकार के अनेक काव्य लिखे गए। हिन्दी साहित्य के इतिहास की एक विशेषता यह भी रही कि एक विशिष्ट काल में किसी रूप की जो काव्यसरिता वेग से प्रवाहित हुई, वह यद्यपि आगे चलकर मंद गति से बहने लगी, पर 900 वर्षों के हिन्दी साहित्य के इतिहास में हम उसे कभी सर्वथा सूखी हुई नहीं पाते।

(आचार्य रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास, वीरगाथा काल, प्रकरण 4, फुटकल रचनाएँ)